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10 April, 2022

ग़ज़ल | हमको जीने की आदत है | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नवभारत


"नवभारत" के रविवारीय परिशिष्ट में आज 10.04.2022 को "हमको  जीने की आदत है" शीर्षक ग़ज़ल प्रकाशित हुई है। आप भी पढ़िए...
हार्दिक धन्यवाद #नवभारत 🙏
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ग़ज़ल | हमको  जीने की आदत है | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नवभारत

अपने सुघड़ उजालों को  तुम, रक्खो अपने पास।
हमको  जीने की आदत है, काले दिन, उच्छ्वास।

चतुर शिकारी  जाल  डाल कर बैठा  सारी  रात
सपनों को भी  लूट रहा है,  बिना दिए  आभास।

बढे़ दाम की  तपी  सलाखें,  दाग रही  हैं  देह
तिल-तिल मरता मध्मवर्गी,  किधर  लगाए  आस।

बोरी  भर के  प्रश्न उठाए,  कुली  सरीखे  आज
संसद के  दरवाज़े  लाखों  चेहरे  खड़े  उदास।

जलता  चूल्हा  अधहन  मांगे, उदर पुकारे  कौर
तंग  ज़िन्दगी कहती अकसर-‘तेरा काम खलास!’

अनावृष्टि-सी कृपा तुम्हारी, और  खेतिहर  हम
धीरे-धीरे  दरक  चला है,  धरती-सा विश्वास।

सागर बांध  लिया पल्लू में,  और पोंछ ली आंख
मुस्कानें फिर ओढ़-बिछा लीं, बना लिया दिन ख़ास।

तड़क-भड़क की इस दुनिया में, करें दिखावा लोग
फिर भी अच्छा लगता हमको, अपना फटा लिबास।

यही धैर्य का गोपन है जो,  रहे ‘शरद’ के साथ
आधा खाली मत देखो,  जब आधा भरा गिलास।
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#नवभारत


27 March, 2022

मेरी तन्हाई | ग़ज़ल | डॉ शरद सिंह | नवभारत

"नवभारत" के रविवारीय परिशिष्ट में आज 27.03.2022 को "मेरी तन्हाई" शीर्षक ग़ज़ल प्रकाशित हुई है। आप भी पढ़िए...
हार्दिक धन्यवाद #नवभारत 🙏
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ग़ज़ल
मेरी तन्हाई
- डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह

मेरी तन्हाई भी मुझसे मिलने से घबराती है।
यादों के सैलाब में अक्सर धड़कन डूबी जाती है।

कहने को दुनिया पूरी है लेकिन कोई नहीं सगा
बेगानों के बीच खुशी भी आने से कतराती है।

तेल ज़रा सा है दीपक में, फिर भी देखो तो हिम्मत
नीम अंधेरे में एक नन्हीं बाती जलती जाती है।

ऊपर वाले को हम कोसें या फिर कोसें क़िस्मत को
एक नदी जब चट्टानों से रह-रहकर टकराती है।

दिल पर पत्थर रखना मैंने, सीख लिया है दुनिया से
होठों की तो छोड़ो अब तो आंखें भी मुस्काती हैं।

रंग बहुत है इंद्रधनुष में, पर बेरंग हालात हुए
कोई भी तस्वीर आंख को अब तो नहीं लुभाती है।

किसके ख़ातिर जीना है अब, किसके ख़ातिर मरना है
एक यही तो बात समझ में, मुझे नहीं अब आती है।

'शरद' सुहाना मौसम बीता, जीवन में पतझार हुआ
अब तो वर्षा आंसू बनकर, आंखों में आ पाती है ।
        
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20 March, 2022

अंत नहीं शुरुआत नहीं | ग़ज़ल | डॉ शरद सिंह | नवभारत


 "नवभारत" के रविवारीय परिशिष्ट में आज 20.03.2022 को "अंत नहीं शुरुआत नहीं" शीर्षक ग़ज़ल प्रकाशित हुई है। आप भी पढ़िए...
हार्दिक धन्यवाद #नवभारत 🙏
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ग़ज़ल
अंत नहीं शुरुआत नहीं
- डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह

कैसे लिख दें  राम-कहानी, लिखने वाली बात नहीं।
नभ-गंगा  हैं  भीगी  आंखें, पानी भरी परात  नहीं।

समय-डाकिया लाया अकसर, बंद लिफाफा क़िस्मत का
जिसमें से बाधाएं निकलीं, निकली पर  सौगात नहीं।

तलवों में  है  दग्ध-दुपहरी, माथे पर  झुलसी शामें,
जी लें जिसमें  पूरा जीवन,  नेहमयी  वह रात नहीं।

तेज हवा ने  तोड़ गिरा दी, लदी आम की डाल यहां
अपना आपा याद रख सके, इतनी भी अभिजात नहीं।

उमस रौंदती है  कमरे को, तनहाई  जिसमें  ठहरी
ऊंघ रही दीवारें  अब तक,  सपनों की बारात नहीं।

नुक्कड़ के कच्चे ढाबे में, उपजे प्यालों की खनखन
मुक्ति दिला दे जो विपदा से, ऐसा भी संधात नहीं।

अपना भावी, निरपराध ही,  दण्ड झेलता दिखता है
लिखने को अक्षर ढेरों हैं, क़लम नहीं, दावात नहीं।

शबर-गीत हैं शर-धनुषों में, कपट नहीं, छल-छद्म नहीं
भोले-भाले भील-हृदय में, चुटकी भर प्रतिघात नहीं।

टूटे  तारे  के  संग  ढेरों  सम्वेदन  जुड़  जाते हैं
बिना राह से फिसले लेकिन,  होता उल्कापात  नहीं।

