10 May, 2021

आईसीयू में जूझते उत्तर | कविता | डॉ शरद सिंह

आईसीयू में जूझते उत्तर
            - डॉ शरद सिंह

एक बुद्धिजीवी ने प्रश्न उछाला-
"आखिर कब तक चलेगा
यह असंवेदनशील असंवैधानिक दौर ?
व्यवस्था फेल होकर नियति और  प्रारब्ध के रामभरोसे  
बेबस लाचारी का फायदा उठाते लोग..."

प्रश्न गंभीर था

इन दिनों गंभीर प्रश्नों पर ही तो
जी रहे हैं हम सभी
जिनके उत्तर 
छटपटा रहे हैं 
आईसीयू में 
हाईफ्लो ऑक्सीजन पर
जिनके उत्तर 
बाट जोहते हैं 
असली रेमडेसिविर इंजेक्शन का
जिनके उत्तर 
वेंटिलेटर तक भी नहीं पहुंच पाते हैं
जिनके उत्तर 
तीन पर्तों में लपेट कर
सौंप दिए जाते हैं अग्नि को

निरर्थक हैं ऐसे सारे प्रश्न तब तक
जब तक
हम में सामूहिक हौसला नहीं जागता
उत्तरों को 
आईसीयू से 
जीवित बचा लाने का,
निरर्थक हैं सारे प्रश्न।
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09 May, 2021

हम एक्सपेरीमेंटल चूहे | कविता | डॉ शरद सिंह |

 हम एक्सपेरीमेंटल चूहे
                 - डॉ (सुश्री) शरद सिंह

इस मौत के तांडव में
कौन आएगा मदद को
कोई भी नहीं
डरे हुए नहीं करते मदद 
और डरे हुओं को नहीं मिलती है मदद
 ग़ाफ़िल रहते हुए इस सोच में-
कि कभी नहीं आएगी हमारी बारी।

सच तो ये है कि
हम खुद को लपेटते जा रहे हैं
अपने भ्रम और भय की अनेक पर्तों में
काल अट्टहास कर रहा है और हम...
हम माला जप रहे हैं
झूठी महानताओं की।

वह
जो बेड और ऑक्सीजन नहीं जुटा सका
वह 
जो प्राईवेट अस्पताल से ज़िंदगी नहीं ख़रीद सका
वह 
जो सरकारी अस्पताल में वेंटीलेटर नहीं पा सका
वह
जिसके हिस्से का जीवन रक्षक इंजेक्शन
बेच दिया गया
वह 
जो भर्ती कराने के बाद
दुबारा नहीं देख सका 
अपनी ज़िंदगी के हिस्से को

कथित 'सिस्टम'
और लाचार हम
एक ज़िंदगी
पर ग़म ही ग़म

बिना मंज़िल की दौड़
दौड़ते हुए
गोया हम बन गए हैं-
एक्सपेरीमेंटल चूहे
किसी बड़ी-सी प्रयोगशाला के।
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08 May, 2021

तीन पर्तों में देवता | कविता | डॉ शरद सिंह

तीन पर्तों में देवता 
             - डॉ शरद सिंह

हां, मुझसे छिन गया
मेरी ज़िंदगी का सुख, सौंदर्य, गर्व
और जीने का मक़सद  
जैसे हरे-भरे वृक्ष पर
चला दे कोई कुल्हाड़ी
और पथरा जाए वृक्ष
बिखर जाएं टूटी शाखाएं

हां, मुझसे छिन गया
विश्वास,
छिन गई आस्था
टूट गई देव प्रतिमा
हो गया दिया औंधा
बह गया तेल
बची हुई, बुझी हुई बाती को
तीन पर्तों में लपेट दिया है मैंने भी

अब कोई देवता
न करे मुझसे
प्रार्थना की उम्मीद

उसने भी नहीं सुनी थी मेरी याचिका
नहीं दी मुझे
मेरे अपनों के जीवन की भीख
अब उसे भी नहीं मिलेगा
कोई भी चढ़ावा
मुझसे

हां, मैंने लपेट दिया है
तीन पर्तों में
देवता को भी
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07 May, 2021

हमारा स्याह आज | कविता | डॉ शरद सिंह

हमारा स्याह आज
               - डॉ शरद सिंह

इतिहास के पन्नों से उतर कर
वर्तमान में गूंजता
नीरो की बांसुरी का स्वर
आशा और निराशा के बीच 
अपनों को बचा लेने का संघर्ष
तीन पर्तों में लिपटे शवों के ढेर
जलती चिताओं पर विधिविधान की ललक
गोया विधिविधान 
रुई के फ़ाहे की तरह
पोंछ देगा लहू में डूबे
दर्द के धब्बों को
चिताएं जल रही हैं
संघर्ष ज़ारी है धब्बे पोंछने का
नीरो की बांसुरी
छेड़ रही है राजनीतिक राग
और चल रही है-
लहर एक
लहर दो
लहर तीन....
लहरें गिन रहे डरे हुए लोग
रोम को जला कर 
नीरो की बांसुरी का स्वर
छीन रहा है 
हर दूसरे, तीसरे घर के
एक न एक सदस्य को
गोया इतिहास जागृत हो गया है
या हम तेजी से बनते जा रहे हैं इतिहास?
सच, यही तो है हमारा स्याह आज...
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03 May, 2021

कोरोना ने मेरी दीदी डॉ वर्षा सिंह को मुझसे छीन लिया....

आज  03.05.2021 को सुबह 02:00 बजे  कोरोना ने  मेरी दीदी Dr Varsha Singh को मुझसे छीन लिया....

26 April, 2021

मेरे अश्क़ तुझसे हैं पूछते | मुक्तक | डॉ शरद सिंह

मेरे अश्क़  तुझसे  हैं  पूछते
मेरा क्या गुनाह है मुझे बता
जो बता सको न मुझे कभी
करो और ग़म न मुझे अता
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

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25 April, 2021

उदास शाम | मुक्तक | डॉ शरद सिंह

उदास शाम का तोहफ़ा मुझे दिया उसने
ख़ुशी भरी जो सुब्ह दे तो शुक्रिया मैं कहूं !

जले जो  साथ  मेरे,  रात  भर  अंधेरे  में
दिले-चराग़ कहूं, उसको इक दिया मैं कहूं
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

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