28 November, 2021

पाषाण | कविता | डॉ शरद सिंह

पाषाण
      - डॉ शरद सिंह
आज 
आसमान 
कुछ ज़्यादा चमकदार 
कुछ हल्का नीला
कुछ उदारमना
लग रहा
कुछ तटस्थ भी

ऐसा क्यों?
बहुत सोचा
तो हुआ अहसास
आज सुबह से
आंखें नहीं भीगीं
दर्द नहीं गहराया
अपनों का छूटा साथ
कथित मित्रों के
घात, आघात
याद आई
सबकी
पर नहीं घेरा व्यथा ने
अर्थात् 
पाषाण होने की
प्रक्रिया में है हृदय
वेदना और संवेदना से परे।
      --------------
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27 November, 2021

कौन पैरवी करता मेरी | शायरी | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

कौन   पैरवी    करता    मेरी
वो वकील था, वो ही जज था
उसने  अपनी ही   दलील पर
अपनी पीनल-कोड   बना ली
- डॉ शरद सिंह

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24 November, 2021

सियासत का लहू | शायरी | डॉ (सुश्री) शरद सिंह


इक   हक़ीक़त  की  तरह
झूठ  वो   कहता है   सदा,
उसकी    रग  -  रग     में
सियासत का लहू बहता है
- डॉ शरद सिंह

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18 November, 2021

वह | कविता | डॉ शरद सिंह

वह
    - डॉ शरद सिंह
वह 
कई दिन से
ढूंढ रहा है
एक अदद आसरा
एक अदद मालिक
जो दे उसे
कुछ टुकड़े रोटी के
और फुट भर जगह
घर के दरवाज़े पर

कई घर
कई दरवाज़े
देख चुका है वह
कई-कई बार

किसी ने दुत्कारा
पानी डालकर भगाया
किसी ने पुचकारा
दी बासी रोटी भी
पर
पनाह नहीं दी
किसी ने उसे

पसलियों के बीच
धौंकनी-सी
चलती सांसें
जूझ रहीं ज़िंदगी से
मौत की प्रतीक्षा में

मरना कोई नहीं चाहता
वह भी नहीं
भले ही जन्मा
सड़क के किनारे
स्वतंत्र प्राणी के रूप में
पर चाहता है ग़ुलामी
ज़िन्दा रहने के लिए

मगर
अफ़सोस
एक दिन 
किसी कूड़े के ढेर में
या सड़क पर 
कुचली हुई
दिखेगी उसकी देह
ग़ुलामी भी 
नहीं होगी उसे नसीब

ग़ुनाह कि-
उसकी नस्ल
है देसी
नहीं है वह-
अल्सेशियन, पामेरियन, 
डेल्मीशियन, लेब्राडोर,
जर्मन शेफर्ड या बुलडॉग

नहीं हुई है उसकी
ब्रीड क्राफ्टिंग
नहीं जन्मा वह
किसी फार्मिंग स्टेशन में
नहीं है उसकी क़ीमत
हज़ारों रुपयों में
वह तो निपट देसी
सड़कछाप पिल्ला है
चार दिन भटकेगा
करेगा 'कूं कूं'
और फिर 
हो जाएगा ख़ामोश
हमेशा के लिए।
    ---------
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16 November, 2021

बेअसर | कविता | डॉ शरद सिंह

बेअसर
       - डॉ शरद सिंह
अपशब्द
नहीं कहना चाहती
मेरी वाणी
किन्तु
जब कुछ छिछले कटाक्ष
टकराते हैं कानों से
तो उबाल आता है मन में
बंधने लगती हैं मुट्ठियां
उमड़ता है आवेग
देने को
मुंहतोड़ ज़वाब

तभी
मेरा अवचेतन
खींचने लगता है
चेतना की वल्गाएं
और 
कहता है
दस्तक दे कर
माथे पर
मत बनो उसके जैसी

नहीं करता परवाह
सूर्य, बृहस्पति या शुक्र
छुद्र उल्काओं की
घूमता है अपनी धुरी पर
निस्पृह हो कर
जबकि 
हो जाती हैं राख
स्वतः जल कर
छुद्र उल्काएं

बात सहज है
और नहीं भी
आप्लावित धैर्य
छलक पड़ने को
हो उठता है आतुर
तब 
निकल पड़ते हैं अपशब्द
मेरे भी मुख से
पर उन्हें सुनती हैं
बंद कमरे की
खिड़कियां, दरवाज़े
और दीवारें
चेतन और अवचेतन के बीच 
एक आदिम द्वंद्व
द्वार खुलने तक
शांति का 
तय होता रस्ता
अक्षमताओं की भूमि पर
बोता रहता है
क्षमताओं का बीज

शांत मन
एक बार फिर
काटता है मुस्कुराहट की
लहलहाती फसल
और
सोचते हैं देखने वाले
उफ! ये कितनी बेअसर है।
          ---------
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11 November, 2021

झुकती पृथ्वी | कविता | डॉ शरद सिंह


झुकती पृथ्वी
        - डॉ शरद सिंह

किसी प्रेमिका
या
नववधू सी
प्रेम के
संवेग से
भर कर नहीं,
मां के ममत्व से
उद्वेलित हो कर नहीं

पृथ्वी
घूम रही है
झुकी-झुकी
अपनी धुरी पर
कटते जंगलों
सूखती नदियों
गिरते जलस्तरों
बढ़ते प्रदूषण
और
ओजोन परत में
हो चले छेदों पर
आंसू बहाती हुई
घबराई-सी।

पृथ्वी
घूम रही है
अपने कक्ष में

हादसों को देखती
झेलती अपराधों को
नापती संवेदना के
गिरते स्तर को
नौकरी के हाट में बिकते
युवाओं को
और सूने घर में
छूट रहे बूढ़ों को
निर्माण से नष्ट की ओर
बढ़ती व्यवस्थाओं पर
सुबकती हुई
हिचकियां लेती
लापरहवाहियों के
ब्लैक होल की ओर बढ़ती

पृथ्वी
अब और
झुक जाना चाहती है
हम इंसानों की
करतूतों पर शरमाती हुई।
       ------------- 
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09 November, 2021

वे बच्चे | कविता | डॉ शरद सिंह

वे बच्चे
       - डॉ शरद सिंह

वे जो नन्हें बच्चे
नहीं जानते थे दुनिया
नहीं जानते थे
आग की तपिश
नहीं जानते थे
जीने की मशक्क़त
नहीं जानते थे
कि वे क्यों हैं
अस्पताल में
अब कभी 
जान भी नहीं सकेंगे
ज़िंदगी को
जिसे बचाने
भर्ती किए गए थे वे

वे रहते
तो धीरे-धीरे चढ़ते
उम्र की सीढ़ियां
जाते किसी
सरकारी स्कूल में
कुछ निकलते पढ़ाकू
कुछ पंक्चर जोड़ने वाले
और बनते
अपने परिवार के सहारे