शिविर समूहों में खोजा है,  खोजा है  अख़बारों में
मिले हज़ारों लेखन-जीवी,  मिला नहीं हमज़ात कोई।

खण्ड काव्य है, महाकाव्य है और न कोई गीत-ग़ज़ल
चूड़ी  जैसी  पीर  हमारी,  अंत नहीं, शुरुआत  नहीं।

गिर पड़ते हैं अर्ध्य सरीखे,  अंजुरी  जैसी  आंखों  से
‘शरद’ आंसुओं को पीने में,  इतनी भी  निष्णात नहीं।

(निष्णात = माहिर)

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06 February, 2022

आजकल | ग़ज़ल | डॉ शरद सिंह | नवभारत

मित्रो, "नवभारत" के रविवारीय परिशिष्ट में आज 06.02.2022 को "आजकल" शीर्षक ग़ज़ल प्रकाशित हुई है। आप भी पढ़िए...
हार्दिक धन्यवाद #नवभारत 🙏
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ग़ज़ल
आजकल
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

ज़िन्दगी दिखती  उदासी आजकल।
आस्था लगती धुंआ-सी  आजकल।

हर तरफ   व्यवहार   में  कड़वाहटें
दिन नहीं मिलते बतासी आजकल।

मित्रता  के  नाम पर  धोखा-फ़रेब
बात कहने को ज़रा-सी आजकल।

इश्तिहारों  पर   चटख   से  रंग   हैं
अन्यथा सब कुछ कपासी आजकल।

बुन रही  है   स्वप्न का  इक घोंसला
आंख भी नन्हीं बया सी आजकल।

आजकल कुछ हो गया हालात को
मावसी है,   पूर्णमासी   आजकल।

कंदराएं  अब  भली  लगने लगीं
हो गया मन आदिवासी आजकल।

निर्जला व्रत कह दिया हमने, मगर
आत्मा तक है पियासी आजकल।

तुम नहीं हो तो ‘शरद’ भी खिन्न है
हर  हंसी है  सप्रयासी आजकल। 
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23 January, 2022

जाड़े वाली रात | ग़ज़ल | डॉ शरद सिंह | नवभारत

 "नवभारत" के रविवारीय परिशिष्ट में आज 23.01.2022 को  ग़ज़ल प्रकाशित हुई है "जाड़े वाली रात" । आप भी पढ़िए...
हार्दिक धन्यवाद #नवभारत 🙏
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ग़ज़ल
जाड़े वाली रात
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

सर्दी की है लहर हमेशा, जाड़े वाली रात
बरपाती है क़हर  हमेशा, जाड़े वाली रात

चंदा  ढूंढे  कंबल-पल्ली,  तारे  ढूंढें  शॉल
हीटर तापे शहर हमेशा,  जाड़े वाली रात

पन्नीवाली झुग्गी कांपे, कंपता है फुटपाथ
बर्फ़ सरीखी नहर हमेशा, जाड़े वाली रात

जिसके सिर पर छत न होवे और न कोई शेड
लगती उसको ज़हर हमेशा, जाड़े वाली रात

कर्फ्यू जैसी सूनी सड़कें, कहती हैं ये हरदम
एक ठिए पर  ठहर हमेशा,जाड़े वाली रात

धुंध, कुहासा, कोहरा ओढ़े सूरज सोया रहता
धीरे    लाती   सहर    हमेशा,जाड़े वाली रात

ढेरों करवट गिनते रहते नींद अगर जो टूटे 
होते  लम्बे  पहर  हमेशा,  जाड़े वाली रात

छोटी बहरों वाली ग़ज़लों जैसे छोटे दिन
लगती लम्बी बहर हमेशा,जाड़े वाली रात
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19 December, 2021

अपशब्द | कविता | डॉ शरद सिंह | नवभारत

मित्रो, "नवभारत" के रविवारीय परिशिष्ट में आज "अपशब्द" शीर्षक कविता प्रकाशित हुई है। आप भी पढ़िए...
हार्दिक धन्यवाद #नवभारत 🙏

अपशब्द
       - डॉ शरद सिंह
अपशब्द
नहीं कहना चाहती
मेरी वाणी
किन्तु
जब कुछ छिछले कटाक्ष
टकराते हैं कानों से
तो उबाल आता है मन में
बंधने लगती हैं मुट्ठियां
उमड़ता है आवेग
देने को
मुंहतोड़ ज़वाब

तभी
मेरा अवचेतन
खींचने लगता है
चेतना की वल्गाएं
और 
कहता है
दस्तक दे कर
माथे पर
मत बनो उसके जैसी

नहीं करता परवाह
सूर्य, बृहस्पति या शुक्र
छुद्र उल्काओं की
घूमता है अपनी धुरी पर
निस्पृह हो कर
जबकि 
हो जाती हैं राख
स्वतः जल कर
छुद्र उल्काएं

बात सहज है
और नहीं भी
आप्लावित धैर्य
छलक पड़ने को
हो उठता है आतुर
तब 
निकल पड़ते हैं अपशब्द
मेरे भी मुख से
पर उन्हें सुनती हैं
बंद कमरे की
खिड़कियां, दरवाज़े
और दीवारें
चेतन और अवचेतन के बीच 
एक आदिम द्वंद्व
द्वार खुलने तक
शांति का 
तय होता रस्ता
अक्षमताओं की भूमि पर
बोता रहता है
क्षमताओं का बीज

शांत मन
एक बार फिर
काटता है मुस्कुराहट की
लहलहाती फसल
और
सोचते हैं देखने वाले
उफ! ये कितनी बेअसर है।
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