25 June, 2021

प्रेम | कविता | डॉ शरद सिंह

प्रेम
     - डॉ शरद सिंह

उसने सोचा
वह जाएगा
थैला भर प्रेम 
ले आएगा
सब्ज़ी-भाजी की तरह

वह गया
जेबें खाली की
बाज़ार में,
एक-एक टुकड़ा
खरीदता रहा
प्रेम का
दूकानों से

काला-सफ़ेद प्रेम
रंग-बिरंगा प्रेम
मखमली प्रेम
खुरदरा प्रेम
धारदार प्रेम
घिसापिटा प्रेम
हंसता हुआ प्रेम
रोता हुआ प्रेम
हथेली पर रखा प्रेम
आंखों में बसा प्रेम
रूमाल में कढ़ा प्रेम
किताब में लिखा प्रेम

लौट कर घर
उसने जोड़ा
सारे टुकड़े
प्रेम के

और यह क्या?

सारे टुकड़े 
परस्पर जुड़ते ही
बन गया
एक प्रोडक्ट
मल्टीनेशनल कंपनी का
पर
नहीं बना प्रेम
वह ठगा-सा खड़ा
देखता प्रोडक्ट
टुकुर-टुकुर
नहीं मिला प्रेम
ज़ेबें खाली कर के भी
आख़िर 
सच्चा, साबुत प्रेम 
बाज़ारू जो नहीं होता।
        --------------

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24 June, 2021

है ज़रूरी | कविता | डॉ शरद सिंह

है ज़रूरी
      - डॉ शरद सिंह
जब कोई भुला दे
किसी को
तो मानें
कि या तो वह
ड्रामा कर रहा है 
भूलने का 
या फिर 
उसने कभी 
याद रखा ही नहीं।

याद उसे रखते हैं 
जिसे करते हैं प्रेम
यानी उसने 
कभी प्रेम किया ही नहीं

प्रेम है चांद
प्रेम है सूरज
प्रेम है युद्ध
प्रेम है शांति
प्रेम है मृत्यु
प्रेम है जीवन
प्रेम है लौकिक
प्रेम है अलौकिक

हां,
एक तरफा प्रेम भी 
प्रेम ही तो है
कांच में एक तरफा लगे 
पारे से बने दर्पण की तरह 
जो दिखाता है प्रतिबिंब 
भावनाओं का
इसीलिए है ज़रूरी 
पीछे देखने की
दर्पण के
सच को जान लेने के लिए।
           ----------

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23 June, 2021

इश्क़ बिना | कविता | डॉ शरद सिंह


इश्क़ बिना 
      - डॉ शरद सिंह

पुरानी क़िताब के पन्नों-सी
पीली पड़ी यादें
अचानक हरियल हो उठीं
जब मैंने सोचा
अपने कॉलेज के दिनों को
ढीली बेलबाटम और
कसी शर्ट
पोनीटेल में कसे बाल
हाथ में नोटबुक और बॉलपेन
सब कुछ बेपरवाह-सा
पर, चाक-चौबंद क्लासेज
और नोट्स
आश्चर्य कि 
'लव लेटर्स' के बाद भी
मुझे छू न सका था 
इश्क़

सहेलियां और उनके प्रेमी
डिगा नहीं पाए थे
मेरे भीतर के खिलंदड़ेपन को
न होना था, न हुआ 
इश्क़
फिर भी 
कुछ बात थी उन दिनों 
पता नहीं क्या, पर कुछ तो थी

यूं तो था उन दिनों मुद्दा -
ईराक, ईरान, 
गाज़ापट्टी का
था उन दिनों नाम -
आयातुल्लाह खुमैनी,
फीडेल कास्ट्रो का
और था मसला यहां -
बिहार के भूमिहारों का
दलितों का
स्त्रियों का
फिर भी
हम ख़ुश थे अपने आप में
इतने ख़ुश कि 
आज भी हरिया उठता है मन
उन दिनों को याद कर

याद ही तो है
जो निर्बाध, निडर, निःशंक
आती-जाती रहती है,
दिल से दिमाग़ तक
छाती रहती है
वक़्त की क़िताब भले पीली हो
पर रहती हैं यादें 
हमेशा हरी, ताज़ा 
और ओस में नहाई हुई
इश्क़ बिना भी।
      -------------

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21 June, 2021

वॉल ऑफ फेम | कविता | डॉ शरद सिंह

वॉल ऑफ फेम
          - डॉ शरद सिंह

वो सबसे ऊपरवाली तस्वीर...
मैंने पूछा था - कौन-सी साड़ी?
और दूसरे ही पल
सामने थी मेरे 
गुलाबी रंग की साड़ी, चूड़ी 
और लिपिस्टिक

वह बीच वाली तस्वीर...
मेरे पूछ पाने से पहले ही
सामने थी मेरे
पीली सिल्क साड़ी
प्लास्टिक की पीली चूड़ी
और लाल लिपिस्टिक

वह सबसे नीचे वाली तस्वीर...
जिसमें मैं नहीं
तैयारी हुई थीं दीदी
अपने ग़ज़ल संग्रह के
लोकार्पण के लिए
तय की थी उन्होंने नहीं
मैंने उनके लिए
साड़ी, बिन्दी, चूड़ी

दर्जनों तस्वीरें
दर्जनों अहसासात

बदल गए हैं मायने
आज हर तस्वीर के
आज ये सभी तस्वीरें
याद दिलाती हैं मुझे
इवेंट्स की नहीं,
तैयारी 
जाने की इवेंट्स में
आज ये सभी तस्वीरें
याद दिलाती हैं मुझे
उस बहनापे की
जो छिन गया मुझसे
असमय 

मेरे घर के ड्राइंगरूम की 
दक्षिणी दीवार 
जो कभी थी मेरे लिए 
'वॉल आफ फेम'
आज ढल गई है 
यादों की दीवार में
मन को कुरेदते सूने संसार में।
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20 June, 2021

दो दुनियाएं | कविता | डॉ शरद सिंह

पांव-पांव चादर
          - डॉ शरद सिंह

रोज़ रात को 
जब पड़ती हैं बिस्तर पर
सिलवटें
मेरी करवटों से
जागता है रतजगे का अहसास
नापती हूं अपनी चादर को

कभी चादर बड़ी
और पांव छोटे
तो कभी पांव बड़े
और चादर छोटी
किसी दिहाड़ी मज़दूर की 
आमदनी की तरह
कभी कम तो कभी ज़्यादा
चादर बदलती रहती है अपनी नाप
या फिर मेरे पांव ही
होते रहते हैं 
कभी छोटे तो कभी बड़े

नींद की लम्बाई
करती है तय
पांव और चादर की नाप को
और
नींद वश में है बेचैनी के

बेचैनी पढ़ती है पहाड़ा
सत्ते सात, अट्ठे आठ का
मुड़ जाते हैं पांव घुटनों से
हो जाती है चादर लम्बी
सिर ढांपते ही
चादर से बाहर 
निकल आते हैं पांव
तभी घुटता है दम,
फड़फड़ाती है चादर

यह खेल 
हर रात का,
यह खेल पांव-पांव चादर का
आया है मेरे हिस्से में
नियति बन कर।
      ------------

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19 June, 2021

पांव-पांव चादर | कविता | डॉ शरद सिंह

पांव-पांव चादर
          - डॉ शरद सिंह

रोज़ रात को 
जब पड़ती हैं बिस्तर पर
सिलवटें
मेरी करवटों से
जागता है रतजगे का अहसास
नापती हूं अपनी चादर को

कभी चादर बड़ी
और पांव छोटे
तो कभी पांव बड़े
और चादर छोटी
किसी दिहाड़ी मज़दूर की 
आमदनी की तरह
कभी कम तो कभी ज़्यादा
चादर बदलती रहती है अपनी नाप
या फिर मेरे पांव ही
होते रहते हैं 
कभी छोटे तो कभी बड़े

