18 July, 2026

कविता | रात के इस दूसरे पहर में | डॉ सुश्री शरद सिंह

कविता 
रात के इस दूसरे पहर में
- डॉ सुश्री शरद सिंह 

रात के इस दूसरे पहर में 
अभी-अभी 
टूटी है नींद 
पसीने से भीगी देह
धड़कनों की तेज रफ़्तार 
धुंधले अंधेरे में 
नीम सन्नाटा।
 
याद आया 
सपने में देखा था
खुद को 
एक  बियाबां जंगल में
साथ चल रहा परिचित चेहरा 
अचानक हो गया अपरिचित 
किसी इच्छाधारी दानव की तरह 
क्रूरता से अट्टहास करता 
दबोचने लगा मेरी बांह,
छुड़ाकर बांह
दौड़ पड़ी मेरी देह
घने जंगल की ओर 
यह भूलकर कि वहां हो सकते हैं 
हिंसक चौपाए
किंतु दिमाग जानता है कि
चाल, चेहरा, चरित्र 
एक-सा होता है चौपायों का हमेशा 
बदलता नहीं हर पल 
दो पायों की तरह।
लेकिन तभी 
दिखा एक चौपाया
जो देखते ही देखते 
खड़ा हो गया तो पांवों पर
दौड़ गई सिहरन मेरुदंड पर 
टूट गई नींद 
तो पाया कि
सपने के बाहर भी 
एक बियाबां जंगल है
चार दीवारों के बंद कमरे में 
जिसमें कौंधते हैं 
परिचित-अपरिचित चेहरों के 
गड्ड-मड्ड होते डरावने चेहरे
 
देह पसीने से तर है अभी भी 
धड़कन तेज है अभी भी 
नींद गुम है अभी भी 
रात के इस दूसरे पहर में।
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08 July, 2026

थिगड़े वाली चूनरी | दोहा | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

थिगड़े  वाली  चूनरी, ओढ़े  बैठी  हीर।
फटे दुशाले में बंधी,  रांझे की तक़दीर।।
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह 
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17 June, 2026

वो पर तौल रहा है | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | शायरी

वो पर तौल रहा है आकाश में उड़ने के लिए।
किसी और, किसी और, किसी और से जुड़ने के लिए।
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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16 June, 2026

कविता | वे बूझ लेते हैं | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

कविता 
वे बूझ लेते हैं 
      - डॉ (सुश्री) शरद सिंह
शब्द टूटते हैं 
छूटते हैं 
रूठते हैं 
फिर मान जाते हैं, 
क्योंकि 
वे बूझ लेते हैं 
प्रेम को
बड़े प्रेम से।
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कविता | वे बूझ लेते हैं | डॉ (सुश्री) शरद सिंह 
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13 June, 2026

जरूरी तो नहीं - डॉ सुश्री शरद सिंह | शायरी

हमख़्याली भी तो इक 
शय है इसी दुनिया की,
हो मुहब्बत ही फ़क़त 
काम ज़रूरी तो नहीं।
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह 

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10 June, 2026

जीना मुश्किल - डॉ (सुश्री) शरद सिंह | शायरी

अब तो दिल की तनहाई को हुआ जा रहा जीना मुश्किल।
फटी ज़िन्दगी के टुकड़ों को रेशा- रेशा सीना मुश्किल।
 - डॉ (सुश्री) शरद सिंह

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02 June, 2026

ज़रूरी तो नहीं | डॉ सुश्री शरद सिंह | शायरी

हरेक रिश्ते का हो नाम ज़रूरी तो नहीं।  
हो मुहब्बत ही फ़क़त काम,ज़रूरी तो नहीं।
अश्क़  लबरेज़  पियाला है  मेरे हाथों में 
हो शराबों से भरा जाम,ज़रूरी तो नहीं।
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

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