अब 
उनकी किलकारियां
कभी नहीं
सुन पाएंगी मांंएं
नहीं सिखा पाएंगे
उंगली पकड़ कर चलना
उनके पिता

पछताते रहेंगे सिर्फ़
भर्ती करने पर
गोया 
अस्पताल हमीदिया का 
एसएनसीयू वार्ड नहीं
जीवित (शव×) दाहगृह हो
या लापरवाहियों का
अक्ष्म्य, घातक उदाहरण
या फिर
शाम तक 
बासी हो जाने ख़बर।
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07 November, 2021

हादसे | कविता | डॉ शरद सिंह

हादसे
         - डॉ शरद सिंह

एक पेंसिल शार्पनर 
ही तो हैं हादसे
जो बनाते रहते हैं नुकीला
इस ज़िन्दगी को
 
नोंक 
बन जाए चुभने लायक
तो चलती रहती है
अजेय
कुछ देर

भोथरी हो जाए
तो जीने के प्रयासों की 
लिखावट
हो जाती है
भद्दी, बदसूरत
जिसे कोई
पढ़ना न चाहे

और
टूट जाए नोंक 
तो एक और हादसा
छील कर
उतार देता है
आत्मा की पर्तें भी

पेंसिल के अंतिम सिरे तक
जो बच रहता है
पी जा चुकी
सिगरेट के टोटे सा
मृत्यु के जूते तले
कुचले जाने तक
मिट्टी मिश्रित ग्रेफाईट की 
काली सींक की तरह
आशाओं की 
नर्म लकड़ी में दबी
लिखने और टूटने के
संघर्ष में
हादसों से
छिलती रहती है ज़िंदगी।
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04 November, 2021

तनहाई | ग़ज़ल | डॉ शरद सिंह

और नहीं कुछ लिखना मुमकिन
ख़्वाब तलक भी डरा हुआ है
दिल की कापी का हर पन्ना
तनहाई से भरा हुआ है 
- डॉ शरद सिंह

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01 November, 2021

रीती हुई मुट्ठियां | कविता | डॉ शरद सिंह

रीती हुई मुट्ठियां
         - डॉ शरद सिंह
सुबह
सूरज की किरणों के साथ
सहेज कर रखी
एक मुट्ठी आशा
और
एक मुट्ठी उत्साह,
भर गई थीं
दोनों मुट्ठियां

घड़ी के कांटों के साथ
सरकते गए
सेकंड्स, मिनट्स
और घंटे
लुढ़कता गया 
पहर
किसी गेंद की तरह

ढीली पड़ती गई
मुट्ठी की पकड़
फिसल गई
रेत की भांति
आशा और
उत्साह

कचोटने लगा
अपना होना
चुभने लगा
अस्तित्व ख़ुद का
वृथा लगने लगा
लिखा हुआ ख़ुद का
ख़ुद से ही उचटने लगा
मन
गिरने लगे अक्षर
लैपटॉप की स्क्रीन से
ठिठकने लगी उंगलियां
ठहरने लगे विचार

शाम के बाद
शनैः शनैः आती रात
रीती हुई
मुट्ठियों के साथ
गुज़रेगी
ओढ़कर
अवसाद का लिहाफ़
और 
डबडबाती रहेंगी आंखें
तक़िया भिगोती हुईं।
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31 October, 2021

एक और शाम | कविता | डॉ शरद सिंह

एक और शाम
    - डाॅ शरद सिंह

एक और शाम
उदासी के पोखर में
आ गई डुबोने

नहीं जाएगी 
एकांतिक शीत
किसी भी
लिहाफ़ या कम्बल से
न शाॅल, न स्वेटर से

अब कहां
वह उष्मा
जो मिलती 
गोद में सिर रखने से
अब वह 
गरमाहट कहां
जो शब्दों की चाय संग
उतर जाती
दिल में

बुझ गई
ममत्व की अंगीठी
दब गए अंगारे
त्रासदी की राख तले
अभी तो कार्तिक ही आया
आएगा पूस और माघ भी
जब फेंकेगा हीटर-ब्लोअर 
सन्नाटे की ठंडी हवा
कैसे कटेंगी वे
जड़कारे की शामें
दहशत होती है
सोच कर अभी से

ओ शीत !
किसने कहा 
कि तुम आना
उनके पास जो
रह गए हैं अकेले
मत दो उन्हें 
अवसाद की सज़ा
जितना झेला
वह कम नहीं क्या?
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30 October, 2021

शाप की एक और किस्त | कविता | डॉ शरद सिंह

शाप की एक और किस्त
          - डॉ शरद सिंह

धीरे-धीरे टहलता हुआ
आ रहा जाड़ा,
उदास
अवसादी शाम
घोल रही है सूनापन
आंखों की नमी में

गहराने लगता है
संसार की 
नश्वरता का बोध
और एकाकीपन का
बर्फीला अहसास
मन दौड़ता है 
मकरोनिया चौराहे
या सिविल लाईन की
गहमागहमी की ओर

बेचारा, 
बेवकूफ़ मन!
भीड़ के रेले में
तलाशता ठहराव,
हार-थक कर लौटता
सिमटता
अपने एकांत के खोल में
किसी कछुए की तरह
या 
शापित यक्ष की भांति
हो जाता है 
प्रतीक्षारत 
शापमुक्त होने के लिए

शाप
अभी जाड़े में 
और गहराएगा
जब होते जाएंगे
दिन छोटे
और रातें लम्बी
मानो प्रकृति भी 
देगी सज़ा
यक्षी-मन को
बंद कमरा
भर जाएगा 
सिसकियों से
किसी बीहड़ में
सांय-सांय करती
ध्वनि की तरह
निःशब्द रुदन से
शाप की एक और
किस्त बन कर।
      ---------
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Truth of life | Poetry | Dr (Miss) Sharad Singh

Truth of life
       - Dr (Miss) Sharad Singh

I never saw but 
feel my pain.  
I have never seen but 
feel love. 
I have never felt but 
seen a falling star.  
That is, 
everything felt
cannot be seen 
and 
everything seen 
cannot be felt.
This is 
the truth of life.
       ----------
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28 October, 2021

क़िस्से | कविता | डॉ शरद सिंह

क़िस्से
        - डॉ शरद सिंह
बंद कमरों में 
लेते हैं जन्म 
क़िस्से कई बार
और रह जाते हैं 
बंद कमरों में ही

नहीं कोई चर्चा करता
दीवारों के उस पार उनकी
नहीं जान पाता पीड़ा
दीवारों के पार उनकी
वे सोए रहते हैं
खोए रहते हैं 
दबे रहते हैं
बंद कमरों में ही