नींद की लम्बाई
करती है तय
पांव और चादर की नाप को
और
नींद वश में है बेचैनी के

बेचैनी पढ़ती है पहाड़ा
सत्ते सात, अट्ठे आठ का
मुड़ जाते हैं पांव घुटनों से
हो जाती है चादर लम्बी
सिर ढांपते ही
चादर से बाहर 
निकल आते हैं पांव
तभी घुटता है दम,
फड़फड़ाती है चादर

यह खेल 
हर रात का,
यह खेल पांव-पांव चादर का
आया है मेरे हिस्से में
नियति बन कर।
      ------------

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18 June, 2021

रंग और कैनवास | कविता | डॉ शरद सिंह

रंग और कैनवास
        - डॉ शरद सिंह

(1)
खाली कैनवास को
आसान है
रंगों से भरना
मगर
आसान नहीं
रंगों में 
खाली कैनवास को रखना

(2)
रंग 
कैनवास पर
कब्ज़ा कर 
मुस्कुराते, इठलाते
मिलते हैं
संवाद करते
और कैनवास
रह जाता है पढ़ता
ब्रश-स्ट्रोक की लेखनी।

(3)
आख्यान है कैनवास पर
लियोनार्डो द विंची की
'द लास्ट सपर'
तो, विद्रोह की दुंदुभी
पिकासो की  ‘गुएर्निका’ 
क्रांति गढ़ती
काज़िमिर मालेविच की
'ब्लैक स्क्वायर'
जो सीख लो
रंगों को पढ़ना
तो पढ़ सकोगे
कैनवास पर रचा
रक्तरंजित
मानव इतिहास।
    ------------
(इतालवी चित्रकार लिओनार्दो दा विंची द्वारा बनाई गई। यह पेंटिंग यीशु का उनके 12 शिष्यों के बीच अंतिम भोजन की घटना को दर्शाता है।
पिकासो ने अपनी पेंटिंग ‘गुएर्निका’  में दूसरे विश्वयुद्ध की भयावहता को दर्शाया जिसके कारण उन्हें देश निकाला दे दिया गया था।
काज़िमिर सेवरिनोविच मालेविच - एक उत्कृष्ट रूसी कलाकार जिसने अपनी पेंटिंग 'ब्लैक स्क्वायर' के जरिए "एक सफेद पृष्ठभूमि पर काले वर्चस्व वाले वर्ग" को ललकारने क्रांतिकारी विचार व्यक्त किया।)

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17 June, 2021

एक पल | कविता | डॉ शरद सिंह


एक पल
      - डॉ शरद सिंह

कांच के 
रंग-बिरंगे कंचे-से दिन को
जब वक़्त की उंगली
गिरा देती है जब गड्ढे में
एक सधी हुई हल्की-सी हरक़त से
समझ में नहीं आता
जीत हुई कि हार
मन बच्चों-सा झगड़ता है
अपने-आप से

सहसा जाग उठते हैं
बचपन के दिन
बड़ों से घिरे,
सुरक्षित,
ज़िद्दी,
निश्चिंत
और 
बंदिशों का घेरा तोड़ कर 
निकल भागने लालायित
जल्दी-जल्दी बड़े हो जाने को आतुर
अपने फ़ैसले ख़ुद लेने के इच्छुक

एक दिन
घेरा टूटते ही
बड़े होते ही
जब रह जाते हैं
निपट अकेले
तब
याद आता है बचपन
याद आते हैं कंचे
याद आते हैं बड़े
याद आती हैं बंदिशें
तब खुद को पाते हैं 
वर्तमान के साथ अतीत के गड्ढे में
जीत और हार
सब बेमानी हो जाते हैं उस पल

अकेलापन
बदल देता है
जीवन का अर्थ
एक पल में
हमेशा के लिए।
     ----------
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15 June, 2021

मेरी याद | कविता | डॉ शरद सिंह

मेरी याद
      - डॉ शरद सिंह
तुम मुझे कैसे याद करोगे
पता नहीं
शायद रात से जूझते
दूज के चांद की तरह
या, दिन में 
रेतीली आंधी में फंसे
सूरज की तरह,
जुगनू की तरह
या तितली की तरह,
या शेल्फ में सजी
किसी सजावटी क़िताब की तरह
सजा कर रखोगे
पर पढ़ोगे नहीं,
या फिर मेरी याद को
बेच दोगे किसी कबाड़ी को
रद्दी अख़बार की तरह,
क्या मेरी याद
कोई अर्थ रखेगी
मेरे जाने के बाद
तुम्हारे लिए?
तुमने तो भुला दीं
गिलोटिन से कटी गरदनें
और बोल्शेविक क्रांति भी
गुलामी की त्रासदी
और युद्ध का क़हर भी
फिर कैसे करोगे
मुझे याद
मेरी याद तो रहेगी बहुत छोटी सी
दूब की नोंक पे रखी
ओस की बूंद जैसी
क्या छू सकोगे
मन की उंगली से?
        ----------------

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13 June, 2021

सिर्फ़ यही चाह | कविता | डॉ शरद सिंह

सिर्फ़ यही चाह
         - डॉ शरद सिंह

वह दिन आएगा
जब बंद हो जाएंगी
मेरी आंखें
थम जाएंगी
मेरी सांसें
देह हो जाएगी निर्जीव
उस दिन 
न भूख होगी
न प्यास होगी
न होगी 
ऑक्सीजन की दरकार
न प्रेम, न सहयोग
न दवा, न दया

उस दिन
मिल जाए मेरे हिस्से की 
रोटी, पानी, कपड़े, छत 
और ऑक्सीजन
उनमें से किसी को भी
जो हैं एकाकी,
दया पर निर्भर
शरणार्थी शिविरों में,
हाथ में कटोरा लिए
मंदिरों के सामने,
हाथ फैला कर दौड़ते
गाड़ियों के पीछे

वह चाहे
स्त्री हो या पुरुष
बूढ़ा या बच्चा
उसे मिले 
मेरे हिस्से का 
सब कुछ अच्छा-अच्छा
सिर्फ़ यही चाह
हो जाए पूरी
विलोपित हो जाएं  
वे सब
जो इच्छाएं
रह गईं अधूरी।
      -------------

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12 June, 2021

मेरी पांच कविताएं | डॉ शरद सिंह | दैनिक सत्यशोधक राही में प्रकाशित

प्रिय ब्लॉगर साथियों, मुंबई से प्रकाशित होने वाले दैनिक "सत्य शोधक राही" के साहित्यिक परिशिष्ट "साहित्य राही" में आज 12.06.2021 को मेरी पांच कविताएं प्रकाशित की गई हैं जिसके लिए मैं सुश्री अलका अग्रवाल सिंगतिया जी की आभारी हूं 🙏
हार्दिक धन्यवाद दैनिक #सत्य_शोधक_राही

11 June, 2021

ज्वार | कविता | डॉ शरद सिंह

ज्वार
       - डॉ शरद सिंह

पीड़ा, प्रेम
आकुलता, व्याकुलता
भावनाओं का ज्वार ही तो है
जो बहा लाता है
अपने साथ यादों को
जो बहा ले जाता है
अपने साथ वादों को

बस, रह जाती है स्तब्धता
कस कर बंधी हुई मुट्ठी में
गीली रेत की तरह
    --------------

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09 June, 2021

उदासी | कविता | डॉ शरद सिंह

उदासी
     - डॉ शरद सिंह

कहने को एक शब्द है
उदासी

लेकिन इस शब्द के भीतर
है एक आदिम गुफा
जहां पुकारने पर
लौटती हैं
अपनी ही ध्वनियां
अपने कानों तक
एक कंपा देने वाली
अनुगूंज के साथ

