03 November, 2022

कविता | मात्र | डॉ (सुश्री) शरद सिंह


कविता / मात्र...

- डॉ (सुश्री) शरद सिंह


प्रेम की खाद

और 

मीठे बोलों का जल

सिवा इनके 

नहीं चाहिए

मन के पौधे को

और कुछ भी।

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कविता | मात्र | डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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31 October, 2022

ग़ज़ल | ठंड | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

ठंड  खिल रही  धीरे-धीरे।
धूप  ढल   रही  धीरे-धीरे।

दिन तेजी से दौड़ लगाता
रात  चल   रही  धीरे-धीरे।

कोट, पुलोवर, स्वेटर वाली
सुबह मिल  रही  धीरे-धीरे।
 - डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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28 October, 2022

ग़ज़ल | शायरी | ये भी कोई जीना है | डॉ (सुश्री) शरद सिंह


ग़ज़ल / शायरी 

दिल पर पत्थर रख कर जीना,
ये भी कोई जीना है?
कोई मुझे बताये आख़िर
कितने आंसू पीना है?

          - डॉ (सुश्री) शरद सिंह

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09 October, 2022

मुक्तक | पूनम का चांद | डॉ (सुश्री) शरद सिंह


अमृत   वर्षा  कर  रहा है, पूनम का चांद।
मन को हर्षित कर रहा है, पूनम का चांद।
शारदीय  इस  रात्रि की  हुई कालिमा दूर
जग को जगमग कर रहा है,पूनम का चांद।
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

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08 October, 2022

कविता | वज़ूद | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

वज़ूद
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

सफ़र में हूं
कि है कांधे पे
याद का
कांवर

पता नहीं
पहुंचूंगी कहां
काशी 
या
मगहर 

ढूंढना बाद मेरे
लिक्खे हुए
पन्नों में तुम्हें
प्रेम का शब्द भी
दुबका हुआ
मिल जाएगा

छूट जाने के लिए
ख़ुद से ही
शरमाएगा

पर करूं क्या
कि...

नहीं, और तो
कुछ भी है नहीं
जो
वसीयत में लिखूं
और छोड़ जाऊं यहां

मेरा वज़ूद भी
तुमसे तो
भूल जाएगा।
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01 October, 2022

कविता | प्रेम करूंगी यक़ीनन | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

कविता
प्रेम करूंगी यक़ीनन
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

तुम कहते हो
मैं प्रेम करूं 
चिड़ियों सी चहकूं 
नदी सी खिलखिलाऊं
थाम कर हाथ
निकल जाऊं
सुदूर वनप्रांतर में

पर कैसे?

प्रेम तो 
मौसमों में जीता
प्रकृति से ऊर्जा लेता
दिलों में धड़कता
एक मधुर अहसास
हुआ करता था

हम बदल रहे हैं 
मौसमों को,
बदल रहे प्रकृति को,
इंसानों के दिल
ख़ुद ही बन चुके हैं
छिद्रित ओजोन परत

अहसासों में 
भले ही गरमाहट हो
बढ़ते तापमान की,
पर स्वार्थी स्पर्श की ठंडक
शून्य से चालीस डिग्री नीचे
कर रही है फ्रीज़ 
संबधों को

प्रेम घुट रहा है
वातानुकूलित कमरों में
जैसे वेंटिलेटर पर हो
कोई मरीज

यदि तुम दे सको
सांस भर
प्रदूषण रहित, स्वच्छ 
खुली हवा
सुधार दो मौसमों को
संवार दो प्रकृति को
चूम लूंगी माथा
पूरे प्रेमावेग के साथ,
है ये वादा !
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30 September, 2022

कविता | धूप बारिश के बाद की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह


धूप बारिश के बाद की
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

कुछ अधिक
गरमाने लगी है
धूप
बारिश के बाद की
नमी, उमस
और उष्णता से भरी धूप
कर देती है व्याकुल
देहरी लांघते ही

धूप का काम है
तपना
वह तप रही है,
झुलसा रही है
अनावृत चेहरों को

चेहरे,
अपरिचित चेहरे
धूप के लिए भी
और
मेरे लिए भी,
भीड़ से गुज़रते हुए
हम नहीं देख पाते
चेहरों को
ठीक से
और देख भी लें
तो नहीं पढ़ पाते
उनकी अहमियत को
धूप भी नहीं पढ़ पाती
दिलों को
वरना
कर के महसूस
मेरे भीतर के
विसूवियस
मुझे
और न तपाती।
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