20 October, 2021

शरद का चांद | कविता | डॉ शरद सिंह

शरद का चांद
          - डॉ शरद सिंह
शरद पूनम का चांद 
पूरा है
पर
भीतर से
अधूरा है

या फिर
मेरी उदास आंखें
छलछला उठी
उसे देखते ही
और 
दिखने लगा
चांद भी उदास

यादों के धब्बे
कैसे धोएगा चांद
मुझे पता नहीं
और कब तक
रोएगा चांद
मुझे पता नहीं

पता है तो
सिर्फ़ इतना कि
उदासी शीत
उतरा करेगी आंगन में
और
दूब की नोंक पर
दिखेंगे रात के आंसू
बड़े भोर से

शुक्लपक्षी बन कर
उड़े आकाश में
या छिप जाए
कृष्णपक्षी बन कर
चांद उदास रहेगा
ऋतु शरद उदास रहेगी
उदास रहेगी रात
व्यस्तता भरा दिन लिए
सूर्य के आने तक
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17 October, 2021

अब तो चाहिए | कविता | डॉ शरद सिंह

अब तो चाहिए...
          - डॉ शरद सिंह
बहुत थकान होती है -
उधार के रिश्तों को 
जीते हुए, 
जैसे ओढ़ी हुई मुस्कान
थका देती है होंठों को
गालों को 
और आंखों की कोरों को
हां,
बहुत थकान होती है -
जब रिश्तों को जीते हैं
रिश्तों के बिना
जीत की उम्मींद में
फेंके हुए पासों की तरह।

और थक-हार कर 
अकसर सोचता है मन
ये ज़िन्दगी 
थकी-थकी सी है
अनुबंधों के लिबास तले
ओह, अब तो चाहिए 
एक सुई या पिन
जिससे उधेड़ा जा सके
इस लिबास की सीवन को।
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16 October, 2021

अनजाना मुस्तक़बिल | ग़ज़ल | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

ग़ज़ल 
अनजाना  मुस्तक़बिल
           - डॉ (सुश्री) शरद सिंह

निपट  उदासी   बैठी  है  घर  डेरा  डाले
हर  कोने  में  सूनेपन  के   मकड़ी जाले

भरी   दोपहर  अंधियारा  छाया लगता है
या  फिर  दिन  ही  हो बैठे हैं काले-काले

उसकी  बातें   बसी   हुई  हैं  दीवारों   में
इक-इक लम्हा अब तो उसके हुआ हवाले

कब  तक कोई  खुद के  आंसू को  पोंछेगा
तनहा दिल क्या तनहाई को खाक सम्हाले

अनजाना  मुस्तक़बिल*  बैठा  दरवाज़े पर
पलक झपकते  चले गये  दिन  देखे-भाले
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*मुस्तक़बिल = भविष्य
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14 October, 2021

वह लड़का | कविता | डॉ शरद सिंह

वह लड़का
          - डॉ शरद सिंह
वह 
जीवन के नाम पर
एक 
जीता-जागता धोखा

अपनी मां की 
हड़ीली कमर पर
कैंया चढ़ा
उम्र दो साल
वज़न कुल सवा चार किलो
पसलियों से चिपकी चमड़ी
लोहार की धौंकनी-सी
चलती सांसें
ज़रिया है उसका वज़ूद
भीख मांगने का
उसकी मां के लिए,
उसके बाप के लिए,
उसके 
बिज़ूका भाई-बहनों के लिए

अपनी बड़ी-बड़ी आंखें से
दुनिया को देखता
कंधों से लटकी
फटी बुशर्ट 
कटे पंखों सी लटकी
तन नहीं ढांपती उसका
चीथड़े-सी निकर
कूल्हे भी रखती उघारे
धूप, बारिश, जाड़ा
गुज़ारेगा वह इसी तरह,
जब तक रहेगा जीवित