इस शब्द के भीतर 
हैं रेल की ऐसी पटरियां
जो अब काम नहीं आतीं
जिन पर नहीं गुज़रती
कोई रेल
बेलिहाज़ वनस्पतियों के बीच दबे
स्लीपर्स 
साथ छोड़ने लगते हैं
पटरियों का
बेजान पटरियां सिसक भी नहीं पातीं

इस शब्द के भीतर 
है अबूझ सन्नाटा
शोर की भीड़ में भी
एक जानी-पहचानी ध्वनि को
ढूंढ पाने में असमर्थ 
सन्नाटा
किसी पागलपन की हद तक
उपजा हुआ सन्नाटा
निगल सकता है 
हरेक शब्द को
सिवा इस शब्द के

इस शब्द के भीतर 
है कांच की तरह टूटे हुए
ख़्वाब की किरचें
जो लहूलुहान कर देती हैं
एहसास के
हाथों को, पैरों को
बल्कि समूचे जिस्म को
लहू रिसता है बूंद-बूंद
आंसू बन कर
और देता है जिस्म के
ज़िन्दा रहने का सबूत

कैसे कहूं कि उदासी क्या है?
       --------------

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07 June, 2021

गुनाह | कविता | डॉ शरद सिंह

गुनाह
      - डॉ शरद सिंह

खुद को स्थगित रखने से बड़ा
कोई गुनाह नहीं

स्थगित, थमा हुआ पानी
मारने लगता है सड़ांध

स्थगित, थमा हुआ दिन
भर देता है उकताहट से

स्थगित, पड़ी हुई रातें
तरसती हैं सपनों के लिए

स्थगित व्यवहार 
बढ़ा देता है दूरियां

स्थगित संवाद 
घोंट देता है गला ध्वनियों का

स्थगित लेखन
मिटा देता है शब्दों को

स्थगित होना 
यानी
जीते जी मार देना खुद को

जबकि नहीं है यह समय
स्थगित रहने का
क्योंकि 
विश्वास, प्रेम, सुकून
सब कुछ तो है स्थगित।
    ------------

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06 June, 2021

बढ़ा दो दायरा | कविता |डॉ शरद सिंह

बढ़ा दो  दायरा
          - डॉ शरद सिंह

टूट चुके अंतर्मन में
उठता है एक अज़ब द्वंद्व 
देह से परे
रचती हैं स्मृतियां
देह का इंद्रजाल 
जब तक उपयोगी है देह
साथ देती हैं सांसें भी
तभी तो
कभी आने को आतुर
आया भी तो अनमना-सा
भयभीत, डरा-सा
घाव कुरेदने के अलावा
न कोई चर्चा और
न कोई प्रश्न
क्या यही है 
कथित अपनेपन का
स्याह पक्ष
दोष क्या उसे? 
सभी को बना दिया है समय ने 
संवेदनहीन
कोरोना ने फेफड़ों को ही नहीं गलाया
गला दिया है प्रेम को, 
विश्वास को, आत्मीयता को
एक औपचारिक ज़िन्दगी
कब तक जिएगा कोई?
समय कहता है
बढ़ा दो  दायरा 
आत्मीयता का 
और समेट लो उन्हें भी
जैसे पनाह देता है 
यूनाइटेड नेशंस
शरणार्थियों को
जो जीवित तो हैं
पर
नहीं भी
मर चुकी है धड़कन
मगर उनकी सांसें
अभी भी हैं उनकी देह में।
       ----------

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05 June, 2021

बधाई हो पर्यावरण दिवस की | कविता | डॉ शरद सिंह

बधाई हो
        - डॉ शरद सिंह
सबको
बधाई हो पर्यावरण दिवस की !
चलो आज गिनें 
अपनी पर्यावरणीय प्रगति -

जिसे भगीरथ लाया था
धरती पर
अपने अथक प्रयासों से
ताकि धुल जाएं मानवों के पाप
हो जाएं मुक्त मानवीय आत्माएं
वही निर्मल, पावन गंगा
प्रदूषण से 
कर दिया है लबरेज़ हमने उसे
और तो और,
लाशें उगलती है उसकी रेत
कोरोना से मरने वालों की
पछताती होगी आज गंगा भी
कि वह क्यों उतरी 
शिव की जटाओं से
ख़ैर, बधाई हो पर्यावरण दिवस की !

हमने शहर फैलाए
ज़मीनें हड़पी
और
काट दिए वृक्ष
जंगलों से
क्या खूब ! 
कि आज हमारे अपने
तरस-तरस कर मरे हैं 
दो सांस ऑक्सीजन के लिए
फिर भी हम काटेंगे
बेजान हीरों के लिए
जानदार जंगल
तो क्या, बधाई हो पर्यावरण दिवस की !

ग्लेशियर तो बर्फ़ है
पिघलेंगे ही
समुद्र है तो सुनामी आएगी ही
पर्वत हैं तो होगा भूस्खलन भी
इसमें हम मनुष्यों का क्या दोष?
चिंता भी क्यों करें 
मध्यप्रदेश में नहीं आएगी सुनामी राजस्थान में नहीं पिघलेगा ग्लेशियर
केरल में नहीं ढहेंगे पर्वत
ग्लोबल वार्मिंग
जलवायु परिवर्तन 
हमें इनसे क्या?
तो चलो देखें 
गमले में उगे कैक्टस 
और खुश होकर एक दूसरे से कहें-
बधाई हो 
अपनी पर्यावरणीय तरक्की की
और
पर्यावरण दिवस की !
            ------------

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04 June, 2021

दिल का चेर्नोबिल | कविता | डॉ शरद सिंह

दिल का चेर्नोबिल
         - डॉ शरद सिंह

खुलना लॉकडाउन का
निकलना घरों से
लोगों का
तोड़ देगा चुप्पी
सड़कों, गलियों और चौराहों की।

भय की चादर ओढ़े
धूप रेंगती रहेगी
चेहरे आधे ढंके रहेंगे
आज़ादी होगी और नहीं भी

खुल जाए दुनिया
कितनी भी
नहीं होगा सब कुछ पहले जैसा

एक दुनिया बाहर की
एक दुनिया भीतर की
बाहर की दुनिया
भोपाल गैस त्रासदी के 
दंश को सहलाती आगे बढ़ जाए
मगर सूना घर 
और एकाकी दिल का चेर्नोबिल
शिकार रहेगा उस विकिरण का
जो मिला है 
व्यवस्था की ख़ामियों से 
उसे
जीवन भर तड़पने के लिए।
        --------------

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03 June, 2021

आदिम बद्दुआएं | कविता | डॉ शरद सिंह

आदिम बद्दुआएं 
              - डॉ शरद सिंह

दीवार के उधड़े हुए प्लस्तर से
झांकती हुई ईटों की तरह
बीते हुए सुखद पल
झांकते हैं
रुलाते हैं
अहसास कराते हैं
उनकी पीड़ाओं का-
जिनके परिजन मारे गए
नात्ज़ी कंसंट्रेशन कैम्प में
जिनके परिजन मारे गए
हीरोशिमा, नागासाकी में
जिनके परिजन मर गए
 देश के बंटवारे में
जिनके परिजन मारे गए
ट्विन टॉवर पर हमले में
जिनके परिजन भूख से मर गए
सूडानी अकाल में
जिनके परिजन डूब गए
अवैध शरणार्थी नावों संग
जिनके परिजन मारे गए
इबोला, एंथ्रेक्स, कोरोना से

उन सभी बचे हुओं की 
पीड़ा, क्रोध और अकेलापन
महसूस करती हूं आज
दिल की गहराईयों से
आत्मा की ऊंचाइयों तक
और निकलती है
हर सांस में
आदिम बद्दुआएं उनके लिए
जिन्होंने रचा मौत का तांडव
महज़ राजनीतिक 
महज आर्थिक
महज अमानवीय  लिप्सा के लिए।
        ------------------