क्योंकि वे क़िस्से
होते हैं स्त्री-जीवन की
त्रासदी के
शोषण के, उत्पीड़न के
घरेलू हिंसा के
ये हैं वे क़िस्से 
जो कभी
लांघ नहीं पाते हैं
घर की चौखट
दरवाज़ा खुला रहने पर भी।
          --------------
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23 October, 2021

शब्द-शक्ति | कविता | डॉ शरद सिंह

शब्द-शक्ति
    - डॉ शरद सिंह
शब्द 
शब्द को दुत्कारते हैं
शब्द 
शब्द को पुचकारते हैं
शब्द 
शब्द को बचाते हैं
शब्द 
शब्द से निभाते हैं
शब्द 
शब्द को चुराते हैं
शब्द 
शब्द को पकड़वाते हैं
शब्द 
शब्द को उठाते हैं
शब्द 
शब्द को गिराते हैं
शब्द 
शब्द को नचाते हैं
शब्द 
शब्द को घुमाते हैं
शब्द 
शब्द का रास्ता बदलते हैं
शब्द 
शब्द के साथ चलते हैं
शब्द
शब्द से प्रेम निभा देते हैं
शब्द
शब्द से झगड़ा करा देते हैं
शब्द 
शब्द को ज़िंदगी देते हैं
शब्द 
शब्द की जिंदगी लेते हैं
शब्दों को
दरकार नहीं ध्वनि की
लिखे हुए शब्द
शब्द ही नहीं
इंसानी-धड़कन भी
बंद करा देते हैं
न्यायाधीश की
कलम की नोंक
टूटने के बाद।
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20 October, 2021

शरद का चांद | कविता | डॉ शरद सिंह

शरद का चांद
          - डॉ शरद सिंह
शरद पूनम का चांद 
पूरा है
पर
भीतर से
अधूरा है

या फिर
मेरी उदास आंखें
छलछला उठी
उसे देखते ही
और 
दिखने लगा
चांद भी उदास

यादों के धब्बे
कैसे धोएगा चांद
मुझे पता नहीं
और कब तक
रोएगा चांद
मुझे पता नहीं

पता है तो
सिर्फ़ इतना कि
उदासी शीत
उतरा करेगी आंगन में
और
दूब की नोंक पर
दिखेंगे रात के आंसू
बड़े भोर से

शुक्लपक्षी बन कर
उड़े आकाश में
या छिप जाए
कृष्णपक्षी बन कर
चांद उदास रहेगा
ऋतु शरद उदास रहेगी
उदास रहेगी रात
व्यस्तता भरा दिन लिए
सूर्य के आने तक
      -----------
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17 October, 2021

अब तो चाहिए | कविता | डॉ शरद सिंह

अब तो चाहिए...
          - डॉ शरद सिंह
बहुत थकान होती है -
उधार के रिश्तों को 
जीते हुए, 
जैसे ओढ़ी हुई मुस्कान
थका देती है होंठों को
गालों को 
और आंखों की कोरों को
हां,
बहुत थकान होती है -
जब रिश्तों को जीते हैं
रिश्तों के बिना
जीत की उम्मींद में
फेंके हुए पासों की तरह।

और थक-हार कर 
अकसर सोचता है मन
ये ज़िन्दगी 
थकी-थकी सी है
अनुबंधों के लिबास तले
ओह, अब तो चाहिए 
एक सुई या पिन
जिससे उधेड़ा जा सके
इस लिबास की सीवन को।
         ----------------
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16 October, 2021

अनजाना मुस्तक़बिल | ग़ज़ल | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

ग़ज़ल 
अनजाना  मुस्तक़बिल
           - डॉ (सुश्री) शरद सिंह

निपट  उदासी   बैठी  है  घर  डेरा  डाले
हर  कोने  में  सूनेपन  के   मकड़ी जाले

भरी   दोपहर  अंधियारा  छाया लगता है
या  फिर  दिन  ही  हो बैठे हैं काले-काले

उसकी  बातें   बसी   हुई  हैं  दीवारों   में
इक-इक लम्हा अब तो उसके हुआ हवाले

कब  तक कोई  खुद के  आंसू को  पोंछेगा
तनहा दिल क्या तनहाई को खाक सम्हाले

अनजाना  मुस्तक़बिल*  बैठा  दरवाज़े पर
पलक झपकते  चले गये  दिन  देखे-भाले
               -----------------
*मुस्तक़बिल = भविष्य
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14 October, 2021

वह लड़का | कविता | डॉ शरद सिंह

वह लड़का
          - डॉ शरद सिंह
वह 
जीवन के नाम पर
एक 
जीता-जागता धोखा

अपनी मां की 
हड़ीली कमर पर
कैंया चढ़ा
उम्र दो साल
वज़न कुल सवा चार किलो
पसलियों से चिपकी चमड़ी
लोहार की धौंकनी-सी
चलती सांसें
ज़रिया है उसका वज़ूद
भीख मांगने का
उसकी मां के लिए,
उसके बाप के लिए,
उसके 
बिज़ूका भाई-बहनों के लिए

अपनी बड़ी-बड़ी आंखें से
दुनिया को देखता
कंधों से लटकी
फटी बुशर्ट 
कटे पंखों सी लटकी
तन नहीं ढांपती उसका
चीथड़े-सी निकर
कूल्हे भी रखती उघारे
धूप, बारिश, जाड़ा
गुज़ारेगा वह इसी तरह,
जब तक रहेगा जीवित

उसे पता नहीं
वह एक
बेहतरीन शो-पीस 
बन सकता है
अगर किसी दिन
किसी को 
कुपोषण के 
विज्ञापन के लिए 
उसकी जरूरत पड़ी,
उसका पिचका-भुखाया पेट 
और एक-एक पसलियां 
चमक उठेंगी 
विशालकाय होर्डिंग्स पर

उसे एक दाना नहीं,
पर मिल जाएगा 
विज्ञापन करने वालों को 
करोड़ों का अनुदान
किसी भी देशी-विदेशी संस्था से,
और वह लटका रहेगा 
अपनी मां की 
हड़ीली कमर पर 
इसी तरह 
अपनी आखिरी सांस तक,
सांसे 
जो शायद कुछ महीने 
या साल भर 
और चल जाएं 
या सिमट जाएं कुछ ही दिन में

फ़िलहाल
उसे सभी ने देखा होगा 
अपने अपने शहर में।
           ---------------
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12 October, 2021

डॉ शरद सिंह सागर की 2021 की 'पिंक सागर' की 100 शक्तिशाली महिलाओं में

पिंक सागर! मेरा नाम सागर की 2021 की 100 शक्तिशाली महिलाओं की आपकी सूची में है...
 इस सम्मान के लिए हार्दिक धन्यवाद 🙏

Pink Sagar! my name is in your list of Sagar's 100 Powerful Women of 2021...
Hearty Thanks for this Honour 🙏
#pinksagar
#100PowerfulWomen
#Sagar #WomenPower 
#Thanks #Honour

