12 September, 2021

रद्दीवाला | कविता | डॉ शरद सिंह

रद्दीवाला
    - डॉ शरद सिंह

वो चिरकुट-सा कबाड़ी
रोज गुज़रता है
मेरे घर के आगे से,
पुरानी घिसी 
मर्दानी सायकिल चलाता
आवाज़ लगाता
पुकारे जाने पर
मुस्तैदी से रुक जाता

मोल-भाव
सुतली बंधे तराजू के 
खोटे बांट,
जंजीरों की खनखन
अख़बारों के पन्ने
चढ़ते जाते
रद्दी के भाव

मैली ज़ेब से
तुड़े-मुड़े नोट
निकालता, गिनता
थमाता और
समेटने लगता
बासी ख़बरों और 
विज्ञापनों के ढेर को

कैरियर में बंधे बोरों में
ठूंस कर रद्दी
आगे बढ़ जाता
फिर पैडल मारता
फिर आवाज़ लगाता
गोया
ज़िंदगी भी हमें
रद्दी की भांति तौल कर
समेटती जा रही है
सांसों के चंद छुट्टों के बदले
एक कुशल रद्दीवाले की तरह।
      ----------------

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11 September, 2021

मुखौटे | कविता | डॉ शरद सिंह

 
 मुखौटे
- डाॅ शरद सिंह

थक गई हूं अब
सहानुभूति के खोखले शब्दों से
मेरी अपदा में 
अपना अवसर ढूंढने वालों से
वक़्त के साथ चेहरों से
उतरने लगे हैं मुखौटे

‘फ़ोन नहीं उठता’ का
उलाहना देने वाले -
कुछ ने 
मेरी त्रासद रात में
नहीं उठाया था मेरा फ़ोन
नहीं सुनी थी मेरी पुकार
नहीं दिया था
अपनी आवाज़ का भी सहारा

कुछ ने 
मेरे रुदन से 
अपने कानों को बचाने के लिए
मुझे नहीं किया फ़ोन
नहीं बोले दो शब्द
सांत्वना के

कुछ ने 
प्रतीक्षा की मेरे टूटने की
बिखरने की
अपने हाथों, अपना 
अस्तित्व मिटा देने की
अफ़सोस कि मैंने
निराश किया उन्हें

कुछ ने 
बात की
मगर ज़ल्द ही
मान लिया मुझे भी
मृत समान
जिसके ऊपर से गुज़र कर
आगे बढ़ने का 
साफ़ था रास्ता उनके लिए

कुछ ने 
कुछ दूर साथ दिया
फिर डर गए वे 
दुनिया से 
या अपने-आप से,
यह तो वही जानें

कुछ हैं आज भी साथ
बेहिचक, बेझिझक 
निःस्वार्थ (शायद),
छान देगा समय 
उनको भी 
प्रेम और इंसानीयत की 
छन्नी से

देखूंगी
कौन देता है साथ मेरा
मेरे अंत तक
फ़िलहाल उकताने लगी हूं
अपनी बेचारगी से

नहीं चाहिए मुझे दया,
नहीं चाहिए मुझे 
बहादुरी का तमगा,
नहीं चाहिए मुझे 
झूठा अपनापन

इन सबसे-
बेहतर है मेरा अकेलापन
मुझे नहीं जाता छोड़ कर,
मुझसे नहीं बोलता झूठ,
नहीं करता दावे 
मेरे आंसू पोंछने के,
वह मेरे साथ था
उस त्रासद रात भी,
है आज भी
और रहेगा हमेशा
मेरे साथ,
एक सच्चे,
बिना मुखौटे के
इंसान की तलाश में,
तलाश-
जो जानती हूं
कभी पूरी नहीं होगी
इस
बाज़ारवाद की दुनिया में
     -------

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10 September, 2021

फिर भी पधारो गणपति | कविता | डॉ शरद सिंह

फिर भी पधारो गणपति !
           - डॉ शरद सिंह
हे एकदंत पधारो 
इस कराहते घर में
जो जूझ रहा है 
अपनों को खो कर
अपने एकाकीपन से

हे गजानन पधारो
इस रुदन करते आंगन में
जो लौट कर नहीं आ सका
यहां से चिकित्सालय जाने वाला

हे गजकर्ण पधारो
मेरी उस अनंतर्ध्वनि में
जिसमें आज भी प्रश्न
गूंजता है कि
क्यों नहीं सुनी थी
तुमने मेरी पुकार
मेरी चीत्कार

हे भालचंद्र पधारो
मेरे जीवन के 
उस गहन अंधकार में
जिसमें तुम
उजाला नहीं भर सके
और न कभी भर सकोगे

हे बुद्धिनाथ पधारो
जिन्हें बुद्धि दिया तुमने
वायरस बनाने
और फैलाने का
सारी दुनिया को
रुलाने का,
उनकी बुद्धि का
परिणाम देखो
हो गए अनाथों पर
और लगाओ अट्टहास 

भले ही तुमने
नहीं सुना था मेरी पुकार
छीन लिया मुझसे
मेरा सुख-संसार
तुम हो मेरे शत्रुसम
फिर भी पधारो गणपति !
मैं तुम्हें बुलाती रहूंगी
याद दिलाती रहूंगी
कि तुमने ठुकरा दिया था
प्राण-भिक्षा की मेरी
प्रार्थना को,
हां, नहीं सुना था तुमने
फिर भी पधारो गणपति !
      -----------
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09 September, 2021

True relation | Poetry | Dr (Miss) Sharad Singh

True relation
       - Dr (Miss) Sharad Singh

Who stays for whom?  
Who likes whom?  
No one can tell -
who really loves whom?  
Every relationship is selfish There is nothing selfless here.  
They worship the deities Because they want 
boons from them.  
Every need of life has to be fulfilled by parents.  
At the same time, 
parents need support 
from their children in old age. 
 The rest of the relationship makes its own assessment.  
Hope!  
There would have been 
another selfless relationship like a friend in this world.
           ---------------------
#life  #poetry #poetrylovers  #relation #love

08 September, 2021

On that day | Poetry | Dr (Miss) Sharad Singh

On that day
- Dr (Miss) Sharad Singh

I am living 
the dream of life.  
One day 
the sleep will be broken, 
the dream will be broken
and that will be 
my real morning.  
Then there will be 
no loneliness 
and there will be 
no need 
for the heart to beat.  
On that day 
the sun will shine 
over my closed eyes 
and my soul 
will be bathed in light.  
On that day 
I will reach my loved ones.
______________
#life  #poetry #poetrylovers  #invisible  #death #love #dream

07 September, 2021

The Cruelty | Poetry | Dr (Miss) Sharad Singh

The Cruelty
- Dr (Miss) Sharad Singh

Green leaves wither
Colorful flowers dry up
The fire goes out
Water flows,
Whom
We love so much
They die too.