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02 June, 2021

दूर, बहुत दूर | कविता | डॉ शरद सिंह

दूर, बहुत दूर
       - डॉ शरद सिंह

घर की क़ैद से निकल 
दूर, बहुत दूर जाने की इच्छा
बलवती होने लगी है
इन दिनों

अख़बारों की 
कराहती सुर्खियों से दूर
मृतक आंकड़ों की 
चींखों से दूर
सांत्वना के निरंतर
दोहराए जाने वाले
बर्फीले शब्दों से दूर

अस्पताल परिसर की
यादों से दूर
बंद ग्रिल के पीछे
कोविड वार्ड के
ख़ौफ़नाक अहसास से दूर
आधी रात के बाद 
फ़ोन पर आई
उस हृदयाघाती सूचना से दूर

शासन तंत्र की
ख़ामियों से दूर
घोषणाओं की 
झूठी उम्मींदों से दूर
जनता की
आत्मकेन्द्रियता से दूर
प्रजातंत्र के राजा की 
नींदों से दूर

कहीं दूर...
बहुत दूर
जहां सागौन का हो जंगल
संकरी पगडंडी
एक पतली नदी
एक झरना
एक कुण्ड
देवता विहीन
प्राचीन मंदिरों के अवशेष
बंदरों की हूप
और पक्षियों की आवाज़ें

वहां
जहां मैं प्रकृति में रहूं
और प्रकृति मुझमें
न कोई बनावट
न धोखा, न छल
न पंजा, न कमल
ले सकूं खुल कर सांस
प्रदूषण रहित हवा में
न ढूंढना पड़े जीवन
वैक्सीन या दवा में

शायद तब मैं
जी लूंगी
एक बार फिर
जी भर कर।
     ------------
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#World_Of_Emotions_By_Sharad_Singh #HindiPoetry

01 June, 2021

उसे पढ़ सकूं | कविता | डॉ शरद सिंह

उसे पढ़ सकूं
     - डॉ शरद सिंह
आसमान की ओर
सिर उठा कर
पढ़ती हूं मैं 
काले-सफ़ेद बादलों की आकृतियां
जैसे
कोई नज़ूमी
कॉफी-कप के तलछठ में
पढ़ती है 
क़िस्मत की आकृतियां

दूसरे का सुख-दुख बांचने वाली नज़ूमी
कभी नहीं बांच पाती है
अपनी क़िस्मत
कभी नहीं जी पाती है
मनचाहा सुख
ठीक वैसे ही
जैसे
चौराहे पर 
तोता लिए बैठने वाला ज्योतिषी
लाचार है इन दिनों
लॉकडाउन में बंद है धंधा
भाग्य है मंदा
पिंजरे से निकल कमरे में
फुदकता है परकटा तोता
सोचता है, काश! उड़ पाया होता

नज़ूमी, ज्योतिषी
तोता और मैं
नहीं पढ़ सकते
अपनी क़िस्मत को
क़िस्मत जो खाती जा रही है जंग
ज़्यादा छूने से उसे
ख़तरा है टिटनेस का
फिर भी चाहती हूं छूना
ताकि उसे पढ़ सकूं
भविष्य जान लेने के लिए।
       -------------

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31 May, 2021

ध्वनियां | कविता | डॉ शरद सिंह

ध्वनियां
     - डॉ.शरदसिंह
मुझे सुनना है-
एन. राजम का वायलिन
हरिप्रसाद चौरसिया की बांसुरी
शिवकुमार शर्मा का संतूर
बीथोवन की सिम्फनी
बाख़ की कम्पोजीशन
मोरीत्सेविच का बैलेम्यू़ज़
ध्वनियां, ध्वनियां, 
ढेर सारी ध्वनियां

आए
समा जाए
मेरे कानों में
एक समुच्चय ध्वनियों का
ताकि दब जाए ध्वनि
असमय खोने से उपजे
अंतःरुदन की।
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30 May, 2021

एक आवाज़ | कविता | डॉ शरद सिंह

एक आवाज़
        - डॉ शरद सिंह
भरी दोपहर में
बादल छाए आज
गरजे भी, बरसे भी
छा गया अंधेरा
कमरे के एक कोने में
सिकुड़ कर बैठी मैं
करती रही प्रतीक्षा
कि आएगी एक आवाज़
देगी उलाहना मुझे-
क्यों नहीं जलाई लाईट?
कितना अंधेरा हैं कमरे में...

या फिर कहेगी-
चलो, बाहर बैठें, बरामदे में
चाय बनाऊं?
कुछ खाओगी?

या फिर पूछेगी वह आवाज़-
डर तो नहीं रहा है हमारा बेटू
बादल गरजने से?
देख, तेरी दीदू तेरे पास है...

ये तो थी बिन मौसम बरसात
क्या होगा
असली बारिश में?
जबकि-
बादल गरजते रहे
पानी बरसता रहा
गहन अंधेरे में 
डूबा रहा कमरा
नहीं आई कोई आवाज़
तरसते रहे कान
सुनने के लिए
दुनिया की सबसे मीठी, मधुर आवाज़
दुलार, प्यार और मनुहार भरी आवाज़
नहीं आई,
सन्नाटा चीरता रहा कलेजे को
रिसता रहा लहू
ताज़्जुब !
कि फिर भी ज़िंदा हूं मैं
उस एक आवाज़ के इंतज़ार में
स्याह अंधेरे कोने में सिमटी हुई।
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जो बचे हुए हैं | कविता | डॉ शरद सिंह | नवभारत में प्रकाशित

मेरी कविता "जो बचे हुए हैं" को आज 30.05.2021  को "नवभारत" के रविवारीय अंक में प्रकाशित किया गया है....

 हार्दिक आभार "नवभारत"🙏


29 May, 2021

सीने में समुद्र | कविता | डॉ शरद सिंह

सीने में समुद्र
           - डॉ. शरद सिंह
एक समुद्र दुख का
हहराता रहता है सीने में
टकराती हैं लहरें तट से
फिर चली आती हैं
रेत पर दूर तक
बिछा जाती हैं -
सीप, घोंघे और शंख
जिनमें रखे होते हैं
यादों के मोती,
प्रारब्ध के वलय
और पवित्र ध्वनियां
प्रेम की, अपनत्व की, 
जीवन के सपनों की
बेशक़, सुंदर बहुत सुंदर
पर 
होते हैं मृत
सीप, घोंघे और शंख
जिन्हें फेंक  देता है समुद्र
गहरे पानी से बाहर उलीच कर
उलीचने का यह क्रम 
नहीं होता कभी ख़त्म
सीने में रहते हैं शेष
अनंत जीवाश्म
जब तक देह में 
रहती है धड़कन
तब तक हहराता है
सीने में समुद्र
और उलीचता रहता है
निर्जीव पदार्थों को
यूं भी, उसका उलीचा जीवन
कभी जीवित नहीं रहता देर तक
दम तोड़ देता है छटपटा कर
जमने लगती है गाद (सिल्ट)
मगर न थमा है समुद्र
न रुकी हैं लहरें
किसी गाद से
न चाहते हुए भी
जीना पड़ता है 
जीवाश्मों के साथ ही।
       ------------

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28 May, 2021

क़लम की नोंक पर ठहरी कविता | कविता | डॉ शरद सिंह

क़लम की नोंक पर ठहरी कविता
                      - डॉ शरद सिंह
मेरी क़लम की नोंक पर
ठहरी हुई
एक कविता
आतुर  है काग़ज़ पर उतरने को
इस कविता में है-
'प्रसाद' की 'कामायनी'
प्रेमचंद की 'पूस की रात'
गुलेरी की 'सुबेदारनी'
कमलेश्वर का 'राजा निरबंसिया'
टॉल्सटॉय की 'अन्नाकरेनीना'
गोर्की की 'मां'
सर्वेंटीज का 'डॉन क्विकजोट'
और
शेक्सपियर की 'डेसडिमोना' भी