10 October, 2021

सयानी लड़की | कविता | डॉ शरद सिंह

सयानी लड़की
     - डॉ शरद सिंह

वह लड़की
अपने हड़ीले
कमज़ोर दिखने वाले
बाएं कांधे पर
लाद कर 
प्लास्टिक की बोरी
घूमती है
एक छोकरे के साथ
जो यक़ीनन भाई है उसका

वह बीनती है
भाई के साथ
दारू के खाली पाऊच
और डिस्पोज़ल गिलास
दारू की दूकान  के सामने
अलसुबह से,
जब लोग 
दौड़ रहे होते हैं
अपनी सेहत बनाने

चिरकुट फ्राक वाली
वह आठ सालाना लड़की
जानती है कि
उन पाऊच और गिलासों में
वे भी होंगे
जिन्हें इस्तेमाल किया होगा
कल देर शाम गए
उसके पियक्कड़ बाप ने

हर दिन वह
बीनती है पाऊच और गिलास
बदले में हर दिन
कबाड़ी से पाती है
बीस रुपए
हथिया लेता है उसमें से
पांच रुपए भाई
दस रुपए बाप
और बचे पांच
वह रख देती है
अपनी कुटी-पिटी मां की
सख़्त हथेली पर
स्वेच्छा से
और खुश हो जाती है
पुंगी पा कर बासी रोटी की

है न लड़की सयानी?
   -----------

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09 October, 2021

असंभव-सा संभव | कविता | डॉ शरद सिंह

असंभव-सा संभव

     - डॉ शरद सिंह
किसी भी समय
उठने लगती हैं
सीस्मिक तरंगें
कांपने लगती है
भावनाओं की सतह
सरकने लगती हैं
विश्वास की
टेक्टोनिक प्लेट्स

मेरी सांसोंं का
सिस्मोमीटर
निरंतर बनाता है ग्राफ
धड़कन के
रिक्टर स्केल पर
और करता है कोशिश
नापने की
पीड़ा से उपजे
भूकंप की तीव्रता को

दौड़ती है तेजी से सुई
और
लॉगरिथमिक प्वाइंट
दर्शाता है तीव्रता
कभी सात 
तो कभी दस

यह असंभव-सा
संभव,
करता है
विचलित मुझे कि
विध्वंस के
अंतिम बिन्दु पर
पहुंच कर भी
बची हुई है
मेरे अस्तित्व की धरती

ये तो हद है-
सोचने लगे हैं
मेरी पीड़ा के
सिस्मोलॉजिस्ट

हैरत तो होगी ही
महाविनाश से
गुज़र कर भी
कोई बचता है भला?
     ----------

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08 October, 2021

अपराधी | कविता | डॉ शरद सिंह

अपराधी
        - डॉ शरद सिंह

मेरी ख़ुशियों की
मृत देह को
कोई जांचे
मेग्नीफाईन ग्लास से
और कर ले मिलान
मेरी क़िस्मत के लेखे से
तो उसे मिलेंगे
शव की गर्दन पर
तुम्हारे ही फिंगरप्रिंट
हर फोरेंसिक जांच में

तुम्हारे ही पैरों के निशान
मेरे आसपास

स्निफर डॉग पाएगा
तुम्हारी ही गंध
मेरे घर से

हर साक्ष्य
चींख-चींख कर
करेगा इशारा तुम्हारी ओर

मगर
तुम बच निकलोगे साफ़
तुम्हारी सर्वसत्ता
बचा लेगी तुम्हें
हमेशा की तरह,
बावज़ूद
हत्या का 
जघन्य अपराध 
करने पर भी

किन्तु नहीं करेंगी माफ़
मेरी मृत ख़ुशियां तुम्हें
और मैं भी नहीं,
हे ईश्वर !
तुम मेरे अपराधी हो
और
रहोगे सदा अपराधी ही
सबूत और दलीलों से भरी 
मेरी अदालत में
हमेशा-हमेशा।
     ----------

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04 October, 2021

छापामार उदासी | कविता | डॉ शरद सिंह

छापामार उदासी
        - डॉ शरद सिंह

उदासी
किसी छापामार की तरह 
आ धमकती है- 

बादलों से घिरी
अंधियारती शाम 
या फिर
किसी की याद,
किसी का छोड़ जाना,
किसी मित्र का
हो जाना अजनबी

पेंसिल की नोंक का
पहले ही शब्द पर टूट जाना,
चुक जाना पेन की रिफिल का
चार अक्षर लिखते ही

बात करने की
बलवती इच्छा पर
नेटवर्क व्यस्त मिलना,
या फिर, यूं ही अचानक
अकेला महसूस करना ख़ुद को

बस, एक बहाना
कोई भी, कैसा भी
उदासी 
हरदम 
फ़िराक में रहती है
आ धमकने की
चैन के दो पल भी
ज़ब्त कर लेने की
हताशा-निराशा का 
पंचनामा
लगा देता है
उस पर मुहर
मुस्तैदी से।
    ------------

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03 October, 2021

सपन कपासी | नवगीत | डॉ शरद सिंह


नेह पियासी

   - डाॅ (सुश्री) शरद सिंह


मीलों लम्बी

घिरी उदासी

        देह ज़रा-सी।


कुर्सी, मेजें,

घर, दीवारें

सब कुछ तो मृतप्राय लगें


बोझ उठाते

अपनेपन का

पोर-पोर की तनी रगें


बंज़र धरती

नेह पियासी

       धार ज़रा-सी।


गलियां देखें

सड़के घूमें

फिर भी चैन न मिल पाए


राह उगा कर 

झूठे   सपने

नई यात्रा करवाए


रोती आंखें

सपन कपासी

     रात ज़रा-सी।

--------

02 October, 2021

कौन हैं गांधी | कविता | डॉ शरद सिंह

कौन हैं गांधी?
        - डॉ शरद सिंह

गांधी 
मात्र एक शब्द नहीं
मात्र एक उपनाम नहीं
बन जाता है एक विचार 
जब उसमें जुड़ जाते हैं संबोधन
गिरमिटिया
बापू
या महात्मा!

