23 May, 2026

कभी घर नहीं मिला, डॉ (सुश्री) शरद सिंह, शायरी

छप्पर नहीं मिला तो 
कभी दर नहीं मिला
मानो यक़ीन, मुझको 
कभी घर नहीं मिला
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

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20 May, 2026

क्या बताऊं की बात कैसी है | डॉ सुश्री शरद सिंह | शायरी

क्या बताऊं कि बात कैसी है 
ज़िन्दगी खुद  सवाल जैसी है
रास्ते   नापते   उमर   गुज़री
मंज़िलों  की  तलाश  वैसी है
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

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15 May, 2026

इश्क की इंतिहा, डॉ (सुश्री) शरद सिंह, शायरी

इश्क़ की इंतिहा नहीं होती
इश्क़ में इम्तिहान होते हैं।
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

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11 May, 2026

और कितने इम्तिहां । डॉ (सुश्री) शरद सिंह, शायरी

अर्ज़ है...
और कितनी बंदिशें अब और क्या पाबंदियां?
ज़िंदगी में और कितने, और कितने इम्तिहां ?
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

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28 March, 2026

इंतज़ार रहता है | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | शायरी

सुबह   से   शाम  तेरा  इंतेज़ार  रहता है।
तू आएगा ये हवाओं का रुख भी कहता है।
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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30 January, 2026

कविता | दिया कहता है | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

कविता 
दिया कहता है  
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

टूटे दरवाज़े से
झांकता दिया
उम्मीद की 
रोशनी को थामे
मानो कहता है
कि सब कुछ
नहीं हुआ है ख़त्म
अंधेरा गहरा ही सही
हारेगा ज़रूर
क्योंकि 
अंधेरे की नियति है
हारना
और 
उजाले की जीतना...
यदि ऐसा नहीं होता
तो सूरज
कभी नहीं उगता।
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22 January, 2026

कविता | भ्रम-3 | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

कविता 
भ्रम-3 
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

यह भी तो
एक भ्रम है
कि सोचते हैं
ज़िंदगी को
जी रहे हैं हम
जबकि
जी रही होती है
ज़िंदगी हमें,
हमारी
एक-एक सांस
एक-एक पल
एक-एक ख़्वाब को
हमारे जाने बिना,
हमें
अपने ऋण से
करती हुई उऋण

जिस दिन 
चुक जाता है 
पूरा ऋण 
उस दिन ज़िंदगी 
कर देती है मुक्त हमें
हमेशा के लिए
 
और हमारे सहित सभी 
रहते हैं इसी भ्रम में कि 
हमने जी ली ज़िंदगी।
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कविता | भ्रम -3 | डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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