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19 September, 2021

वह नहीं आई | कविता | डॉ शरद सिंह

वह नहीं आई
      - डॉ शरद सिंह

वह गाय
जो रोज़
मेरे घर के दरवाज़े पर
आ खड़ी होती
करती जुगाली
उम्मीद करती
कुछ छिलके पाने की
एकाध बासी रोटी पाने की
आज वह नहीं आई

मैं जानती हूं
उसका है कोई मालिक 
पूरा का पूरा कौलिक

दुह कर दूध
भगा देता है 
अपने घर से,
शाम के बाद ही
लौट पाती है वह
 
सुबह फिर वही
दिनचर्या

दिन भर 
यहां-वहां डोलती
मार खाती
अपने बड़े से शरीर को
दो-चार टुकड़ों पर जिलाती,
शायद
अपने गाय होने को कोसती
या फिर
'माता' कहे जाने पर
शर्मिंदा होती,
अपनी सुंदर
काली आंखों से देखती
मेरे दरवाज़े जब
गोबर कर जाती
मुझे बेसाख़्ता
झुंझलाहट से भर जाती

पर
आज नहीं आई वह
क्या हुआ उसे?
मालिक ने 
बेच तो नहीं दिया
बूचड़खाने में?
बूढ़ी इंसानी मांए भी
निकाल दी जाती हैं घर से
फिर वह तो
महज़ गाय है
मुझे क्यों होना चाहिए दुखी
उसके न आने पर
मगर
क्या करूं 
बिछड़ने का दर्द
हर बार 
कर देता है विचलित
चाहे मां हो या गाय।
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(*कौलिक=पाखंडी)

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