कविता
वे बूझ लेते हैं
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
शब्द टूटते हैं
छूटते हैं
रूठते हैं
फिर मान जाते हैं,
क्योंकि
वे बूझ लेते हैं
प्रेम को
बड़े प्रेम से।
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कविता | वे बूझ लेते हैं | डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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