यह कविता
कर सकती है प्रेम
लड़ सकती है लड़ाईयां
सुला सकती है कायरता
जगा सकती है विद्रोह

यह कविता जाति, धर्म, रंग से परे
संवाद है 
मनुष्य से मनुष्य का
यह कविता दिखा सकती है
व्यवस्था की ख़ामियां
शासन-प्रशासन की लापरवाहियां

इस कविता के पास
पांच उंगलियां और है एक अंगूठा
जिससे बन सकती है
तर्जनी भी और मुट्ठी भी
यह कविता 
सिखा सकती है जीना
और आवाज़ उठाना

इसीलिए
यह कविता ठहरी है
कलम की नोंक पर
कि लोग तैयार हो जाएं
इसे पढ़ने के लिए
कुछ कर गुज़रने के लिए।
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27 May, 2021

सपने | कविता | डॉ शरद सिंह

सपने
     - डॉ शरद सिंह
कुछ आम से सपने
कुछ नीम से सपने
कुछ पंछी के अधखाए 
अमरूद से सपने
कुछ गिलहरी के कुतरे सपने
कुछ ज़मीन पर उतरे सपने
कुछ पूनम से सपने
कुछ ग्रहण से सपने
कुछ सुलाए रखने वाले सपने
कुछ डरा कर जगा देने वाले सपने
मगर सपनों के लिए शर्त है
कि नींद आए
नहीं आते सपने रतजगे में
जैसे अमावस में नहीं आता चांद
जैसे काले बादल से नहीं गिरती धूप
जैसे पहले-सा नहीं जुड़ता टूटा हुआ कांच
जो देखना चाहे सपने
उसे करना होगा
नींद का जुगाड़

सपने देखना बुरा नहीं
बुरा है टूट जाना सपनों का
जागने से पहले ही।
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बचे रह जाना | कविता | डॉ शरद सिंह

बचे रह जाना
          - डॉ शरद सिंह

पतझड़ ने कर दिया पेड़ को ठूंठ
कुछ भी न बचा
जीवन का चिन्ह
सिवाय एक पत्ते के
जो फड़फड़ा रहा है
तीखी धूप और गर्म हवा में
ख़ुद को कोसता हुआ
कि वही क्यों रह गया शेष
जब सब झरे
तो झर जाना था उसे भी

जैसे सोचता था
वह मोची
जो बैठता था इस पेड़ के नीचे
कि जब ठूंठ हो गया पेड़
तो अब वह बैठेगा 
किसकी छाया में
जब फिर से -
चलने लगेंगी सड़कें
भरने लगेगा कोलाहल
टूटने लगेंगी चप्पलें
फटने लगेंगे जूते
तब उसके पास 
होगी निहाई
होगी रांपी
होगी हथौड़ी
होगी सुई
होगा धागा
नहीं होगी तो 
बस, पेड़ की छाया
मोची उदास है
पत्ता उदास है
उदास है पृथ्वी का हर कोना

पतझड़ पसर गया है
हवा गर्म हो चली है
पांव क़ैद हैं घरों के भीतर

पथरा रही हैं आंखें मोची की
सूख चली हैं नसें पत्ते की
दोनों टूट कर भी
नहीं टूटे हैं
पर क्यों?
वे भी नहीं जानते उत्तर
सिवा बचे रह जाने की पीड़ा के।
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25 May, 2021

एक हंसी | कविता | डॉ शरद सिंह

एक हंसी
     - डॉ शरद सिंह

जाने कब लौटेगी 
वह हंसी
जो चली गई है तुम्हारे साथ
नहीं होगी तुम्हारी वापसी
तो नहीं लौटेगी
हंसी भी

हंसने का अभिनय
सीख रही हूं
धीरे-धीरे
क्यों कि 
किसी को भी नहीं भाता
मेरे रोने का स्वर

भला कौन रखना चाहेगा
दुख से नाता
ख़ुशी गुदगुदाती है सबको
सबको हक़ है
ख़ुश रहने का
दुख और दुखी को ठुकराने का

अगर रखना है संवाद
ख़ुशहाल लोगों से
तो हंसना होगा मुझे भी
एक हंसी, 
दिखावटी ही सही।
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24 May, 2021

गुनहगार | कविता | डॉ शरद सिंह

गुनहगार
      - डॉ शरद सिंह

सुना है
हुआ करते थे
कस्तूरी मृग
जिनकी नाभि में होता था
इत्र
वह इत्र ही बना अभिशाप
न रहे कस्तूरी मृग
और न इत्र

सुना है
हुआ करते थे
लम्बे दांत वाले हाथी
हज़ारों की संख्या में
दांत ही बन गया जंजाल
अब कुछ सौ बचे हैं
दांतों सहित

सुना है
हुआ करते थे
सुनहरी खाल वाले शेर
बड़ी तादाद में
वह खाल ही बन गई काल
अब बचे हैं
संकटग्रस्त जीवों की
श्रेणी में

कुछ समय बाद
हम कहेंगे
बक्सवाहा के जंगलों में थे हीरे
वे हीरे नहीं साबित हुए शुभ
मानवता के लिए
अब न हीरे बचे हैं
और न जंगल

दरअसल,
कस्तूरी मृग नहीं था अभिशप्त
हाथीदांत नहीं था जंजाल
खाल नहीं थी काल
हीरे नहीं थे अशुभ
हमने इन्हें खोया
क्यों कि हम में थे कायर
क्यों कि हम में थे स्वार्थी
क्यों कि हम में थे लालची
क्यों कि हम में थे
प्रकृति के हत्यारे
और गुनाहगार
आने वाली पीढ़ी के।
   -----------------

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घोषणाएं | कविता | डॉ शरद सिंह

घोषणाएं
         - डॉ शरद सिंह
घोषणाएं 
बनती जा रही हैं
एक चमचमाता हुआ पोस्टर
जो सक्षम है छिपाने में,
ध्यान बंटाने में 
दीवार की बदसूरती से
लेकिन काम नहीं आता
ओढ़ने-बिछाने के भी
यानी
इस  आपदा के दौर में भी
एक घोषणा सर्वसम्मति से
पारित हो कर भी
साल भर में नहीं पहुंच पाई 
दफ़्तरों तक
तो क्या लाभ ऐसी घोषणा का
अविवाहित बेटियां 
भटक रही हैं
और कर रही हैं प्रतीक्षा 
घोषणा से जन्मे 
आदेश की
भरण-पोषण की।
अरे , घोषणा करने वालों को 
कोई तो बताए 
कि सिर्फ़  घोषणाओं से
पेट नहीं भरता 
घोषणाओं पर कर यक़ीन
आम-आदमी है
तिल-तिल मरता।
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23 May, 2021

उसे क्या | कविता | डॉ शरद सिंह | नवभारत में प्रकाशित

मेरी कविता "उसे क्या" को आज 23.05.2021  को "नवभारत" के रविवारीय अंक में प्रकाशित किया गया है जिसके लिए "नवभारत" का हार्दिक आभार 🙏
उसे क्या ?
      - डॉ शरद सिंह

