03 September, 2026

कविता | सुबह की चाय संग | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

कविता 
सुबह की चाय संग
             - डॉ (सुश्री) शरद सिंह 

सुबह की चाय संग
यादों के बिस्कुट 
कभी मीठे
कभी खारे
डुबोते चाय में ही
भीगते हैं
इस क़दर वे
कि जैसे आंसुओं से 
भीगते है शब्द अकसर
वे आंसू भी कभी
ग़म के, ख़ुशी के
कि बारिश से हुए तर
नीम पर
पंख झटकाए कोई पक्षी
सम्हल कर
कि बूंदे भी सिमट आती हैं 
प्याली में अचानक 
जो उठती भाप के संग
भावना की हो जुगलबंदी 
तो तय है दिन भी भीगेगा
समूचा ... किसी की याद से...!
-------------------        
#DrMissSharadSingh #डॉसुश्रीशरदसिंह #कविता #poetry 
#सुबहकीचाय #बारिश #जुगलबंदी

19 August, 2026

कविता | यह तो बताएगी अगली पीढ़ी | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

कविता...
यह तो बताएगी अगली पीढ़ी
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह 

कल शाम 
वह मेरे पास आकर बैठ गई 
बिल्कुल बाजू में 
मैंने देखा उसे वह सहमी हुई थी 
घबराई हुई थी 
मुझे लगा 
मैंने उसे कभी, कहीं देखा है 
या पढ़ा है उसके बारे में 
अख़बार में 
या फिर किताबों में 
या फिर यह मेरा कोई भ्रम था 
क्योंकि वह 
वैसी बिल्कुल नहीं थी 
जैसी एक छवि मेरे दिमाग में थी 
उसके चेहरे और 
आवाज़ को लेकर।
मेरे अवचेतन में जो बसी थी 
वह आवाज़ बुलंद थी 
सच्ची थी 
और उसमें 
मर मिटने का जज़्बा था 
जो चेहरा मेरे ज़ेहन में था
वह तेजस्वी था 
आत्मविश्वास से भरा हुआ 
कुछ भी कर गुज़रने को तैयार

और ये?
और ये
जो मेरे बाजू में आकर बैठी थी 
लगी तो वैसे ही 
लेकिन हू-ब-हू नहीं 
फिर भी मैंने  उससे पूछा
तुम वही हो न, जो मैं समझ रही हूं ?
उसने अपना कांपता हुआ 
पीले पड़े चेहरे वाला सिर हिलाया 
स्वीकारोक्ति में 

तब मुझे उससे पूछना ही पड़ा 
विश्वास नहीं हो रहा है 
मेरा धीरज खो रहा है 
तुम जो जेल की सलाखों के पीछे 
स्वर्ण-स्वप्न की तरह पलीं
तुम्हें पाने के लिए सैंकड़ों गर्दनें
हंसते-हंसते फांसी के फंदे पर चढ़ीं

तब कहीं जाकर 
तुमने इस धरती पर कदम रखा 
एक गर्व की तरह 

वह गर्व आज मुझे धुंधला क्यों दिखाई दे रहा है? 
तुम्हारे वही होने पर मुझे संदेह क्यों हो रहा है?
क्या तुम सचमुच वही हो? 

क्या तुम सचमुच वही हो? 
मेरा प्रश्न सुनकर 
वह सहसा चींख उठी
बोल उठी वह चिल्लाती हुए, 
"हां मैं वही हूं! 
वही हूं!
वही हूं! 
वही हूं जिसे सब कहते हैं - आज़ादी 
मैं वही हूं!

कर रहे हैं मुझे सब विकृत 
खेल रहे हैं सब मेरी अस्मिता से 
ट्रोल कर रहे हैं मुझे 
सोशल मीडिया पर
मेरे नाम पर परोस रहे हैं गालियां मां-बहन की,
हद पार हो चली है मेरे सहन की।
अब तो मुझे भी 
संदेह होने लगा है 
अपने अस्तित्व पर 
कि क्या मैं वही हूं जो शहीदों के रक्त से पोषित हुई
1947 में जन्मी
और 
बंटवारे के दावानल में झुलसी,
क्या मैं वही हूं?

मुझे बताओ मैं कौन हूं?
कौन हूं मैं?"
मुझे बताओ!!!