उसे पता नहीं
वह एक
बेहतरीन शो-पीस 
बन सकता है
अगर किसी दिन
किसी को 
कुपोषण के 
विज्ञापन के लिए 
उसकी जरूरत पड़ी,
उसका पिचका-भुखाया पेट 
और एक-एक पसलियां 
चमक उठेंगी 
विशालकाय होर्डिंग्स पर

उसे एक दाना नहीं,
पर मिल जाएगा 
विज्ञापन करने वालों को 
करोड़ों का अनुदान
किसी भी देशी-विदेशी संस्था से,
और वह लटका रहेगा 
अपनी मां की 
हड़ीली कमर पर 
इसी तरह 
अपनी आखिरी सांस तक,
सांसे 
जो शायद कुछ महीने 
या साल भर 
और चल जाएं 
या सिमट जाएं कुछ ही दिन में

फ़िलहाल
उसे सभी ने देखा होगा 
अपने अपने शहर में।
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12 October, 2021

डॉ शरद सिंह सागर की 2021 की 'पिंक सागर' की 100 शक्तिशाली महिलाओं में

पिंक सागर! मेरा नाम सागर की 2021 की 100 शक्तिशाली महिलाओं की आपकी सूची में है...
 इस सम्मान के लिए हार्दिक धन्यवाद 🙏

Pink Sagar! my name is in your list of Sagar's 100 Powerful Women of 2021...
Hearty Thanks for this Honour 🙏
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10 October, 2021

सयानी लड़की | कविता | डॉ शरद सिंह

सयानी लड़की
     - डॉ शरद सिंह

वह लड़की
अपने हड़ीले
कमज़ोर दिखने वाले
बाएं कांधे पर
लाद कर 
प्लास्टिक की बोरी
घूमती है
एक छोकरे के साथ
जो यक़ीनन भाई है उसका

वह बीनती है
भाई के साथ
दारू के खाली पाऊच
और डिस्पोज़ल गिलास
दारू की दूकान  के सामने
अलसुबह से,
जब लोग 
दौड़ रहे होते हैं
अपनी सेहत बनाने

चिरकुट फ्राक वाली
वह आठ सालाना लड़की
जानती है कि
उन पाऊच और गिलासों में
वे भी होंगे
जिन्हें इस्तेमाल किया होगा
कल देर शाम गए
उसके पियक्कड़ बाप ने

हर दिन वह
बीनती है पाऊच और गिलास
बदले में हर दिन
कबाड़ी से पाती है
बीस रुपए
हथिया लेता है उसमें से
पांच रुपए भाई
दस रुपए बाप
और बचे पांच
वह रख देती है
अपनी कुटी-पिटी मां की
सख़्त हथेली पर
स्वेच्छा से
और खुश हो जाती है
पुंगी पा कर बासी रोटी की

है न लड़की सयानी?
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09 October, 2021

असंभव-सा संभव | कविता | डॉ शरद सिंह

असंभव-सा संभव

     - डॉ शरद सिंह
किसी भी समय
उठने लगती हैं
सीस्मिक तरंगें
कांपने लगती है
भावनाओं की सतह
सरकने लगती हैं
विश्वास की
टेक्टोनिक प्लेट्स

मेरी सांसोंं का
सिस्मोमीटर
निरंतर बनाता है ग्राफ
धड़कन के
रिक्टर स्केल पर
और करता है कोशिश
नापने की
पीड़ा से उपजे
भूकंप की तीव्रता को

दौड़ती है तेजी से सुई
और
लॉगरिथमिक प्वाइंट
दर्शाता है तीव्रता
कभी सात 
तो कभी दस

यह असंभव-सा
संभव,
करता है
विचलित मुझे कि
विध्वंस के
अंतिम बिन्दु पर
पहुंच कर भी
बची हुई है
मेरे अस्तित्व की धरती

ये तो हद है-
सोचने लगे हैं
मेरी पीड़ा के
सिस्मोलॉजिस्ट

हैरत तो होगी ही
महाविनाश से
गुज़र कर भी
कोई बचता है भला?
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