गांधी 
मात्र एक शब्द नहीं
मात्र एक उपनाम नहीं
बन जाता है
जीवन जीने का ढंग
जब उसमें समा जाती है
सत्यता, सादगी और
सहजता

गांधी
नोटों पर छपी 
सिर्फ़ तस्वीर नहीं
वह तो 
समूचे विश्व में
साख है, गारंटी है
भारतीयता की।

कौन हैं गांधी?
क्या वही
जिसके सीने में
उतार दी थीं गोलियां
गोडसे ने।

नहीं,
गांधी
सिर्फ़ वही नहीं
जितना हमने सुना, पढ़ा
गांधी को 
जान सकता है वही,
पूरी तरह
जिसने भी
कभी किया हो
सत्य के साथ कोई प्रयोग,
गांधी को 
जान सकता है वही
पूरी तरह
सिर्फ़ वही!
    ------------ 
#शरदसिंह #डॉशरदसिंह #डॉसुश्रीशरदसिंह
#SharadSingh #Poetry #poetrylovers
#World_Of_Emotions_By_Sharad_Singh #HindiPoetry #हिंदीकविता #कविता #हिन्दीसाहित्य
#महात्मागांधी #गांधीजयंती

30 September, 2021

डॉ शरद सिंह की कविता "दूर, बहुत दूर" का पंजाबी में अनुवाद प्रकाशित

मेरी कविता "दूर, बहुत दूर" का पंजाबी अनुवाद "प्रतिमान" जुलाई-सितंबर 2021अंक में प्रकाशित हुआ है जिसके लिए मैं पंजाबी एवं हिन्दी के चर्चित साहित्यकार डॉ अमरजीत कौंके की अत्यंत आभारी हूं🙏
हिन्दी भाषी मित्रो के लिए अपनी मूल हिन्दी कविता भी यहां दे रही हूं-
दूर, बहुत दूर
       - डॉ शरद सिंह

घर की क़ैद से निकल कर
दूर, बहुत दूर निकल जाने की इच्छा
बलवती होने लगी है
इन दिनों

अख़बारों की
कराहती सुर्खियों से दूर
मृतक आंकड़ों की
चींखों से दूर
सांत्वना के निरंतर
दोहराए जाने वाले
बर्फीले शब्दों से दूर

अस्पताल परिसर की
यादों से दूर
बंद ग्रिल के पीछे
कोविड वार्ड के
ख़ौफ़नाक अहसास से दूर
आधी रात के बाद
फ़ोन पर आई
उस हृदयाघाती सूचना से दूर

शासन तंत्र की
ख़ामियों से दूर
घोषणाओं की
झूठी उम्मींदों से दूर
जनता की
आत्मकेन्द्रियता से दूर
प्रजातंत्र के राजा की
नींदों से दूर

कहीं दूर...
बहुत दूर
जहां सागौन का हो जंगल
संकरी पगडंडी
एक पतली नदी
एक झरना
एक कुण्ड
देवता विहीन
प्राचीन मंदिरों के अवशेष
बंदरों की हूप
और पक्षियों की आवाज़ें

वहां
जहां मैं प्रकृति में रहूं
और प्रकृति मुझमें
न कोई बनावट
न धोखा, न छल
न पंजा, न कमल
ले सकूं खुल कर सांस
प्रदूषण रहित हवा में
न ढूंढना पड़े जीवन
वैक्सीन या दवा में

शायद तब मैं
जी लूंगी
एक बार फिर
जी भर कर।
     ------------

#poetry #DrSharadSingh #TranslatedInPunjabi
#HindiPoetry

27 September, 2021

कविता एक नदी | कविता | डॉ शरद सिंह

कविता एक नदी
      - डॉ शरद सिंह

नदी 
पहाड़ों के अपने 
उद्गम से निकल कर
बहती है
पठारों की ओर
अनगिनत घाटों में
स्नान करते हैं लोग
उसके जल में
पाप धोते
मोक्ष प्राप्त करते
खेती-किसानी
और सब्ज़ियां उगाते
खुश रहते हैं
उस बेघर हुई
नदी को देख कर
जिसे है पता कि
वह कभी नहीं 
लौट कर
देख सकती
अपने घर को-
अपने उद्गम को

नदी से
जब छूटता है उसका
उद्गम स्थल
तब से वह
बन जाती है प्रवाह
अन्य के जीवन का आधार
संस्कृति का विस्तार
विछोह की पीड़ा से उपजा
एक सनातन संसार

नदी 
कुछ नहीं करती स्वयं
बाढ़, उफान, शांति
होता है स्वतः
सब कुछ

यह जाना मैंने
तब
जब
मेरा रुदन
जब उतरा 
मेरी कविता में
और वह 
सिर्फ़ मेरा नहीं रहा,
एक नदी बन गया
न चाहते हुए भी।
       -----------

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#World_Of_Emotions_By_Sharad_Singh #HindiPoetry #हिंदीकविता #कविता #हिन्दीसाहित्य

25 September, 2021

यही तो होता है | कविता | डॉ शरद सिंह

यही तो होता है

- डॉ शरद सिंह

कुछ शब्दों को
पकड़ते ही
पसीजने लगती है हथेली
फड़कने लगती हैं
धमनियां
धौंकनी बन जाता है
हृदय,
हो जाता है तीव्रतर 
स्पंदन
चौड़े हो जाते हैं नेत्र
कांपते हैं होंठ
ठिठक जाती हैं
ध्वनियां,
कुंद हो जाती है बुद्धि
जाग उठती है हठधर्मिता
बढ़ जाती है
वर्चस्व की भावना
वे मायावी शब्द
जकड़ लेते हैं
अपने इंद्रजाल में
फिर नहीं दिखता
उनके सिवा कुछ भी
बढ़ जाती है आत्ममुग्धता

यही तो होता है
प्रेम,
युद्ध
और
राजनीति में,
सब कुछ
समझते हुए भी
समझ से परे
नासमझी की हद तक।
     ----------

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24 September, 2021

तनहाई | ग़ज़ल | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

  ग़ज़ल
           तनहाई है
          - डॉ शरद सिंह
चौतरफा   सन्नाटा है,    तनहाई है 
देखो, क़िस्मत कहां मुझे ले आई है 

दीवारों से बातें करना कठिन हुआ
मेरे  दुखड़े  से  छत  भी   घबराई है 

हरपल आंखों में आंसू भर आते हैं
बेबस दिल  की ये कैसी भरपाई है

जिसने, जिसने मुंहफेरा है जाने दो
नाम लिया तो उनकी ही रुसवाई है

अरमानों के नेज़े  आंधी  से  चलते
जिस्म को चुभने वाली हर पुरवाई है

झूठे हर्फ़ों  की  इतनी  भरमार हुई
स्याही भी काग़ज़ से अब शरमाई है

"शरद" हौसले की पतवारें साबुत हैं
कश्ती   भर   चट्टानों  से  टकराई है
                 --------------  
#तनहाई #डॉशरदसिंह
#Ghazal #शेर #Shayri #Poetry 
 #Literature #शरदसिंह  #डॉसुश्रीशरदसिंह #ग़ज़ल
#SharadSingh #ShayariLovers 
#World_Of_Emotions_By_Sharad_Singh

19 September, 2021

वह नहीं आई | कविता | डॉ शरद सिंह

वह नहीं आई
      - डॉ शरद सिंह

वह गाय
जो रोज़
मेरे घर के दरवाज़े पर
आ खड़ी होती
करती जुगाली
उम्मीद करती
कुछ छिलके पाने की
एकाध बासी रोटी पाने की
आज वह नहीं आई