Why do all these 
never come back, 
Like the sun 
the moon, the stars
Those who set 
and come back

Death makes invisible 
all those 
whom we have seen 
over the years 
laughing, talking, walking, running and throbbing

Between happiness 
and sadness,
It is a terrible duel
Why is death so cruel?
______________
#life  #poetry #poetrylovers  #invisible #death #love #duel #cruel

06 September, 2021

These days | Poetry | Dr (Miss) Sharad Singh

These days 
- Dr (Miss) Sharad Singh

These days 
I am living a nightmare 
A nightmare 
that never came 
to my sleep,
Breathing is not easy 
Every breath is creep

Haven't believe in life 
Not even on death  
The question of trusting 
a person 
does not arise at all,
Everything has stopped 
Against an invisible wall.
            ----------------

निर्लज्जता | कविता | डॉ शरद सिंह

निर्लज्जता
       - डॉ शरद सिंह

वह बच्चा
जो बीन रहा है
हर बिकाऊ वस्तु
कचरे के ढेर से
उसे नहीं डर 
न कोविड का
न किसी और संक्रमण का
वह तो
पैदायशी ग्रस्त है
ग़रीबी के वायरस से

वह बच्चा
देखता है सपने
स्कूल का नहीं,
पढ़ाई का नहीं
बस, अपने मोहल्ले का
'दादा' बनने का
ताकि
जिस दूकान से उसे
नहीं मिलती उधार में रोटी
उस दूकान से
वसूल सके 'हफ़्ता'
और ठंडे लोहे की
एक पिस्टल
खुंसी रहे 
उसकी पेंट में पिछवाड़े

वह बच्चा
जो बचा नहीं पाया
अपनी बहन को
बिकने से,
जो छुड़ा नहीं पाया
बाप की दारू,
जो मलहम नहीं लगा पाया
मां के ज़ख़्मों पर,
जो रोज हारता है
अपनी भूख-प्यास से

उस बच्चे से
उम्मीद करना आदर्श की
हमारी निर्लज्जता नहीं
तो और क्या है?
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04 September, 2021

त्वचा का आवरण | कविता | डॉ शरद सिंह

त्वचा का आवरण
          - डॉ शरद सिंह

त्वचा के आवरण के भीतर
अस्थि-मज्जा
रचता है
एक ऐसा जटिल संसार
जिसमें 
भावनाओं की सरिता
होती है प्रवाहित
हृदय-उद्गम से
नस-नाड़ियों तक

श्वेत अस्थियां
देती हैं प्रमाण
त्वचा के भीतर  
हर मनुष्य के
एक जैसे होने का
साथ ही बताती हैं
दैहिक विकास के 
उस क्रम को
जिसमें 
नवजातीय तीन सौ अस्थियां
आयु बढ़ने पर
रह जाती हैं
मात्र दो सौ छः

अस्थियां आपस में जुड़ कर
संवारती हैं देह
और उसी संवरी देह से
देह पर, देह के लिए
देह करती है अत्याचार
बहाना बना कर
त्वचा के रंग का,
त्वचा की स्निग्धता का,
त्वचा के जेंडर का

त्वचा
कसमसाती है तब
जब उसके भीतर सुरक्षित
मस्तिष्क की काली करतूतें
लांघ जाती हैं सीमाएं,
मर्यादाएं, चेष्टाएं
त्वचा छोड़ देना चाहती है साथ 
पर विवश है 
कसे रहने के लिए 
तने रहने के लिए 
आवरण बने रहने के लिए 
मनुष्य को सहेजने के लिए
मनुष्यत्व की आशा में
झुर्रियां पड़ने तक
घिस कर पतली होने तक
ओज़ोन परत की तरह।
      ----------
        
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01 September, 2021

उदास दिल को तसल्ली | ग़ज़ल | डॉ शरद सिंह

उदास दिल को तसल्ली न दे सकोगे तुम
यूं  उम्र  भर   तो  मिरे पास न रुकोगे तुम

सलीब ग़म का रखा है मिरे जो कांधे पर
चलोगे  चार क़दम और फिर थकोगे तुम

उठा के सिर को कभीभी नहीं जिया तुमने
हरेक शख़्स के  आगे  में  जा झुकोगे तुम
- डॉ शरद सिंह

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27 August, 2021

एकांत | कविता | डॉ शरद सिंह

एकांत
     - डॉ शरद सिंह

एकांत
जब बोलने लगे
झींगुर बन कर
एकांत 
जब हंसने लगे
सूखे पत्तों की
खनखनाहट बन कर,
एकांत
जब गलबहियां डालने लगे
बंद कमरे की
दीवारें बन कर,
एकांत
जब हो जाए अपठनीय
दीमक खाई 
क़िताबों की तरह,
एकांत 
जब हो जाए
शापित प्रेम-कविता
की तरह,
एकांत 
जब बनने लगे चेहरा
अपनी ही प्रतिच्छाया का
एकांत 
जब उतरने लगे
देह में
और  
पथराने लगे देह
चलती सांसोंं के बावज़ूद

यही समय होता है
भाग निकलने का 
एकांत की ठंडी
कालकोठरी से
किसी भी दिशा में
किसी भी गली में
किसी भी सड़क पर
बस, एकांत से परे
खुद से
खुद को
बचाने के लिए।
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23 August, 2021

ग्रैफिटी | कविता | डॉ शरद सिंह

ग्रैफिटी
      - डॉ शरद सिंह

पुरानी
प्लस्तर उधड़ी दीवारों पर
करना चाहती हूं मैं
ग्रैफिटी

स्प्रे करना 
उन रंगों को
जो बहुत गहरे
दबे हैं मेरे मन में,
अच्छा लगेगा मुझे
बना देना
एक बड़ा-सा दिल
हथियारों के ठीक ऊपर

एक कबूतर
एक कलम
एक काग़ज़
एक कविता
एक सुखी इंसान
- इनमें से कुछ भी 
या
ये सभी
एक ही दीवार पर
उकेरना है मुझे

बेशक़,
ग्रैफिटी 
ज़िन्दा कर देती है
मरी हुई दीवारों को
मरी हुई भावनाओं को
मरी हुई बहादुरी को
यदि हम ख़ुद को 
जोड़ पाएं
रंगों और दीवारों से
बेझिझक
जैसे 
मृत्यु की ज़मीन पर
जीवन को जी लेना
जी भर कर।
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21 August, 2021

वह एकाकी तारा | कविता | डॉ शरद सिंह

वह एकाकी तारा
     - डॉ शरद सिंह

वह दूर आकाश में
एकाकी तारा
घूम रहा है
अपनी धुरी में
उल्लकाएं भी
उससे बच कर निकलती हैं
दूर-दूर से,
न कोई टकराना चाहता
न कोई अपनाना चाहता
देखें कब तक
दिपदिप करेगा 
वह एकाकी तारा

जिस दिन टूटेगा वह
कई अनजाने लोग
मांगेंगे 'विश'
क्या सचमुच-
किसी का टूटना
ख़त्म होना
इच्छाएं पूरी कर सकता है 
किसी की?