बुझ गई 
सूरज की एक किरण
टूट गया एक तारा
बिखर गया एक घर

तो क्या?
मृत्यु है साश्वत
इसलिए बन जाओ दार्शनिक
और
मत पूछो कारण मृत्यु का 
मृत्यु टहलती है इनदिनों
अस्पतालों के आईसीयू वार्डों में
फेफड़ों से ऑक्सीजन सोखती हुई
प्राणरक्षक दवाओं को हराती हुई
जीने की उम्मीदों को तड़पाती हुई
उसे क्या
जो सिर्फ़ बची अकेली छोटी बहन
उसे क्या
जो सिर्फ़ बचे बूढ़े दादा और नन्हें पोते
उसे क्या
जो सिर्फ़ बचे अनाथ बच्चे
उसे क्या .....
क्या 'सिस्टम' से  मिलीभगत है उसकी भी?
सुना है किस्सा कि 
एक उलूक-दम्पत्ती ने धन्यवाद दिया था 
तैमूरलंग को 
कि वह जब तक है उजड़ते रहेंगे गांव
और बसते रहेंगे उलूकों के घर...
अब न युद्ध है और न तैमूरलंग
फिर भी मृत्यु ने फैला दिए हैं पंजे
गांवों तक
सुविधा नहीं, सुरक्षा नहीं, चिकित्सा नहीं
तो क्या?
मृत्यु को अच्छे लगते हैं शोकगीत
वह तो गाएगी, 
भले ही फट जाए धरती का कलेजा
उसे क्या....
       ------------------

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22 May, 2021

अंधेरा घिरने पर | कविता | डॉ शरद सिंह

अंधेरा घिरने पर
            - डॉ शरद सिंह

जब दुख बड़ा होता है
तो बौने हो जाते हैं शब्द
इतने बौने
कि नहीं पकड़ पाते हैं
दुख की उंगली
सीने पर हिमालय-सा बोझ
ओढ़ाने लगता है अवसाद की चादर 
आंसू धोने लगते हैं 
सुख के निशानों को
तब 
उठाने लगते हैं सिर अनेक प्रश्न -
जीना अब किसके लिए
जीना अब क्यों
क्यों भटकना एक अदद
फैमिली पेंशन के लिए
क्यों लगाना दफ़्तरों के चक्कर
क्यों विश्वास करना किसी घोषणा का
क्यों चुकाना टैक्स दुनियाभर के
क्यों उम्मीद करना कि कोई
पोंछेगा आंसू आकर
क्यों ख़्वाब देखना कि कोई
देगा साथ जीवन भर

जबकि
साया भी साथ छोड़ देता है 
अंधेरा घिरने पर।
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20 May, 2021

दस्तक | कविता | डॉ शरद सिंह

दस्तक
     - डॉ शरद सिंह
जब तक हम सोते रहेंगे 
तब तक बुरे ख़्वाब जागते रहेंगे
कब आएगा वक़्त
इरादों की फटी चादर सीने का
कहीं ये दस्तक उसी वक़्त की तो नहीं?
जो लाशों के ढेर से गुज़र कर 
आई है याद दिलाने
कि वे ज़िन्दा रह सकते थे
अगर रैलियां न होतीं
अगर कुंभ न होता
अगर समय पर जांच की कमी न होती
अगर बेड...
अगर ऑक्सीजन...
अगर डॉक्टर....
अगर अटेंडेंट....
अगर दवाओं की कालाबाज़ारी....
अगर नकली दवाएं....
अगर....अगर...अगर...
वे सब ज़िन्दा रहते 
यदि 'सिस्टम' में इतने 'अगर' न होते
तो तीन पर्तों में लिपट कर 
विदा न होते हमारे परिजन

तो ध्यान करना होगा एकाग्र
खोलने होंगे कान 
और सुननी होगी वह दस्तक
जो झुलस कर आ रही है
सामूहिक चिताओं से

कुछ ऐसे भी हैं-
जो जुटे हैं मानवता की सेवा में
जो कर रहे हैं विधान 
लावारिस कर दी गई 
आत्माओं की शांति के लिए
जो खिला रहे हैं भूखों को खाना
जो पोंछ रहे हैं आंसू बचे हुओं के
उठ खड़े होना होगा उनके साथ
आख़िर वे भी तो इंसान हैं
निर्भीक इंसान,
दस्तक यही तो कह रही है
जागें और ध्यान से सुनें
अपनी धड़कन
कि हम अभी ज़िन्दा हैं
कि देख सकते हैं बुरे ख़्वाबों के
अंधेरे से बाहर
तो क्यों न दें सबूत ख़ुद को
और जोड़ दे कड़ियां
दस्तकों की
हर खोखले 'सिस्टम' से परे।
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19 May, 2021

इतिहास में हम | कविता | डॉ शरद सिंह

इतिहास में हम
          - डॉ शरद सिंह

हम कोसते हैं हिटलर को
हम कोसते हैं मुसोलिनी को
हम कोसते हैं सद्दाम को
हम कोसते हैं उन सभी को जो
इतिहास में दर्ज़ हैं / होते जा रहे हैं
जनता विरोधी शासक के रूप में
क्यों नहीं खुल कर कोसते 
उनको भी
जो हैं हत्यारे मानवता के 
और बेचते हैं नकली इंग्जेक्शन
नकली दवाएं
नकली ऑक्सीजन
गिद्ध या हायेना से भी बदतर
नोंच-नोंच कर खाने वाले
जीवन की उम्मीदों को
नरभक्षी नहीं तो और क्या?

खुले चौराहे में संगसार होने लायक़
खुलेआम फांसी चढ़ा दिए जाने लायक़
कब तक छुपे रहेंगे
संगमरमर की दीवारों के पीछे
वक्त की लाठी तो पड़ेगी ही उन पर
एक दिन

काश! 
जनता की लाठी भी पड़ती उन पर
लम्बे कानूनी दांव पेंच से पहले
फिर हम जब इतिहास बनते
तो दर्ज़ न होते
एक आक्रोशहीन भीरु की तरह।
           -----------------

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18 May, 2021

अहसास | कविता | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

अहसास
       - डॉ (सुश्री) शरद सिंह

अव्यवस्थाओं के अभ्यस्त हम
चुराने लगे हैं नज़रें
मौत की ख़बरों से

हम नहीं जानना चाहते
कि ख़ामी कहां है
हम नहीं जानना चाहते
कि दोषी कौन है
हम नहीं जानना चाहते
कि जिम्मेदार कौन है

हम वो बन चुके हैं
जो बिता देना चाहते हैं
'व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी' के परिसर में
अपना बचा हुआ जीवन

अब नहीं है
सच और झूठ के बीच महीन रेखा
अब है चौड़ी खाई
जिसे नहीं फलांग सकेंगे हम
हमारे पांव हो चुके हैं बौने
हाथ कंधों से ऊपर उठते ही नहीं
गरदन झुक चुकी है
और दिमाग़ हो चला है विचारशून्य
हमारी उंगलियों में तो तर्जनी ही नहीं है
ठीक वैसे ही
जैसे पूंछ का उपयोग न होने पर
हम मनुष्यों ने खो दी अपनी पूंछ
अब हम जीने के आदी हो चले हैं
बिना तर्जनी के,
अच्छा है
बना रहेगा सुरक्षित होने का भ्रम
और हम
अख़बारों में पढ़ते रहेंगे चुटकुले
छांट-छांट कर

परिस्थिति से पलायन
समा गया है हमारे रक्त में
बदल रहा है हमारा डीएनए
बदल रहा है हमारा जिनोम

तो क्या

ज़िन्दा रहने का अहसास
बचा तो है
यह क्या कम है....?
        -------------

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17 May, 2021

जो रह जाता है बचा | कविता | डॉ शरद सिंह


 रह जाता है बचा
                  - डॉ शरद सिंह

अनुभवों की नहीं होती है कोई सीमा
अकसर हम सोचते हैं
कि हमने देख लिए हैं -
दुख के सारे रंग
तभी टूट जाता है कुर्सी का पाया
निकल जाता है गाड़ी का पहिया
आ जाती है सामने से बेकाबू ट्रक
या पता चलता है
आखिरी स्टेज़ का कैंसर या कोरोना
वह भी खुद को नहीं
उसको जो प्रिय है खुद से भी ज़्यादा
वज़ूद को हिला देने वाला यह अनुभव
तोड़ देता है
पिछले सारे अनुभवों के रिकॉर्ड
टूट जाती हैं -
सारी आस्थाएं
सारी मान्यताएं
सारे विश्वास
मन हो जाता है नास्तिक
हो जाती है विरक्ति
फूल, दीपक, अगरबत्ती, धूप, हवन, आचमन से