उसने जो प्रश्न किया मुझसे 
उसके अनुत्तरित रह जाने से बेहतर था कि मैं उसे सांत्वना देती,
सो मैंने उससे कहा-
दुखी मत हो!
डरो भी मत 
चाहे प्रथम विश्व युद्ध हो 
या द्वितीय विश्वयुद्ध 
चाहे नात्सी गैस चैंबर हों
यह परमाणु बम 
चाहे कालरा हो, हैजा या कोरोना पेंडेमिक की आपदा हो 
या विश्वव्यापी आर्थिक मंदी का दौर,
मानवता आज भी ज़िंदा है 

तुम भी रहोगी ज़िंदा अपने मूल चरित्र में 
समय कभी एक-सा नहीं रहता! 
गलतियां सिर्फ़ दोहराई नहीं जातीं, 
कभी-कभी सीख भी ली जाती है उनसे 
समय सिखा चुका है बहुतों को 
और आगे भी सिखाएगा 
भरोसा रखो 
पहचानो खुद को 
तुम आज़ादी ही मानवता हो और मानवता ही आज़ादी

तुम्हारी अस्मिता को कोई 
मिटा नहीं पाएगा!!!
तुम्हारी अस्मिता को कोई 
मिटा नहीं पाएगा!!!
मिटा नहीं पाएगा!!!
मिटा नहीं पाएगा!!!

और देर तक प्रतिध्वनित होती रही मेरी ही आवाज़ 
मेरे कानों में 
और तैर गई एक आश्वस्ति उसके चेहरे पर।
यह सब सच था या मेरा भ्रम 
मुझे पता नहीं 
यह तो बताएगी अगली पीढ़ी 
जी हां!
यह तो बताएगी अगली पीढ़ी
-----------------------
#डॉसुश्रीशरदसिंह #DrMissSharadSingh #कविता #आजादी #poetry

18 July, 2026

कविता | रात के इस दूसरे पहर में | डॉ सुश्री शरद सिंह

कविता 
रात के इस दूसरे पहर में
- डॉ सुश्री शरद सिंह 

रात के इस दूसरे पहर में 
अभी-अभी 
टूटी है नींद 
पसीने से भीगी देह
धड़कनों की तेज रफ़्तार 
धुंधले अंधेरे में 
नीम सन्नाटा।
 
याद आया 
सपने में देखा था
खुद को 
एक  बियाबां जंगल में
साथ चल रहा परिचित चेहरा 
अचानक हो गया अपरिचित 
किसी इच्छाधारी दानव की तरह 
क्रूरता से अट्टहास करता 
दबोचने लगा मेरी बांह,
छुड़ाकर बांह
दौड़ पड़ी मेरी देह
घने जंगल की ओर 
यह भूलकर कि वहां हो सकते हैं 
हिंसक चौपाए
किंतु दिमाग जानता है कि
चाल, चेहरा, चरित्र 
एक-सा होता है चौपायों का हमेशा 
बदलता नहीं हर पल 
दो पायों की तरह।
लेकिन तभी 
दिखा एक चौपाया
जो देखते ही देखते 
खड़ा हो गया तो पांवों पर
दौड़ गई सिहरन मेरुदंड पर 
टूट गई नींद 
तो पाया कि
सपने के बाहर भी 
एक बियाबां जंगल है
चार दीवारों के बंद कमरे में 
जिसमें कौंधते हैं 
परिचित-अपरिचित चेहरों के 
गड्ड-मड्ड होते डरावने चेहरे
 
देह पसीने से तर है अभी भी 
धड़कन तेज है अभी भी 
नींद गुम है अभी भी 
रात के इस दूसरे पहर में।
-------------------
#डॉसुश्रीशरदसिंह #DrMissSharadSingh #कविता #poetry #hindipoetry

08 July, 2026

थिगड़े वाली चूनरी | दोहा | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

थिगड़े  वाली  चूनरी, ओढ़े  बैठी  हीर।
फटे दुशाले में बंधी,  रांझे की तक़दीर।।
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह 
#दोहा #doha #डॉसुश्रीशरदसिंह

17 June, 2026

वो पर तौल रहा है | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | शायरी

वो पर तौल रहा है आकाश में उड़ने के लिए।
किसी और, किसी और, किसी और से जुड़ने के लिए।
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
#शायरी #ग़ज़ल #डॉसुश्रीशरदसिंह 
#DrMissSharadSingh #shayari #ghazal #shayarilovers #shayariofdrmisssharadsingh

16 June, 2026

कविता | वे बूझ लेते हैं | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

कविता 
वे बूझ लेते हैं 
      - डॉ (सुश्री) शरद सिंह
शब्द टूटते हैं 
छूटते हैं 
रूठते हैं 
फिर मान जाते हैं, 
क्योंकि 
वे बूझ लेते हैं 
प्रेम को
बड़े प्रेम से।
-----------------     
कविता | वे बूझ लेते हैं | डॉ (सुश्री) शरद सिंह 
#कविता #poetry #emotions #डॉसुश्रीशरदसिंह #प्रेम #love  #DrMissSharadSingh

13 June, 2026

जरूरी तो नहीं - डॉ सुश्री शरद सिंह | शायरी

हमख़्याली भी तो इक 
शय है इसी दुनिया की,
हो मुहब्बत ही फ़क़त 
काम ज़रूरी तो नहीं।
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह 

#शायरी #ग़ज़ल #डॉसुश्रीशरदसिंह 
#DrMissSharadSingh #Shayari #ghazal #shyarilovers #shayariofdrmisssharadsingh