इस प्रश्न का उत्तर पाने
टूटना होगा
उस एकाकी तारे को,
जो फ़िलहाल 
चाहता है जानना
विस्तृत आकाशगंगा में
असंख्य 
अपरिचित 
तारों के बीच
अपने होने का उद्देश्य
और अकुलाकर
ढूंढता है अपना 'ब्लैक होल'
क्योंकि उसने सुन रखा है
जो तारा टूटता नहीं
उसका होता है अंत
'ब्लैक होल' में
जो होती है 
एक अनन्त यात्रा की
शुरुआत
आकाशगंगा से परे
मृत्यु के समकक्ष

अब डरता नहीं
वह एकाकी तारा
न टूटने से
न मृत्यु से।
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16 August, 2021

दस्तक | कविता | डॉ शरद सिंह

दस्तक
        - डॉ शरद सिंह

उसने
दरवाज़े के माथे को
अपनी हथेली की
थाप से चूमा
और 
एक दस्तक रख दिया

काश!
उसने द्वार खुलने तक
की होती प्रतीक्षा
तो व्यर्थ न जाती
दस्तक,
कब्ज़ों और सिटकनी की
सिहरन

और 
निराश न होतीं
वे सारी आशाएं 
जो बंद द्वार के भीतर
बाट जोह रही थीं
एक अदद
दस्तक की

द्वार खुलने पर
उसका न होना
छोड़ गया अंधेरा
भरी दोपहर,
भरपूर उजाले में

शायद उसे पता नहीं
दस्तक का
अपना कोई 
वज़ूद नहीं होता,
होता है वजूद तो
उस हथेली का
जो
जुड़ी होती हैं
कांपती उंगलियों,
चंद सांसों, 
एक धड़कते दिल
और 
प्रेम के ढाई आखर से।
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14 August, 2021

चलो खेलें | कविता | डॉ शरद सिंह

चलो, खेलें !
        - डॉ शरद सिंह

चलो, 
जाति-जाति खेलें
चलो,
धर्म-धर्म खेलें
राजनीतिक गलियारों से
निकल कर
ये खेल
बनते जा रहे हैं 
बुनियादी खेल
सो,
अपडेट तो रहना होगा
खेल भी खेलना होगा
आख़िरकार,
ओलंपिक में भी
शामिल कर दिया 
हमने यह खेल
फिर चलो, खेलें

इससे भी न भरे जी
तो खेल सकते हैं
खेल ऑनर किलिंग का

हर उन्मादी खेल 
बढ़ा सकता है
टीआरपी सुर्खियों का
और गिरा सकता है
जीवनमूल्य
चुटकियों में।
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13 August, 2021

मन का प्लेनेटेरियम | कविता | डॉ शरद सिंह

मन का प्लेनेटेरियम
           - डॉ शरद सिंह

घने, काले बादलों से
आच्छादित आकाश
खो देता है नीलापन
तब कहां बिसात
सूरज, चांद, तारों की
कि दिखा सकें
अपना चेहरा

मगर 
मन के
प्लेनेटेरियम में
दिनदहाड़े
चमकते, धधकते
लुभाते, बुलाते
मनचाहे ग्रह-नक्षत्र,
कभी-कभी 
आवारा उल्लकाएं भी
गुज़र जाती हैं
बिलकुल क़रीब से

वहां है
 दूरबीन
'हब्बल'  से भी 
अधिक शक्तिशाली
मन देख सकता है
हज़ारों आकाशगंगाओं के 
पार भी
कुछ भी

पर छू नहीं सकता
चाह कर भी
बेचारा
लाचार मन।
 -------------
        
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07 August, 2021

तेरे जाने से ये दुनिया | ग़ज़ल | डॉ शरद सिंह

ग़ज़ल
     - डॉ शरद सिंह
तेरे जाने से ये दुनिया, वीरानी-सी लगती है
कैसे ज़िन्दा हूं मैं अब तक, हैरानी-सी लगती है 

बड़ा कठिन है वादा करना खुद से जीते जाने का
तुझसे फिर मिल पाने में ही, आसानी-सी लगती है

जिसपे गुज़री है वो रो कर, अपना दिल हल्का करता 
दुनियावालों को तो ये भी नादानी-सी लगती है

उसका होना ही था काफ़ी, दुनिया अपनी लगती थी
अब तो हर महफ़िल, हर मज़लिस बेगानी-सी लगती है

उसके क़दमों में था रखना, ख़ुशियों का हर नज़राना
"शरद" ज़िंदगी की हर ख़्वाहिश, बेमानी-सी लगती है
                   ------------------

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06 August, 2021

नॉस्टैल्जिक बारिश | कविता | डॉ शरद सिंह

नॉस्टैल्जिक बारिश
           - डॉ शरद सिंह

लगातार
एक सप्ताह तक
चलने वाली बारिश
हो जाती है नॉस्टैल्जिक
करने लगती है उदास
तिरने लगते हैं
अवसाद के बादल
बैठक से शयनकक्ष तक

सीलते हुए शब्द
एक गीलापन
रख देते हैं कानों में
खारे आंसुओं की तरह
और भीग जाता है
पूरा घर
मन के भीतर का

सीलन की गंध
उठने लगती है 
उम्मींद के
हर कोने से
काम नहीं आता
तसल्ली का
एयर प्यूरीफायर

कंचे बना कर 
खेलने को
दिल करता है
शुद्ध, सफ़ेद
फिनायल गोलियां
बचपन के उस
काल्पनिक साथी के साथ
जो घनी बारिश में
दिखता है अकसर
भीगे लिबास में
लापरवाह-सा

मैं भी हो जाऊं अवसादी
इससे पहले 
या तो सीख लूं
लापरवाह होना
या फिर 
थम जाए बारिश
मेरी हथेलियों की
तमाम लकीरें धुलने से पहले।
        ---------------------
        
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05 August, 2021

फॉसिल | कविता | डॉ शरद सिंह

फॉसिल
       - डॉ शरद सिंह

सावन, भादों
क्वांर, कार्तिक
वसंत, पतझड़
सारे महीने
सारे मौसम
मेरे भीतर रह कर
देते रहते हैं दस्तक
बाहर आ कर
चेहरे से फूट पड़ने को
बारहमासी बन कर

परन्तु 
लग गया है जंग
मन के दरवाज़े के
कब्जों में
पथरा गई हैं
पल्लों की लकड़ियां
उन पर पड़ने वाली थाप
अब नहीं होती
ध्वनित, प्रतिध्वनित

हर मौसम
बनता जा रहा
फॉसिल
दुख की चट्टानों में दब कर
सीने की तलहटी
बहती आंसुओं की नदी में
डूबता-उतराता
हर पल है
हज़ार-हज़ार साल जैसा।
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03 August, 2021

वह एक स्त्री | कविता | डॉ शरद सिंह

वह एक स्त्री
        - डॉ शरद सिंह

रजोनिवृत्ति पर 
लिखी गई कविता
एक कवि के लिए
हो सकती है
क्रांतिकारी कविता,
स्त्रियों के प्रति
उदारता की कविता,
समस्त स्त्रियों के लिए
स्वातंत्र्य-उद् घोष की कविता
किन्तु उसकी
अपनी पत्नी के लिए नहीं