व्यवस्था की ख़ामियों
राजनीतिक लिप्साओं
तमाम संवेदनहीनताओं
को कोसता, छटपटाता
उस हृदयाघाती अनुभव से गुज़र कर
जो रह जाता है बचा
वह
वह नहीं रहता
जो पहले हुआ करता था।
        -------------

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16 May, 2021

आंकड़ें कभी सांस नहीं लेते | कविता | डॉ शरद सिंह

आंकड़ें कभी सांस नहीं लेते
              - डॉ शरद सिंह
इन दिनों
सूखी हुई है
नदी नींद की

आंसुओं के साथ भाप बन चुका है
सारा पानी
स्वप्न पड़े हैं तलछठ में
कंंकड़, पत्थर और मृत घोंघों की तरह

रेत के कणों में
दब कर रह गई आकांक्षाएं
बुझ जाएंगी
किसी टूटे तारे की तरह
पृथ्वी घूमती रहेगी अपनी  धुरी पर
अमीर और अमीर
ग़रीब और ग़रीब होते रहेंगे
दस्तावेज़ों पर शर्णार्थियों की तरह
जुड़ जाएगा एक और कॉलम
कोरोना से हुए अनाथों का

और कुछ नहीं बदलेगा
कहीं भी
सिवा इसके कि
अनेक जीवित इंसान
बदल चुके होंगे
मृतकों के आंकड़ों में
न नाम, न पता, सिर्फ़ आंकड़ें

आंकड़ें कभी सांस नहीं लेते
और न ही देखते हैं स्वप्न।
         -------------

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15 May, 2021

काले दिन | कविता | डॉ शरद सिंह

काले दिन 
            - डॉ शरद सिंह

आपस में न मिल पाना भी
मार देता है संवेदनाओं को

साक्षात देखना
चेहरा पढ़ना
हाथ मिलाना
स्पर्श के खेतों में उपजी
आत्मीयता की फसल
पेट भर देती है दिलों के 

पर इन दिनों 
पसरता जा रहा है सन्नाटा
नहीं खुलते दरवाज़े 
नहीं खेलते बच्चे
कभी बालकनी तो कभी 
छत पर से
परस्पर
पूछना कुशलक्षेम
लगता है महज़
वीडियो-का्ंफ्रेंसिग तरह

अच्छे दिनों का सपना लिए
चले गए अनेक
अनन्त यात्रा में
बचे हुओं ने छोड़ दी है
अच्छे दिन की आस
हाथ लगे हैं
ब्लैक फंगल वाले काले दिन

अब तो संघर्ष है
सिर्फ़ बचे रहने का
उद्देश्य संकुचित हो चला है
जीवन का
और दूर हो चले हैं हम
परपीड़ा, परदुख से
बढ़ते हुए मौत के आंकड़ों के बीच
शोकसंवेदना के लिए भी 
न जा पाना
हमें कहीं कर न दे संवेदनाहीन
और लगाते रहें ठहाके बुरे दिन।
         ------------
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14 May, 2021

तुम्हारे बिना ईद | कविता | डॉ शरद सिंह

तुम्हारे बिना ईद
           - डॉ शरद सिंह

तुम होतीं
तो चांद दिखने की ख़बर पा कर
फोन करतीं शमीम आपा को, कहतीं-
"ईद मुबारक़"

सुब्ह होते ही 
छलकता उत्साह कि
आज चलना है ईद पर गले मिलने
सिवैंया खाने

देर तक माथापच्ची करतीं कि
क्या ले चलें उपहार
ये ठीक रहेगा
या वो ठीक रहेगा
दीदी, सच कहूं आंखें भर आती थीं
तुम्हारा आपा से बहनापा देख कर

आज तुम होतीं तो
भले ही घर से मनाते ईद
मगर मनाते ज़रूर और ख़ुश हो लेते

तुम्हारे बिना यह मीठी ईद
डूबी है आंसुओं के खारेपन में।
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13 May, 2021

सोचा न था | कविता | डॉ शरद सिंह

सोचा न था
         - डॉ शरद सिंह

कभी सुबह ऐसी भी होगी
सोचा न था
तुम बिन सांसें लेनी होंगी
सोचा न था
आज भी छत पर फूल खिला है
गेंदे का
आज भी छत पर फूल खिला है   
गुड़हल का
आज भी श्यामा-तुलसी 
भीनी महक रही
आज भी छत पर गौरैया हैं
चहक रहीं
सिर्फ़ नहीं हो तुम
तो है सूनी पूरी छत
"बेटू", "बहना" सुनने को हैं
कान तरसते
वो धड़कन हैं कहां ? कि जिनमें
मेरे प्राण थे बसते
दुनिया भी मिल जाए 
पर जो नहीं हो तुम तो
नहीं शेष है मेरे हाथों में
अब कुछ भी

कोरोना बन सांप
तुम्हें डंस लेगा, दीदी
और बिछुड़ना होगा हमको
इतना ज़ल्दी
कभी अकेले जीना होगा
सोचा न था
कभी अकेले रहना होगा
सोचा न था।
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12 May, 2021

जो बचे हुए हैं | कविता | डॉ शरद सिंह

जो बचे हुए हैं
         - डॉ शरद सिंह

जीने की ज़द्दोज़हद में फंसे
जो बचे हुए हैं
उन्होंने झेली है पीड़ा
अपनों के बिछड़ने की
अभी झेलना है पीड़ाओं के नाना रूप

पीड़ा अपरिभाषित होने लगती है
जब हाथ में आता है
पीले रंग का
आयताकार क़ागज़
यानी
जिनकी मृत्यु पर विश्वास न हो रहा हो
उनका 'डेथ सर्टिफिकेट'
उंगलियां कांपती हैं
नाम पढ़ा नहीं जाता है
जागता है एक अफ़सोस
कि काश ! उस नाम की जगह 
मेरा नाम होता!
या फिर किसी का भी नहीं
न कोई आपदा होती
न ही अवसर
पीले क़ागज़ पर नाम लिखे जाने का।

पीड़ा तो अभी और बढ़ेगी
जब उस पीले क़ागज़ को लेकर
घूमना पड़ेगा दफ़्तरों में
ज़िन्दा बच जाने की सज़ा के बतौर।

पीड़ा तो अभी और बढ़ेगी
कलेजे को चीरती हुई
सॉ-मिल की आरे की तरह
दो फाड़ हो जाएगा हृदय
श्वेत पड़ने लगेंगी लाल रक्त कणिकाएं
फिर भी सांसें नहीं थमेंगी
अज्ञात अपराध की
ज्ञात सज़ा 
अभी भोगनी जो है
पीले क़ागज़ के काले अक्षरों के साथ
... ताज़िन्दगी।
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11 May, 2021