मैं जानती हूं
उसका है कोई मालिक 
पूरा का पूरा कौलिक

दुह कर दूध
भगा देता है 
अपने घर से,
शाम के बाद ही
लौट पाती है वह
 
सुबह फिर वही
दिनचर्या

दिन भर 
यहां-वहां डोलती
मार खाती
अपने बड़े से शरीर को
दो-चार टुकड़ों पर जिलाती,
शायद
अपने गाय होने को कोसती
या फिर
'माता' कहे जाने पर
शर्मिंदा होती,
अपनी सुंदर
काली आंखों से देखती
मेरे दरवाज़े जब
गोबर कर जाती
मुझे बेसाख़्ता
झुंझलाहट से भर जाती

पर
आज नहीं आई वह
क्या हुआ उसे?
मालिक ने 
बेच तो नहीं दिया
बूचड़खाने में?
बूढ़ी इंसानी मांए भी
निकाल दी जाती हैं घर से
फिर वह तो
महज़ गाय है
मुझे क्यों होना चाहिए दुखी
उसके न आने पर
मगर
क्या करूं 
बिछड़ने का दर्द
हर बार 
कर देता है विचलित
चाहे मां हो या गाय।
--------------------
(*कौलिक=पाखंडी)

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17 September, 2021

फ़िलहाल | कविता | डॉ शरद सिंह

फ़िलहाल
      - डॉ शरद सिंह

रात की 
स्याह दीवार पर
चांद का खूंटा
ढो रहा है
तारों की चुनरी को

आमवस में
ढंक जाता है खूंटा
रह जाती है
दिदिपाती चुनरी

चाहे पूर्णिमा हो
या अमावस्या
आकाश सुरक्षित है
चुनरी के लिए
 जबकि धरती पर
सुरक्षित नहीं चुनरी
शोहदों से
निर्भयाओं के साथ
हो रहे जघन्य अपराध
नहीं रच सकते
भयमुक्त समाज

धरती से 
आकाश ही भला है
फ़िलहाल।
  -------------

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12 September, 2021

रद्दीवाला | कविता | डॉ शरद सिंह

रद्दीवाला
    - डॉ शरद सिंह

वो चिरकुट-सा कबाड़ी
रोज गुज़रता है
मेरे घर के आगे से,
पुरानी घिसी 
मर्दानी सायकिल चलाता
आवाज़ लगाता
पुकारे जाने पर
मुस्तैदी से रुक जाता

मोल-भाव
सुतली बंधे तराजू के 
खोटे बांट,
जंजीरों की खनखन
अख़बारों के पन्ने
चढ़ते जाते
रद्दी के भाव

मैली ज़ेब से
तुड़े-मुड़े नोट
निकालता, गिनता
थमाता और
समेटने लगता
बासी ख़बरों और 
विज्ञापनों के ढेर को

कैरियर में बंधे बोरों में
ठूंस कर रद्दी
आगे बढ़ जाता
फिर पैडल मारता
फिर आवाज़ लगाता
गोया
ज़िंदगी भी हमें
रद्दी की भांति तौल कर
समेटती जा रही है
सांसों के चंद छुट्टों के बदले
एक कुशल रद्दीवाले की तरह।
      ----------------

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11 September, 2021

मुखौटे | कविता | डॉ शरद सिंह

 
 मुखौटे
- डाॅ शरद सिंह

थक गई हूं अब
सहानुभूति के खोखले शब्दों से
मेरी अपदा में 
अपना अवसर ढूंढने वालों से
वक़्त के साथ चेहरों से
उतरने लगे हैं मुखौटे

‘फ़ोन नहीं उठता’ का
उलाहना देने वाले -
कुछ ने 
मेरी त्रासद रात में
नहीं उठाया था मेरा फ़ोन
नहीं सुनी थी मेरी पुकार
नहीं दिया था
अपनी आवाज़ का भी सहारा

कुछ ने 
मेरे रुदन से 
अपने कानों को बचाने के लिए
मुझे नहीं किया फ़ोन
नहीं बोले दो शब्द
सांत्वना के

कुछ ने 
प्रतीक्षा की मेरे टूटने की
बिखरने की
अपने हाथों, अपना 
अस्तित्व मिटा देने की
अफ़सोस कि मैंने
निराश किया उन्हें

कुछ ने 
बात की
मगर ज़ल्द ही
मान लिया मुझे भी
मृत समान
जिसके ऊपर से गुज़र कर
आगे बढ़ने का 
साफ़ था रास्ता उनके लिए

कुछ ने 
कुछ दूर साथ दिया
फिर डर गए वे 
दुनिया से 
या अपने-आप से,
यह तो वही जानें

कुछ हैं आज भी साथ
बेहिचक, बेझिझक 
निःस्वार्थ (शायद),
छान देगा समय 
उनको भी 
प्रेम और इंसानीयत की 
छन्नी से

देखूंगी
कौन देता है साथ मेरा
मेरे अंत तक
फ़िलहाल उकताने लगी हूं
अपनी बेचारगी से

नहीं चाहिए मुझे दया,
नहीं चाहिए मुझे 
बहादुरी का तमगा,
नहीं चाहिए मुझे 
झूठा अपनापन

इन सबसे-
बेहतर है मेरा अकेलापन
मुझे नहीं जाता छोड़ कर,
मुझसे नहीं बोलता झूठ,
नहीं करता दावे 
मेरे आंसू पोंछने के,
वह मेरे साथ था
उस त्रासद रात भी,
है आज भी
और रहेगा हमेशा
मेरे साथ,
एक सच्चे,
बिना मुखौटे के
इंसान की तलाश में,
तलाश-
जो जानती हूं
कभी पूरी नहीं होगी
इस
बाज़ारवाद की दुनिया में
     -------

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10 September, 2021

फिर भी पधारो गणपति | कविता | डॉ शरद सिंह

फिर भी पधारो गणपति !
           - डॉ शरद सिंह
हे एकदंत पधारो 
इस कराहते घर में
जो जूझ रहा है 
अपनों को खो कर
अपने एकाकीपन से

हे गजानन पधारो
इस रुदन करते आंगन में
जो लौट कर नहीं आ सका
यहां से चिकित्सालय जाने वाला

हे गजकर्ण पधारो
मेरी उस अनंतर्ध्वनि में
जिसमें आज भी प्रश्न
गूंजता है कि
क्यों नहीं सुनी थी
तुमने मेरी पुकार
मेरी चीत्कार

हे भालचंद्र पधारो
मेरे जीवन के 
उस गहन अंधकार में
जिसमें तुम
उजाला नहीं भर सके
और न कभी भर सकोगे

हे बुद्धिनाथ पधारो
जिन्हें बुद्धि दिया तुमने
वायरस बनाने
और फैलाने का
सारी दुनिया को
रुलाने का,
उनकी बुद्धि का
परिणाम देखो
हो गए अनाथों पर
और लगाओ अट्टहास 