क्या याद है उस कवि को
कि उसने
कितनी बार खरीदा था
सेनेटरी नैपकिन
अपनी रजस्वला पत्नी के लिए
कि उसने कितनी बार
डिस्पोज़ किया था
पत्नी का इस्तेमालशुदा
सेनेटरी नैपकिन
कि उसने कितनी बार
सेंका था पत्नी की नाभि से
निचले हिस्से को
कि उसने
कितनी बार पिलाया था
दूध-हल्दी 
उन पांच दिनों में

निःसंदेह,
कुछ कवियों की
कविताओं में
होती हैं दुनियाभर की स्त्रियां
और उन स्त्रियों की पीड़ा
किन्तु
उनमें नहीं होती
वह एक स्त्री
जो है उसकी पत्नी

वही पत्नी
सम्हालती है, रिश्ते और बच्चे
वह जाता है जब
वाहवाही लूटने
सम्मान पाने
रजोनिवृत्ति पर लिखी
अपनी कविता के लिए

कवि की कविता में मौज़ूद
स्त्रियों-सी
क्या पत्नी भी एक स्त्री नहीं होती?
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02 August, 2021

बेचारे शब्द | कविता | डॉ शरद सिंह

बेचारे शब्द
              - डॉ शरद सिंह

बहुत से शब्द
होते हैं
लकीर के फ़कीर

कुछ चलते हैं 
लकीर के नीचे-नीचे 
तो कुछ चलते हैं 
लकीर के ऊपर चढ़कर 
गोया लकीर तय करती हो 
उनकी चाल को,
शब्द 
लकीर पर लटकते, फुदकते 
बनाए रखते हैं अपना संतुलन

कुछ शब्द 
बाएं से दाएं चलते हैं 
भारतीय ट्रैफिक नियमों की तरह 
तो कुछ दाएं से बाएं चलते हैं 
अमेरिकी ट्रैफिक नियमों की तरह
 
शब्द 
सीमाएं लांघ जाते हैं देशों की
बिना कुछ कहे सुने
कभी करा देते हैं युद्ध 
तो कभी समझौता 
तो कभी बन जाते हैं 
खुद ही शरणार्थी

शब्द
जोड़ भी सकते हैं
तोड़ भी सकते हैं

शब्द
प्रेम में घुलें तो अमृत
शब्द
बैर में घुलें तो विष

शब्द 
कभी कह देते हैं सब कुछ
तो कभी
छुपा लेते हैं बहुत कुछ

अफ़सोस कि
शब्द 
अक्षरों का समुच्चय हैं
उनका अपना कुछ भी नहीं
अक्षरों के बिना
वे कुछ भी नहीं।
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27 July, 2021

लड़कियां किसम-किसम की | कविता | डॉ शरद सिंह

लड़कियां किसम-किसम की
               - डॉ शरद सिंह

मूक दर्शक से हम
देखते हैं उन्हें
एक तारीख़
एक दिन
एक समय में -

एक लड़की
रचती है इतिहास
ओलंपिक में

एक लड़की 
जोहती है बाट
सज़ा सुनाए जाने की
अपने बलात्कारी को

एक लड़की
होती है शिकार
बलात्कार का

एक लड़की
करती है सर्फिंग
इंटरनेट पर

एक लड़की
होती है ब्लैकमेल
प्रेम-डूबे वीडियो की
अपलोडिंग पर

एक लड़की
होती है भर्ती 
पुलिस में

एक लड़की
बेचती है देह
रेडलाईट एरिया में

एक लड़की
करती है संघर्ष 
जीने का

एक लड़की
ढूंढती है तरीक़े
आत्महत्या के 

एक लड़की
ख़ुश है अपने
लड़की होने पर

एक लड़की
करती है विलाप-
'अगले जनम मोहे
बिटिया न कीजो'

देखो तो,
इस दुनिया में
कितनी 
किसम-किसम की हैं
लड़कियां,
समाज के सांचे 
और 
ढांचे के अनुरूप

यानी,
लड़कियां 
हमेशा
एक-सी नहीं रह पाती 
हमारे बीच,
एक ही समय में।
     ------------
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#World_Of_Emotions_By_Sharad_Singh #HindiPoetry 

26 July, 2021

टूटे पत्ते की तरह | कविता | डॉ शरद सिंह

टूटे पत्ते की तरह
        - डॉ शरद सिंह

भीड़ 
अब नहीं लुभाती मुझे,
तुम्हारे न होने का अहसास
होता है हर जगह
सज़ा है मेरे लिए
सामने दीर्घा में
तुम्हें न देख पाना

जब करता कोई
तुम्हारी चर्चा
"दीदी थीं" के संबोधन सहित,
चींख उठती है
मेरी अंतर्आत्मा
चुभने लगती हैं किरचें
शब्दों की,
उतर जाती है
बलात् ओढ़ी गई 
मुस्कुराहट

मन लगाने को
घर से निकले क़दम
जब लौटते हैं घर
किसी आयोजन के बाद
कांपते हैं हाथ
खोलते हुए ताला 
लड़खड़ाते हैं पैर
सूने घर में
क़दम रखते ही,
कोई नहीं जो 
प्रतीक्षारत हो मेरे लिए
कोई नहीं
जो मेरी बातें सुने
पूछे मुझसे पूरा हाल

घर हो 
या आयोजन
एक शून्य 
रहता है चुभता
निरंतर
हर पल, हर कहीं
ढूंढती रहती हैं  
मेरी आंखें
उस शून्य में भी 
तुम्हें ही

संभव नहीं 
तुम्हारा आना, 
बुला लो मुझे
अपने पास
ख़त्म हो यातना का दौर
वरना
भटकता रहेगा
निरुद्देश्य जीवन
एक टूटे पत्ते की तरह
समय की आंधी में
थपेड़े खाता हुआ।
     ---------------–
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25 July, 2021

चाहती हूं सिर्फ़ एक दिन | कविता | डॉ शरद सिंह

चाहती हूं सिर्फ़ एक दिन
            - डॉ शरद सिंह

मुझे चाहिए 
जीवन का सिर्फ़ एक दिन 
बिना किसी याद  
बिना किसी बात 
बिना किसी तारत्म्य 
बिना किसी तादात्म्य  

मुझे चाहिए 
जीवन का सिर्फ़ एक दिन 
जिसमें फूल हों 
पत्ते हों 
पक्षी हों 
पहाड़ और झरने हों 
लंबी सूनी निचाट सड़कें हों, 
दूर तक देखूं 
तो दिखाई दे सूरज का चढ़ना 
सूरज का उतरना 
और एक सुनहरा दिन 
धूप खिली हुई 
हवा में ठंडक 
एक गुनगुनापन 
न कोई साथ 
न कोई पास
न कोई अपनापन 
न कोई बेगानापन 

न कोई दोस्ती
न कोई दुश्मनी
न कोई आशा
न कोई निराशा
न कोई नींद
न कोई सपना

न कविता, न कहानी
न प्रहसन, न उपन्यास 
न काग़ज़, न लैपटॉप
न पेन, न की-बोर्ड
न शब्द, न अक्षर