उसे क्या ? | कविता | डॉ शरद सिंह

उसे क्या ?
      - डॉ शरद सिंह

बुझ गई 
सूरज की एक किरण
टूट गया एक तारा
बिखर गया एक घर

तो क्या?
मृत्यु है साश्वत
इसलिए बन जाओ दार्शनिक
और
मत पूछो कारण मृत्यु का 
मृत्यु टहलती है इनदिनों
अस्पतालों के आईसीयू वार्डों में
फेफड़ों से ऑक्सीजन सोखती हुई
प्राणरक्षक दवाओं को हराती हुई
जीने की उम्मीदों को तड़पाती हुई
उसे क्या
जो सिर्फ़ बची अकेली छोटी बहन
उसे क्या
जो सिर्फ़ बचे बूढ़े दादा और नन्हें पोते
उसे क्या
जो सिर्फ़ बचे अनाथ बच्चे
उसे क्या .....
क्या 'सिस्टम' से  मिलीभगत है उसकी भी?
सुना है किस्सा कि 
एक उलूक-दम्पत्ती ने धन्यवाद दिया था 
तैमूरलंग को 
कि वह जब तक है उजड़ते रहेंगे गांव
और बसते रहेंगे उलूकों के घर...
अब न युद्ध है और न तैमूरलंग
फिर भी मृत्यु ने फैला दिए हैं पंजे
गांवों तक
सुविधा नहीं, सुरक्षा नहीं, चिकित्सा नहीं
तो क्या?
मृत्यु को अच्छे लगते हैं शोकगीत
वह तो गाएगी, 
भले ही फट जाए धरती का कलेजा
उसे क्या....
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10 May, 2021

आईसीयू में जूझते उत्तर | कविता | डॉ शरद सिंह

आईसीयू में जूझते उत्तर
            - डॉ शरद सिंह

एक बुद्धिजीवी ने प्रश्न उछाला-
"आखिर कब तक चलेगा
यह असंवेदनशील असंवैधानिक दौर ?
व्यवस्था फेल होकर नियति और  प्रारब्ध के रामभरोसे  
बेबस लाचारी का फायदा उठाते लोग..."

प्रश्न गंभीर था

इन दिनों गंभीर प्रश्नों पर ही तो
जी रहे हैं हम सभी
जिनके उत्तर 
छटपटा रहे हैं 
आईसीयू में 
हाईफ्लो ऑक्सीजन पर
जिनके उत्तर 
बाट जोहते हैं 
असली रेमडेसिविर इंजेक्शन का
जिनके उत्तर 
वेंटिलेटर तक भी नहीं पहुंच पाते हैं
जिनके उत्तर 
तीन पर्तों में लपेट कर
सौंप दिए जाते हैं अग्नि को

निरर्थक हैं ऐसे सारे प्रश्न तब तक
जब तक
हम में सामूहिक हौसला नहीं जागता
उत्तरों को 
आईसीयू से 
जीवित बचा लाने का,
निरर्थक हैं सारे प्रश्न।
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09 May, 2021

हम एक्सपेरीमेंटल चूहे | कविता | डॉ शरद सिंह |

 हम एक्सपेरीमेंटल चूहे
                 - डॉ (सुश्री) शरद सिंह

इस मौत के तांडव में
कौन आएगा मदद को
कोई भी नहीं
डरे हुए नहीं करते मदद 
और डरे हुओं को नहीं मिलती है मदद
 ग़ाफ़िल रहते हुए इस सोच में-
कि कभी नहीं आएगी हमारी बारी।

सच तो ये है कि
हम खुद को लपेटते जा रहे हैं
अपने भ्रम और भय की अनेक पर्तों में
काल अट्टहास कर रहा है और हम...
हम माला जप रहे हैं
झूठी महानताओं की।

वह
जो बेड और ऑक्सीजन नहीं जुटा सका
वह 
जो प्राईवेट अस्पताल से ज़िंदगी नहीं ख़रीद सका
वह 
जो सरकारी अस्पताल में वेंटीलेटर नहीं पा सका
वह
जिसके हिस्से का जीवन रक्षक इंजेक्शन
बेच दिया गया
वह 
जो भर्ती कराने के बाद
दुबारा नहीं देख सका 
अपनी ज़िंदगी के हिस्से को

कथित 'सिस्टम'
और लाचार हम
एक ज़िंदगी
पर ग़म ही ग़म

बिना मंज़िल की दौड़
दौड़ते हुए
गोया हम बन गए हैं-
एक्सपेरीमेंटल चूहे
किसी बड़ी-सी प्रयोगशाला के।
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08 May, 2021

तीन पर्तों में देवता | कविता | डॉ शरद सिंह

तीन पर्तों में देवता 
             - डॉ शरद सिंह

हां, मुझसे छिन गया
मेरी ज़िंदगी का सुख, सौंदर्य, गर्व
और जीने का मक़सद  
जैसे हरे-भरे वृक्ष पर
चला दे कोई कुल्हाड़ी
और पथरा जाए वृक्ष
बिखर जाएं टूटी शाखाएं

हां, मुझसे छिन गया
विश्वास,
छिन गई आस्था
टूट गई देव प्रतिमा
हो गया दिया औंधा
बह गया तेल
बची हुई, बुझी हुई बाती को
तीन पर्तों में लपेट दिया है मैंने भी

अब कोई देवता
न करे मुझसे
प्रार्थना की उम्मीद

उसने भी नहीं सुनी थी मेरी याचिका
नहीं दी मुझे
मेरे अपनों के जीवन की भीख
अब उसे भी नहीं मिलेगा
कोई भी चढ़ावा
मुझसे

हां, मैंने लपेट दिया है
तीन पर्तों में
देवता को भी
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07 May, 2021

हमारा स्याह आज | कविता | डॉ शरद सिंह

हमारा स्याह आज
               - डॉ शरद सिंह

इतिहास के पन्नों से उतर कर
वर्तमान में गूंजता
नीरो की बांसुरी का स्वर
आशा और निराशा के बीच 
अपनों को बचा लेने का संघर्ष
तीन पर्तों में लिपटे शवों के ढेर
जलती चिताओं पर विधिविधान की ललक
गोया विधिविधान 
रुई के फ़ाहे की तरह
पोंछ देगा लहू में डूबे
दर्द के धब्बों को
चिताएं जल रही हैं
संघर्ष ज़ारी है धब्बे पोंछने का
नीरो की बांसुरी
छेड़ रही है राजनीतिक राग
और चल रही है-
लहर एक
लहर दो
लहर तीन....
लहरें गिन रहे डरे हुए लोग
रोम को जला कर 
नीरो की बांसुरी का स्वर
छीन रहा है 
हर दूसरे, तीसरे घर के
एक न एक सदस्य को
गोया इतिहास जागृत हो गया है
या हम तेजी से बनते जा रहे हैं इतिहास?
सच, यही तो है हमारा स्याह आज...
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03 May, 2021

कोरोना ने मेरी दीदी डॉ वर्षा सिंह को मुझसे छीन लिया....

आज  03.05.2021 को सुबह 02:00 बजे  कोरोना ने  मेरी दीदी Dr Varsha Singh को मुझसे छीन लिया....

26 April, 2021

मेरे अश्क़ तुझसे हैं पूछते | मुक्तक | डॉ शरद सिंह

मेरे अश्क़  तुझसे  हैं  पूछते
मेरा क्या गुनाह है मुझे बता
जो बता सको न मुझे कभी
करो और ग़म न मुझे अता
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

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25 April, 2021

उदास शाम | मुक्तक | डॉ शरद सिंह

उदास शाम का तोहफ़ा मुझे दिया उसने
ख़ुशी भरी जो सुब्ह दे तो शुक्रिया मैं कहूं !

जले जो  साथ  मेरे,  रात  भर  अंधेरे  में
दिले-चराग़ कहूं, उसको इक दिया मैं कहूं
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

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23 April, 2021

हे सूरज | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रार्थना

हे सूरज !
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

हे सूरज! मेरी पृथ्वी की रक्षा तुम करना  
कोरोना के इस संकट में दुख सारे हरना

शिथिल हो चले जीवन बंधन को थामे रहना
प्राणवायु से हर मानव के जीवन को भरना

मानवत्रुटि मानव पर भारी हर पल है दिखती
एक क्षमा का अवसर मानव के हाथों धरना

निज दुख छोटा हुआ जा रहा मानव-दुख के आगे
शोकग्रस्त मानवता के हर दुख को कम करना

"शरद" प्रार्थना करती है, हर संभव तुम करना
सूर्य ! प्रखरता से अपनी, हर पीड़ा को हरना
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