भले ही तुमने
नहीं सुना था मेरी पुकार
छीन लिया मुझसे
मेरा सुख-संसार
तुम हो मेरे शत्रुसम
फिर भी पधारो गणपति !
मैं तुम्हें बुलाती रहूंगी
याद दिलाती रहूंगी
कि तुमने ठुकरा दिया था
प्राण-भिक्षा की मेरी
प्रार्थना को,
हां, नहीं सुना था तुमने
फिर भी पधारो गणपति !
      -----------
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09 September, 2021

True relation | Poetry | Dr (Miss) Sharad Singh

True relation
       - Dr (Miss) Sharad Singh

Who stays for whom?  
Who likes whom?  
No one can tell -
who really loves whom?  
Every relationship is selfish There is nothing selfless here.  
They worship the deities Because they want 
boons from them.  
Every need of life has to be fulfilled by parents.  
At the same time, 
parents need support 
from their children in old age. 
 The rest of the relationship makes its own assessment.  
Hope!  
There would have been 
another selfless relationship like a friend in this world.
           ---------------------
#life  #poetry #poetrylovers  #relation #love

08 September, 2021

On that day | Poetry | Dr (Miss) Sharad Singh

On that day
- Dr (Miss) Sharad Singh

I am living 
the dream of life.  
One day 
the sleep will be broken, 
the dream will be broken
and that will be 
my real morning.  
Then there will be 
no loneliness 
and there will be 
no need 
for the heart to beat.  
On that day 
the sun will shine 
over my closed eyes 
and my soul 
will be bathed in light.  
On that day 
I will reach my loved ones.
______________
#life  #poetry #poetrylovers  #invisible  #death #love #dream

07 September, 2021

The Cruelty | Poetry | Dr (Miss) Sharad Singh

The Cruelty
- Dr (Miss) Sharad Singh

Green leaves wither
Colorful flowers dry up
The fire goes out
Water flows,
Whom
We love so much
They die too.

Why do all these 
never come back, 
Like the sun 
the moon, the stars
Those who set 
and come back

Death makes invisible 
all those 
whom we have seen 
over the years 
laughing, talking, walking, running and throbbing

Between happiness 
and sadness,
It is a terrible duel
Why is death so cruel?
______________
#life  #poetry #poetrylovers  #invisible #death #love #duel #cruel

06 September, 2021

These days | Poetry | Dr (Miss) Sharad Singh

These days 
- Dr (Miss) Sharad Singh

These days 
I am living a nightmare 
A nightmare 
that never came 
to my sleep,
Breathing is not easy 
Every breath is creep

Haven't believe in life 
Not even on death  
The question of trusting 
a person 
does not arise at all,
Everything has stopped 
Against an invisible wall.
            ----------------

निर्लज्जता | कविता | डॉ शरद सिंह

निर्लज्जता
       - डॉ शरद सिंह

वह बच्चा
जो बीन रहा है
हर बिकाऊ वस्तु
कचरे के ढेर से
उसे नहीं डर 
न कोविड का
न किसी और संक्रमण का
वह तो
पैदायशी ग्रस्त है
ग़रीबी के वायरस से

वह बच्चा
देखता है सपने
स्कूल का नहीं,
पढ़ाई का नहीं
बस, अपने मोहल्ले का
'दादा' बनने का
ताकि
जिस दूकान से उसे
नहीं मिलती उधार में रोटी
उस दूकान से
वसूल सके 'हफ़्ता'
और ठंडे लोहे की
एक पिस्टल
खुंसी रहे 
उसकी पेंट में पिछवाड़े

वह बच्चा
जो बचा नहीं पाया
अपनी बहन को
बिकने से,
जो छुड़ा नहीं पाया
बाप की दारू,
जो मलहम नहीं लगा पाया
मां के ज़ख़्मों पर,
जो रोज हारता है
अपनी भूख-प्यास से

उस बच्चे से
उम्मीद करना आदर्श की
हमारी निर्लज्जता नहीं
तो और क्या है?
     ----------------
        
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#SharadSingh #Poetry #poetrylovers
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04 September, 2021

त्वचा का आवरण | कविता | डॉ शरद सिंह

त्वचा का आवरण
          - डॉ शरद सिंह

त्वचा के आवरण के भीतर
अस्थि-मज्जा
रचता है
एक ऐसा जटिल संसार
जिसमें 
भावनाओं की सरिता
होती है प्रवाहित
हृदय-उद्गम से
नस-नाड़ियों तक

श्वेत अस्थियां
देती हैं प्रमाण
त्वचा के भीतर  
हर मनुष्य के
एक जैसे होने का
साथ ही बताती हैं
दैहिक विकास के 
उस क्रम को
जिसमें 
नवजातीय तीन सौ अस्थियां
आयु बढ़ने पर
रह जाती हैं
मात्र दो सौ छः

अस्थियां आपस में जुड़ कर
संवारती हैं देह
और उसी संवरी देह से
देह पर, देह के लिए
देह करती है अत्याचार
बहाना बना कर
त्वचा के रंग का,
त्वचा की स्निग्धता का,
त्वचा के जेंडर का

त्वचा
कसमसाती है तब
जब उसके भीतर सुरक्षित
मस्तिष्क की काली करतूतें
लांघ जाती हैं सीमाएं,
मर्यादाएं, चेष्टाएं
त्वचा छोड़ देना चाहती है साथ 
पर विवश है 
कसे रहने के लिए 
तने रहने के लिए 
आवरण बने रहने के लिए 
मनुष्य को सहेजने के लिए
मनुष्यत्व की आशा में
झुर्रियां पड़ने तक
घिस कर पतली होने तक
ओज़ोन परत की तरह।
      ----------
        
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01 September, 2021

उदास दिल को तसल्ली | ग़ज़ल | डॉ शरद सिंह

उदास दिल को तसल्ली न दे सकोगे तुम
यूं  उम्र  भर   तो  मिरे पास न रुकोगे तुम

सलीब ग़म का रखा है मिरे जो कांधे पर
चलोगे  चार क़दम और फिर थकोगे तुम

उठा के सिर को कभीभी नहीं जिया तुमने
हरेक शख़्स के  आगे  में  जा झुकोगे तुम
- डॉ शरद सिंह

 #डॉशरदसिंह #Ghazal #शेर #Shayri #Poetry #Literature #शरदसिंह  #डॉसुश्रीशरदसिंह #ग़ज़ल #SharadSingh #ShayariLovers 
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27 August, 2021

एकांत | कविता | डॉ शरद सिंह

एकांत
     - डॉ शरद सिंह

एकांत
जब बोलने लगे
झींगुर बन कर
एकांत 
जब हंसने लगे
सूखे पत्तों की
खनखनाहट बन कर,
एकांत
जब गलबहियां डालने लगे
बंद कमरे की
दीवारें बन कर,
एकांत
जब हो जाए अपठनीय
दीमक खाई 
क़िताबों की तरह,
एकांत 
जब हो जाए
शापित प्रेम-कविता
की तरह,
एकांत 
जब बनने लगे चेहरा
अपनी ही प्रतिच्छाया का
एकांत 
जब उतरने लगे
देह में
और  
पथराने लगे देह
चलती सांसोंं के बावज़ूद