कम्प्यूटर की
बाईनरी से दूर
गॉड पार्टिकल से परे
ज़िनोम, सिंड्रोम
कुछ भी नहीं
सूफ़ियाना इश्क़ की
तलाश में
एक एस्टरॉयड की भांति
अनंत अंतरिक्ष में
नक्षत्रों के पास से
गुज़रती हुई

सिर्फ़ एक दिन 
जीना चाहती हूं - 
निर्विरोध, निश्चेष्ट,
 निर्विवाद, नि:शंक 
अपने साथ,
अपने अस्तित्व को 
बूझने के लिए 

और चाहती हूं -
वह दिन हो 
मेरा अंतिम दिन,
शून्य में विलीन हो जाने के लिए 
प्रस्थान बिंदु।
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24 July, 2021

अनर्थ का अर्थ | कविता | डॉ शरद सिंह

अनर्थ का अर्थ
       - डॉ शरद सिंह

रीते हुए
औंधे रखे
घड़े की तरह
शुष्क
रिक्त 
दिन 
बजते हैं
शोक डूबे
अनहद नाद की तरह

व्याकुलता
आदियोगी-सी
करने लगती है तांडव
होने लगता है विध्वंस
दरकने लगती हैं भावनाएं
ढहने लगते हैं
खंडहर 
सपनों के,
बज उठती हैं धड़कने
डमरू की तरह,
विनाश का विन्यास
रचने लगता है
उल्टा स्वस्तिक

देखो तो,
अनर्थ का अर्थ
बांचते
काटना है
शेष जीवन
ऋग्वेद के 
फटे हुए 
पन्ने की तरह।
   -----------
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20 July, 2021

देवशयनी | कविता | डॉ शरद सिंह

देवशयनी
        - डॉ शरद सिंह

सोने जा रहे देवता
चतुर्मास के लिए
गहरी, गाढ़ी नींद में

जब जाग रहे थे
फिर भी
नहीं रोका
मौत का ताण्डव
बच्चे अनाथ हुए
बड़े हुए बेसहारा
बेहाल मानवता
कराहती रही
सिसकती रही
तड़पती रही
एक-एक सांस के लिए
जबकि 
जाग रहे थे देवता
उन दिनों
जब नहीं आई थी
देवशयनी एकादशी

संगमरमरी और ग्रेनाइट के
सुचिक्कन पत्थरों से बने
मंदिरों में 
भजन-पूजन के शोर में डूबे
मालदार भक्तों पर आनंदित
सोते रहे
देवता
जागते हुए भी

चार माह की 
घोषित निंद्रा
के बीच भी
चलती रही है दुनिया
चलती रहेगी दुनिया
क्या फ़र्क़ कि
देवता जागें
या सोएं

सच यही है-
हर आपदा में
मनुष्य ही सम्हालेगा
मनुष्य को
देवता नहीं।
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16 July, 2021

अनर्थ का अर्थ | कविता | डॉ शरद सिंह

अनर्थ का अर्थ
       - डॉ शरद सिंह

रीते हुए
औंधे रखे
घड़े की तरह
शुष्क
रिक्त 
दिन 
बजते हैं
शोक डूबे
अनहद नाद की तरह

व्याकुलता
आदियोगी-सी
करने लगती है तांडव
होने लगता है विध्वंस
दरकने लगती हैं भावनाएं
ढहने लगते हैं
खंडहर 
सपनों के,
बज उठती हैं धड़कने
डमरू की तरह,
विनाश का विन्यास
रचने लगता है
उल्टा स्वस्तिक

देखो तो,
अनर्थ का अर्थ
बांचते
काटना है
शेष जीवन
ऋग्वेद के 
फटे हुए 
पन्ने की तरह।
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15 July, 2021

छूट गए पीछे | कविता | डॉ शरद सिंह

छूट गए पीछे
       - डॉ शरद सिंह

दिन जब चवन्नी थे
मीठे थे
दिन जब अठन्नी थे
नमकीन थे
दिन जब रुपैया हुए
खटमिट्ठे हुए
दिन अब रुपये को
कुचलते हुए 
हो चले हैं कड़वे

धन्नू का टपरा
चाय मीठी थी
कैंटीन की चाय
चाय फ़ीकी थी
कैफे कॉर्नर
चाय थी ही नहीं
होम डिलेवरी में
नहीं है-
चाय, न कॉफ़ी
सिर्फ़ कोल्डड्रिंक

प्रेमपत्र में दर्ज़ प्रेम
भावुक था
किताबों में दबा प्रेमपत्र
संवेदना से तर था
मोबाईल टेक्स्ट पर चला प्रेम
उतावला रहा
अब
मैसेंजर पर चला प्रेम
हो चला है आभासीय
पैंचअप और ब्रेकअप के बीच।

सच,
हम आगे बढ़ गए
पर 
छूट गए पीछे
मिठास, उष्मा और प्रेम।
        ---------------
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14 July, 2021

ग़ज़ल | रूह तन्हा है | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

ग़ज़ल
रूह तन्हा है ...
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

रूह तन्हा है, ज़ख़्म गहरा है
ग़म सरे-शाम आ के ठहरा है

याद आती हैं उड़ाने लेकिन
आसमानों पे आज पहरा है

खो गया चैन, सुकूं भी ग़ायब
कल समंदर था, आज सहरा है

और सुनवाई अब नहीं होगी
टूटे दिल का निज़ाम बहरा है

अब दिखेगा न मेरी आंखों को
फिर भी आंखों में एक चहरा है
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11 July, 2021

दुआ है | कविता | डॉ शरद सिंह

दुआ है...
       - डॉ शरद सिंह

ज़िंदगी 
बन जाए जब एक बोझ
सांसे हो जाती हैं और चौकन्नी
चिपट जाती हैं सीने से
नहीं चाहती थमना

धड़कने
हो जाती हैं सजग
किसी भी क़ीमत पर
न रुकने को तैयार

जब देह ही
निभाने लगे शत्रुता
भागने लगे
निरुद्देश्य जीवन के पीछे

उस पर
कोई गिनाता रहे
ग़लतियां,
कोई फैलाता रहे
भ्रमजाल
सुरक्षित भविष्य के 
सपनों के साथ
मैचमेकर बन कर
गोया 
एक का एकाकीपन
मनोरंजन हो दूसरे के लिए

अपनत्व की शून्यता
झूठी मुस्कुराहटों के तले
दबी रहेगी कब तक
बस दुआ है कि
पत्थर हो जाए दिल
या
बंद कर दे धड़कना
ठीक इसी समय
      --------------
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10 July, 2021

स्मृतियां | कविता | डॉ शरद सिंह

स्मृतियां  
       - डॉ शरद सिंह

धड़कती हुई
दीवारें कमरे की
दोहराती रहती हैं
अच्छी-बुरी,
खट्टी-मीठी
ख़ारी-कड़वी
स्मृतियां

हम जीते हैं स्मृतियों में
स्मृतियां जीती हैं हमको
और दीवारें
पान के पत्तों की तरह
उलटती-पलटती रहती हैं
स्मृतियों को
कि वे 
रह सकें ताज़ा

है ज़रूरी दीवार पर
एक अदद खिड़की 
ताकि 
भरपूर सांस ले सके
स्मृतियों से भरा कमरा
एक निजी स्मारक की तरह।
            ---------
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09 July, 2021

अहसास | कविता | डॉ शरद सिंह

अहसास
     - डॉ शरद सिंह

रात 
किसी ठंडे 
अहसास की तरह
दौड़ती है रगों में
थके-थके क़दमों से
हांफती हुई

दिन भर के ख़ुलासे
चेहरों में ढल कर 
आने लगते हैं सामने
किसी चलचित्र की तरह

शब्दों के गुबार
छाने लगते हैं 
एक धुंध की तरह
बोलने वालों के इरादे
छिप जाते हैं
उस धुंध के पीछे

फिर भी
सब कुछ है साफ़ 
प्रस्ताव, प्रहसन, 
झूठी प्रशंसा
संदिग्ध इरादे
इसमें 
कोई जगह नहीं
दर्द या आंसुओं की
नहीं करना साझा
यह किसी को

ज़िंदगी
रात की मानिन्द 
सरक ही जाएगी
पर
सुबह कब होगी
पता नहीं।
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07 July, 2021

तो फिर... | कविता | डॉ शरद सिंह

तो फिर...
     - डॉ शरदसिंह

जो भी है दिखता 
वह सब लौकिक
जो नहीं दिखता
वह अलौकिक

प्रेम में
लौकिक है देह
और प्रेम अलौकिक 

शत्रुता में
लौकिक है देह
और शत्रुता अलौकिक 

मृत्यु में 
लौकिक है देह
और मृत्यु अलौकिक

किताब में छपे अक्षर
लौकिक हैं
भावनाएं अलौकिक

वे सब हैं आज 
अलौकिक
जो नहीं दिखते
शामिल हैं उनमें
तमाम देवता भी

जो नहीं इस धरती पर
नहीं दिखते
जो गए इस धरती से
वे कभी लौट कर नहीं आते
तो फिर
अलौकिक देवता
कैसे आएंगे भला?
अपने-अपने दुख
हम सब को ढोना है
देवता को नहीं 
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05 July, 2021

सज़ा | कविता | डॉ शरद सिंह

सज़ा
      - डॉ शरद सिंह

कब मिलेगी मुक्ति
लोहे की ठंडी सलाख़-सी
जागती रातों से
पथरीले फ़र्श-सा 
हो चला बिस्तर
चुभता है 
पीठ की हड्डियों में
सलवटों से सिकुड़ी चादर
छीलती है देह को
किसी किसनी की तरह

कब पीछा छोड़ेगा
यह अहसास
कि सलीब ढो रही हूं अपना
या तराश रही हूं
अपनी क़ब्र का पत्थर
या जोड़ रही हूं लकड़ियां
अपनी चिता के लिए
जबकि मालूम है-
नगरपालिका का शववाहन
ले जाएगा
एक दिन
एक लावारिस लाश की तरह
फिर भी एक ख़्वाब
उतरता है
जागती आंखों में
कि एक सुबह 
कोई चूमेगा मेरा माथा
और चमकदार रोशनी के साथ
मुंद जाएंगी मेरी आंखें
हमेशा के लिए

सांसों की खड़ियां लेकर 
ज़िंदगी की दीवार पर 
एक-एक दिन की
लकीरे खींचते हुए 
सोचती हूं
एक क़ैदी की तरह 
आख़िर
कब ख़त्म होगी 
जीने की ये सज़ा?
          -------------
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04 July, 2021

रविवारीय-उत्सव | कविता | डॉ शरद सिंह

रविवारीय-उत्सव
             - डॉ शरद सिंह

पुराने अख़बार के
आख़िरी पन्ने के
निपट कोने में
छपे समाचार की भांति
रविवार का एक दिन और 
तहा कर रख दिया जाएगा
सिरे से भुलाकर
इस डिज़िटल युग में

परन्तु मुझे नहीं भूलते
वे रविवार
जो कभी थे उत्सव की तरह
ब्लैक एंड व्हाईट टीवी में
दूरदर्शन पर प्रदर्शित
दोपहर की
फीचर फ़िल्म के साथ,
हम पॉपकॉर्न नहीं
रखते थे आलू चिप्स
ताज़ा तल कर
और याद करते
हर बार
वे एक-दो फीचर फ़िल्म्स
जो देखी थीं
पड़ोसी की बड़ी टीवी में
उनकी सुपीरियरिटी कॉम्प्लेक्स की
धमक के साथ

वे रविवार 
आज भी लगते हैं उत्सव-से
ओटीटी प्लेटफार्म की
उम्दा टेक्नोलॉजी के बावज़ूद
प्यारा-सा वह बुद्धू बक्सा
आज भी है गुदगुदाता
जब होते थे
परिवार के सारे सदस्य
कुछ घंटों के लिए ही सही
एक साथ
एक उत्सव की तरह

वैश्विक बाज़ारवाद में
जन्मे युवा
नहीं जान पाएंगे
इस उत्सव के बारे में
क्योंकि बाज़ार 
सहेजता है 
उन्हीं उत्सवों को
जो हों बिकाऊ
और उठा सकें
तेजी से
सेंसेक्स की लकीर को।
     -------------
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03 July, 2021

वो अब नहीं | कविता | डॉ शरद सिंह

आज पूरे दो माह हो गए वर्षा दीदी तुमको मुझसे हमेशा के लिए दूर गए... जहां भी रहो, तुम्हें सारी खुशियां मिलें...वो भी जो इस जीवन में नहीं मिलीं... हर पल तुम्हें याद करती हूं... कठिन है तुम्हारे बिना जीना...
-------------------
वो अब नहीं
        - डॉ शरद सिंह

जिसको समझ थी 
मेरे दुख-दर्द की
वो अब नहीं

जिसको क़द्र थी
मेरी भावनाओं की
वो अब नहीं

जिसके 
बह निकलते थे आंसू
मुझे ठोकर लगने पर
वो अब नहीं

जिसके दिल में था
मुझे दुनिया से
बचा लेने का जज़्बा
वो अब नहीं

जिसका प्यार
मेरी ताकत थी
हौसला थी
हिम्मत थी
वो अब नहीं

कोई नहीं
जो उसकी तरह
समझ सके मुझे

मैं थी उसकी "बेटू"
और वो मेरी "दीदू"

माफ़ करना "दीदू"
तुम्हारे बिना 
आज भी ज़िन्दा हूं

तुम्हें 
न बचा पाने पर
ख़ुद से शर्मिंदा हूं
       -----------
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02 July, 2021

सूखे हुए फूल के साथ | कविता | डॉ शरद सिंह

सूखे हुए फूल के साथ
    - डॉ शरद सिंह

पुस्तक के पीले पन्नों की
क़ब्र में सोए हुए 
फूल को 
बहा कर नदी में
कर दूंगी
तर्पण,
कर दूंगी मुक्त
अपने अतीत के
सुनहरे सपनों को