यही समय होता है
भाग निकलने का 
एकांत की ठंडी
कालकोठरी से
किसी भी दिशा में
किसी भी गली में
किसी भी सड़क पर
बस, एकांत से परे
खुद से
खुद को
बचाने के लिए।
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23 August, 2021

ग्रैफिटी | कविता | डॉ शरद सिंह

ग्रैफिटी
      - डॉ शरद सिंह

पुरानी
प्लस्तर उधड़ी दीवारों पर
करना चाहती हूं मैं
ग्रैफिटी

स्प्रे करना 
उन रंगों को
जो बहुत गहरे
दबे हैं मेरे मन में,
अच्छा लगेगा मुझे
बना देना
एक बड़ा-सा दिल
हथियारों के ठीक ऊपर

एक कबूतर
एक कलम
एक काग़ज़
एक कविता
एक सुखी इंसान
- इनमें से कुछ भी 
या
ये सभी
एक ही दीवार पर
उकेरना है मुझे

बेशक़,
ग्रैफिटी 
ज़िन्दा कर देती है
मरी हुई दीवारों को
मरी हुई भावनाओं को
मरी हुई बहादुरी को
यदि हम ख़ुद को 
जोड़ पाएं
रंगों और दीवारों से
बेझिझक
जैसे 
मृत्यु की ज़मीन पर
जीवन को जी लेना
जी भर कर।
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21 August, 2021

वह एकाकी तारा | कविता | डॉ शरद सिंह

वह एकाकी तारा
     - डॉ शरद सिंह

वह दूर आकाश में
एकाकी तारा
घूम रहा है
अपनी धुरी में
उल्लकाएं भी
उससे बच कर निकलती हैं
दूर-दूर से,
न कोई टकराना चाहता
न कोई अपनाना चाहता
देखें कब तक
दिपदिप करेगा 
वह एकाकी तारा

जिस दिन टूटेगा वह
कई अनजाने लोग
मांगेंगे 'विश'
क्या सचमुच-
किसी का टूटना
ख़त्म होना
इच्छाएं पूरी कर सकता है 
किसी की?

इस प्रश्न का उत्तर पाने
टूटना होगा
उस एकाकी तारे को,
जो फ़िलहाल 
चाहता है जानना
विस्तृत आकाशगंगा में
असंख्य 
अपरिचित 
तारों के बीच
अपने होने का उद्देश्य
और अकुलाकर
ढूंढता है अपना 'ब्लैक होल'
क्योंकि उसने सुन रखा है
जो तारा टूटता नहीं
उसका होता है अंत
'ब्लैक होल' में
जो होती है 
एक अनन्त यात्रा की
शुरुआत
आकाशगंगा से परे
मृत्यु के समकक्ष

अब डरता नहीं
वह एकाकी तारा
न टूटने से
न मृत्यु से।
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16 August, 2021

दस्तक | कविता | डॉ शरद सिंह

दस्तक
        - डॉ शरद सिंह

उसने
दरवाज़े के माथे को
अपनी हथेली की
थाप से चूमा
और 
एक दस्तक रख दिया

काश!
उसने द्वार खुलने तक
की होती प्रतीक्षा
तो व्यर्थ न जाती
दस्तक,
कब्ज़ों और सिटकनी की
सिहरन

और 
निराश न होतीं
वे सारी आशाएं 
जो बंद द्वार के भीतर
बाट जोह रही थीं
एक अदद
दस्तक की

द्वार खुलने पर
उसका न होना
छोड़ गया अंधेरा
भरी दोपहर,
भरपूर उजाले में

शायद उसे पता नहीं
दस्तक का
अपना कोई 
वज़ूद नहीं होता,
होता है वजूद तो
उस हथेली का
जो
जुड़ी होती हैं
कांपती उंगलियों,
चंद सांसों, 
एक धड़कते दिल
और 
प्रेम के ढाई आखर से।
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14 August, 2021

चलो खेलें | कविता | डॉ शरद सिंह

चलो, खेलें !
        - डॉ शरद सिंह

चलो, 
जाति-जाति खेलें
चलो,
धर्म-धर्म खेलें
राजनीतिक गलियारों से
निकल कर
ये खेल
बनते जा रहे हैं 
बुनियादी खेल
सो,
अपडेट तो रहना होगा
खेल भी खेलना होगा
आख़िरकार,
ओलंपिक में भी
शामिल कर दिया 
हमने यह खेल
फिर चलो, खेलें

इससे भी न भरे जी
तो खेल सकते हैं
खेल ऑनर किलिंग का

हर उन्मादी खेल 
बढ़ा सकता है
टीआरपी सुर्खियों का
और गिरा सकता है
जीवनमूल्य
चुटकियों में।
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13 August, 2021

मन का प्लेनेटेरियम | कविता | डॉ शरद सिंह

मन का प्लेनेटेरियम
           - डॉ शरद सिंह

घने, काले बादलों से
आच्छादित आकाश
खो देता है नीलापन
तब कहां बिसात
सूरज, चांद, तारों की
कि दिखा सकें
अपना चेहरा

मगर 
मन के
प्लेनेटेरियम में
दिनदहाड़े
चमकते, धधकते
लुभाते, बुलाते
मनचाहे ग्रह-नक्षत्र,
कभी-कभी 
आवारा उल्लकाएं भी
गुज़र जाती हैं
बिलकुल क़रीब से

वहां है
 दूरबीन
'हब्बल'  से भी 
अधिक शक्तिशाली
मन देख सकता है
हज़ारों आकाशगंगाओं के 
पार भी
कुछ भी

पर छू नहीं सकता
चाह कर भी
बेचारा
लाचार मन।
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07 August, 2021

तेरे जाने से ये दुनिया | ग़ज़ल | डॉ शरद सिंह

ग़ज़ल
     - डॉ शरद सिंह
तेरे जाने से ये दुनिया, वीरानी-सी लगती है
कैसे ज़िन्दा हूं मैं अब तक, हैरानी-सी लगती है 

बड़ा कठिन है वादा करना खुद से जीते जाने का
तुझसे फिर मिल पाने में ही, आसानी-सी लगती है

जिसपे गुज़री है वो रो कर, अपना दिल हल्का करता 
दुनियावालों को तो ये भी नादानी-सी लगती है

उसका होना ही था काफ़ी, दुनिया अपनी लगती थी
अब तो हर महफ़िल, हर मज़लिस बेगानी-सी लगती है

उसके क़दमों में था रखना, ख़ुशियों का हर नज़राना
"शरद" ज़िंदगी की हर ख़्वाहिश, बेमानी-सी लगती है
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