सोचा तो कई बार
कर न सकी

खोलते ही पुस्तक -
वह चपटाया फूल
आज भी
खिल उठता है
लगता है महकने
करने लगता है बातें
चूम लेता है उंगलियां
घबरा कर खींच लेती हूं हाथ
छूट जाता है फूल
जहां के तहां

टूटते ही दिवास्वप्न
लौटती हूं वर्तमान में

गोया
थार के मरुथल में
रेत के टिब्बे
लेने लगते हैं करवट
चलने लगती हैं 
तपती हवाएं
झुलसने लगती है देह
बारिश में भी
धधकती हैं लपटें

कितना मुश्क़िल है
अतीत से बचाना
वर्तमान को
और तय करना
भविष्य की 
अज्ञात यात्रा
किसी सूखे हुए
फूल के साथ।
   -----------
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01 July, 2021

नहीं लौट पाता प्रेम | कविता | डॉ शरद सिंह

नहीं लौट पाता प्रेम
            - डॉ शरद सिंह

चाहे धूमकेतु हो 
या कोई नक्षत्र
पृथ्वी के पास से 
गुज़र जाता है
बिना टकराए
बिना छुए पृथ्वी को
छोड़ जाता है अनुमान
कि हज़ारों साल बाद
लौटेगा वह
पृथ्वी के पास
एक बार फिर

एक नक्षत्र
गुज़रा था
मेरे भी क़रीब से
मेरी परिधि से दूर
पर
बहुत पास से मेरे
उन दिनों 
उसके होने का अहसास
उठाता रहा
भावनाओं के ज्वार-भाटे
समय-चक्र के साथ
दूर, दूर, दूर 
दूर होता चला गया वह

हज़ारों साल में सही
नक्षत्र लौटता है
पृथ्वी के लिए
किन्तु
नहीं लौट पाता प्रेम
प्रेम के लिए
सशरीर, साक्षात
एक बार फिर
साथ देने को

प्रतीक्षारत
पृथ्वी
प्रतीक्षारत
मैं
पृथ्वी रहेगी
और हज़ारों साल अभी
पर मैं नहीं
लौटेगा नक्षत्र
पर 
वह नहीं।
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29 June, 2021

लंबी उम्र की दुआ | कविता | डॉ शरद सिंह

लम्बी उम्र की दुआ
           - डॉ शरद सिंह

मत दो मुझे
लम्बी उम्र की दुआएं

क्योंकि-

कौंधने लगता है
मेरी स्मृति में
वह सीरियाई बच्चा
नाम था
एलन कुर्दी 
मिला था मृत
औंधे मुंह पड़ा
तुर्की के समुद्री तट पर
दहल उठी दुनिया
पर
नहीं थमा युद्ध

कौंधने लगता है
मेरी स्मृति में
उगांडा का वह 
भुखमरा बच्चा
अंतिम सांसे गिनता
और 
उसे टोहता गिद्ध
तस्वीर देख
कांप उठी दुनिया
पर ग़रीबी नहीं थमी

कौंध जाता है
मोबाईल पर
पानी मांगता वह स्वर
आईसीयू कोविड वार्ड से
जो मेरी दीदी का था
पौन घंटे तक 
नहीं मिल सका था उन्हें पानी
मैं रोती रही अपनी लाचारी पर
मैं तुरंत नहीं पिला सकी पानी
न उन्हें
न और कोविड मरीजों को
दीदी चली गयीं
कुछ और मरीज भी

अब कहो,
लहूलुहान आत्मा के साथ
क्या करूंगी 
लम्बी उम्र का?
अपनी लाचारी के 
अपराधबोध के बीच
 यूं भी चुभती है तनहाई
हीरोशिमा विध्वंस के बाद के
सन्नाटे-सी।
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28 June, 2021

इन दिनों | कविता | डॉ शरद सिंह

इन दिनों
       - डॉ शरद सिंह

मेज पर रखी
अपनी हथेली पर
देखती हूं
ठहरी हुई धूप
गोल, चमकीले धब्बे-सी

देर तक देखती हूं तो
चौंधिया जाती हैं आंखें
अकुलाकर 
मूंदती हूं आंखें
दिखते हैं
काले-काले धब्बे

बदल जाता है धूप का चरित्र
आंखों में समाते ही

सोचती हूं तभी-
यानी इंसान 
धूप से भी तेज है
चरित्र बदलने में
बदल जाता है वह तो
पलक झपकते ही

धूप को पढ़ती हुई
जान रही हूं 
अपनी ज़िम्मेदारियों को
ज़रूरतों को
और
इंसान के प्रकारों को
इन दिनों।
   ---------

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27 June, 2021

बेचारा प्रेम | कविता | डॉ शरद सिंह

बेचारा प्रेम
        - डॉ शरद सिंह

कल रात
मैंने सपने में देखा
बौखलाया
झुंझलाया
दिग्भ्रमित प्रेम

हर पल 
बदल रहा था
उसका रूप-
कभी टूटा पत्ता
तो कभी 
बिना हैण्डल का मग
कभी तुड़ामुड़ा काग़ज़
तो कभी
उखड़ी कॉलबेल
कभी गिड़गिड़ाता भिखारी
तो कभी
रुदन करती रूदाली

उसे व्यथित देख
पूछा -
दुख क्या है तुम्हें?

वह बोला-
छल करते हैं लोग
मेरा मुखौटा लगाकर
मुझे रहने नहीं देते 
मेरी मनचाही जगह,
मैं चाहता हूं रहना
सीरियाई, तंजानिया 
और बुरुंडी के 
शरणार्थी शिविरों में,
मैं चाहता हूं रहना
धारावी की स्लम बस्ती
और 
सोनागाछी के तंग कमरों में,
मैं चाहता हूं रहना
उन हथेलियों में
जिनमें नहीं है भाग्यरेखा
उन पन्नों में 
जिन पर नहीं लिखा गया
मेरे नाम का पत्र
उन आंखों में
जो देखना चाहती हैं मुझे
उन सांसों में
जो संचालित होना चाहती हैं
मुझसे.....

वह देर तक बोलता रहा
मैं देर तक सुनती रही
फिर रोते रहे 
गले लग कर 
हम दोनों
नींद खुलने तक

बेचारा प्रेम
नहीं है वहां
जहां चाहता है होना,
ठीक मेरी तरह।
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26 June, 2021

धर्म और प्रेम | कविता | डॉ शरद सिंह

धर्म और प्रेम
        - डॉ शरद सिंह

उसके मन ने
कहा उससे
प्रेम करो

किससे
इंसान से?
नहीं-नहीं
लोग क्या कहेंगे...

और चुन लिया उसने
पाषाण-मूर्ति को
प्रेम के लिए

प्रशंसा करते हैं लोग
उसकी
वह मुस्कुराती
अपने भीतर की
रिक्तता छिपाती 
जी रही है
लौकिक और अलौकिक के
द्वंद्व में फंसी
कहे-सुने जाने से
भयभीत

अरे, कोई समझाए 
उस पगली को
जहां भय हो
वहां
न होता है धर्म
और न प्रेम।
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25 June, 2021

प्रेम | कविता | डॉ शरद सिंह

प्रेम
     - डॉ शरद सिंह

उसने सोचा
वह जाएगा
थैला भर प्रेम 
ले आएगा
सब्ज़ी-भाजी की तरह

वह गया
जेबें खाली की
बाज़ार में,
एक-एक टुकड़ा
खरीदता रहा
प्रेम का
दूकानों से

काला-सफ़ेद प्रेम
रंग-बिरंगा प्रेम
मखमली प्रेम
खुरदरा प्रेम
धारदार प्रेम
घिसापिटा प्रेम
हंसता हुआ प्रेम
रोता हुआ प्रेम
हथेली पर रखा प्रेम
आंखों में बसा प्रेम
रूमाल में कढ़ा प्रेम
किताब में लिखा प्रेम

लौट कर घर
उसने जोड़ा
सारे टुकड़े
प्रेम के

और यह क्या?

सारे टुकड़े 
परस्पर जुड़ते ही
बन गया
एक प्रोडक्ट
मल्टीनेशनल कंपनी का
पर
नहीं बना प्रेम
वह ठगा-सा खड़ा
देखता प्रोडक्ट
टुकुर-टुकुर
नहीं मिला प्रेम
ज़ेबें खाली कर के भी
आख़िर 
सच्चा, साबुत प्रेम 
बाज़ारू जो नहीं होता।
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24 June, 2021

है ज़रूरी | कविता | डॉ शरद सिंह

है ज़रूरी
      - डॉ शरद सिंह
जब कोई भुला दे
किसी को
तो मानें
कि या तो वह
ड्रामा कर रहा है 
भूलने का 
या फिर 
उसने कभी 
याद रखा ही नहीं।

याद उसे रखते हैं 
जिसे करते हैं प्रेम
यानी उसने 
कभी प्रेम किया ही नहीं

प्रेम है चांद
प्रेम है सूरज
प्रेम है युद्ध
प्रेम है शांति
प्रेम है मृत्यु
प्रेम है जीवन
प्रेम है लौकिक
प्रेम है अलौकिक

हां,
एक तरफा प्रेम भी 
प्रेम ही तो है
कांच में एक तरफा लगे 
पारे से बने दर्पण की तरह 
जो दिखाता है प्रतिबिंब 
भावनाओं का
इसीलिए है ज़रूरी 
पीछे देखने की
दर्पण के
सच को जान लेने के लिए।
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23 June, 2021

इश्क़ बिना | कविता | डॉ शरद सिंह


इश्क़ बिना 
      - डॉ शरद सिंह

पुरानी क़िताब के पन्नों-सी
पीली पड़ी यादें
अचानक हरियल हो उठीं
जब मैंने सोचा
अपने कॉलेज के दिनों को
ढीली बेलबाटम और
कसी शर्ट
पोनीटेल में कसे बाल
हाथ में नोटबुक और बॉलपेन
सब कुछ बेपरवाह-सा
पर, चाक-चौबंद क्लासेज
और नोट्स
आश्चर्य कि 
'लव लेटर्स' के बाद भी
मुझे छू न सका था 
इश्क़

सहेलियां और उनके प्रेमी
डिगा नहीं पाए थे
मेरे भीतर के खिलंदड़ेपन को
न होना था, न हुआ 
इश्क़
फिर भी 
कुछ बात थी उन दिनों 
पता नहीं क्या, पर कुछ तो थी

यूं तो था उन दिनों मुद्दा -
ईराक, ईरान, 
गाज़ापट्टी का
था उन दिनों नाम -
आयातुल्लाह खुमैनी,
फीडेल कास्ट्रो का
और था मसला यहां -
बिहार के भूमिहारों का
दलितों का
स्त्रियों का
फिर भी
हम ख़ुश थे अपने आप में
इतने ख़ुश कि 
आज भी हरिया उठता है मन
उन दिनों को याद कर

याद ही तो है
जो निर्बाध, निडर, निःशंक
आती-जाती रहती है,
दिल से दिमाग़ तक
छाती रहती है
वक़्त की क़िताब भले पीली हो
पर रहती हैं यादें 
हमेशा हरी, ताज़ा 
और ओस में नहाई हुई
इश्क़ बिना भी।
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21 June, 2021

वॉल ऑफ फेम | कविता | डॉ शरद सिंह

वॉल ऑफ फेम
          - डॉ शरद सिंह

वो सबसे ऊपरवाली तस्वीर...
मैंने पूछा था - कौन-सी साड़ी?
और दूसरे ही पल
सामने थी मेरे 
गुलाबी रंग की साड़ी, चूड़ी 
और लिपिस्टिक

वह बीच वाली तस्वीर...
मेरे पूछ पाने से पहले ही
सामने थी मेरे
पीली सिल्क साड़ी
प्लास्टिक की पीली चूड़ी
और लाल लिपिस्टिक

वह सबसे नीचे वाली तस्वीर...
जिसमें मैं नहीं
तैयारी हुई थीं दीदी
अपने ग़ज़ल संग्रह के
लोकार्पण के लिए
तय की थी उन्होंने नहीं
मैंने उनके लिए
साड़ी, बिन्दी, चूड़ी

दर्जनों तस्वीरें
दर्जनों अहसासात

बदल गए हैं मायने
आज हर तस्वीर के
आज ये सभी तस्वीरें
याद दिलाती हैं मुझे
इवेंट्स की नहीं,
तैयारी 
जाने की इवेंट्स में
आज ये सभी तस्वीरें
याद दिलाती हैं मुझे
उस बहनापे की
जो छिन गया मुझसे
असमय 

मेरे घर के ड्राइंगरूम की 
दक्षिणी दीवार 
जो कभी थी मेरे लिए 
'वॉल आफ फेम'
आज ढल गई है 
यादों की दीवार में
मन को कुरेदते सूने संसार में।
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20 June, 2021

दो दुनियाएं | कविता | डॉ शरद सिंह

पांव-पांव चादर
          - डॉ शरद सिंह

रोज़ रात को 
जब पड़ती हैं बिस्तर पर
सिलवटें
मेरी करवटों से
जागता है रतजगे का अहसास
नापती हूं अपनी चादर को

कभी चादर बड़ी
और पांव छोटे
तो कभी पांव बड़े
और चादर छोटी
किसी दिहाड़ी मज़दूर की 
आमदनी की तरह
कभी कम तो कभी ज़्यादा
चादर बदलती रहती है अपनी नाप
या फिर मेरे पांव ही
होते रहते हैं 
कभी छोटे तो कभी बड़े

नींद की लम्बाई
करती है तय
पांव और चादर की नाप को
और
नींद वश में है बेचैनी के

बेचैनी पढ़ती है पहाड़ा
सत्ते सात, अट्ठे आठ का
मुड़ जाते हैं पांव घुटनों से
हो जाती है चादर लम्बी
सिर ढांपते ही
चादर से बाहर 
निकल आते हैं पांव
तभी घुटता है दम,
फड़फड़ाती है चादर

यह खेल 
हर रात का,
यह खेल पांव-पांव चादर का
आया है मेरे हिस्से में
नियति बन कर।
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