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17 February, 2025

ग़ज़ल | तनहाई है - डॉ शरद सिंह

ग़ज़ल :  तनहाई है
          - डॉ शरद सिंह
चौतरफा   सन्नाटा है,    तनहाई है 
देखो, क़िस्मत कहां मुझे ले आई है 

दीवारों से बातें करना कठिन हुआ
मेरे  दुखड़े  से  छत  भी   घबराई है 

हरपल आंखों में आंसू भर आते हैं
बेबस दिल  की ये कैसी भरपाई है

झूठे हर्फ़ों  की  इतनी  भरमार हुई
स्याही भी काग़ज़ से अब शरमाई है

"शरद" हौसले की पतवारें साबुत हैं
कश्ती   भर   चट्टानों  से  टकराई है
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 #literature  #डॉसुश्रीशरदसिंह  #ग़ज़ल 
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#World_Of_Emotions_By_Sharad_Singh

23 April, 2022

कविता | अपराध | डॉ शरद सिंह | प्रजातंत्र

इन्दौर के  लोकप्रिय दैनिक प्रजातंत्र में आज मेरी एक कविता संपादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित हुई है.... जिसका शीर्षक है "अपराध" ... आप भी पढ़िए...
#हार्दिकधन्यवाद  #प्रजातंत्र  🌷🙏🌷

#डॉसुश्रीशरदसिंहकीकविताएं 
#कविता #मेरीकविताएं #अपराध
#PoetriesOfDrMissSharadSingh #Poetry  #mypoetries 

27 March, 2022

मेरी तन्हाई | ग़ज़ल | डॉ शरद सिंह | नवभारत

"नवभारत" के रविवारीय परिशिष्ट में आज 27.03.2022 को "मेरी तन्हाई" शीर्षक ग़ज़ल प्रकाशित हुई है। आप भी पढ़िए...
हार्दिक धन्यवाद #नवभारत 🙏
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ग़ज़ल
मेरी तन्हाई
- डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह

मेरी तन्हाई भी मुझसे मिलने से घबराती है।
यादों के सैलाब में अक्सर धड़कन डूबी जाती है।

कहने को दुनिया पूरी है लेकिन कोई नहीं सगा
बेगानों के बीच खुशी भी आने से कतराती है।

तेल ज़रा सा है दीपक में, फिर भी देखो तो हिम्मत
नीम अंधेरे में एक नन्हीं बाती जलती जाती है।

ऊपर वाले को हम कोसें या फिर कोसें क़िस्मत को
एक नदी जब चट्टानों से रह-रहकर टकराती है।

दिल पर पत्थर रखना मैंने, सीख लिया है दुनिया से
होठों की तो छोड़ो अब तो आंखें भी मुस्काती हैं।

रंग बहुत है इंद्रधनुष में, पर बेरंग हालात हुए
कोई भी तस्वीर आंख को अब तो नहीं लुभाती है।

किसके ख़ातिर जीना है अब, किसके ख़ातिर मरना है
एक यही तो बात समझ में, मुझे नहीं अब आती है।

'शरद' सुहाना मौसम बीता, जीवन में पतझार हुआ
अब तो वर्षा आंसू बनकर, आंखों में आ पाती है ।
        
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20 March, 2022

अंत नहीं शुरुआत नहीं | ग़ज़ल | डॉ शरद सिंह | नवभारत


 "नवभारत" के रविवारीय परिशिष्ट में आज 20.03.2022 को "अंत नहीं शुरुआत नहीं" शीर्षक ग़ज़ल प्रकाशित हुई है। आप भी पढ़िए...
हार्दिक धन्यवाद #नवभारत 🙏
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ग़ज़ल
अंत नहीं शुरुआत नहीं
- डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह

कैसे लिख दें  राम-कहानी, लिखने वाली बात नहीं।
नभ-गंगा  हैं  भीगी  आंखें, पानी भरी परात  नहीं।

समय-डाकिया लाया अकसर, बंद लिफाफा क़िस्मत का
जिसमें से बाधाएं निकलीं, निकली पर  सौगात नहीं।

तलवों में  है  दग्ध-दुपहरी, माथे पर  झुलसी शामें,
जी लें जिसमें  पूरा जीवन,  नेहमयी  वह रात नहीं।

तेज हवा ने  तोड़ गिरा दी, लदी आम की डाल यहां
अपना आपा याद रख सके, इतनी भी अभिजात नहीं।

उमस रौंदती है  कमरे को, तनहाई  जिसमें  ठहरी
ऊंघ रही दीवारें  अब तक,  सपनों की बारात नहीं।

नुक्कड़ के कच्चे ढाबे में, उपजे प्यालों की खनखन
मुक्ति दिला दे जो विपदा से, ऐसा भी संधात नहीं।

अपना भावी, निरपराध ही,  दण्ड झेलता दिखता है
लिखने को अक्षर ढेरों हैं, क़लम नहीं, दावात नहीं।

शबर-गीत हैं शर-धनुषों में, कपट नहीं, छल-छद्म नहीं
भोले-भाले भील-हृदय में, चुटकी भर प्रतिघात नहीं।

टूटे  तारे  के  संग  ढेरों  सम्वेदन  जुड़  जाते हैं
बिना राह से फिसले लेकिन,  होता उल्कापात  नहीं।

शिविर समूहों में खोजा है,  खोजा है  अख़बारों में
मिले हज़ारों लेखन-जीवी,  मिला नहीं हमज़ात कोई।

खण्ड काव्य है, महाकाव्य है और न कोई गीत-ग़ज़ल
चूड़ी  जैसी  पीर  हमारी,  अंत नहीं, शुरुआत  नहीं।

गिर पड़ते हैं अर्ध्य सरीखे,  अंजुरी  जैसी  आंखों  से
‘शरद’ आंसुओं को पीने में,  इतनी भी  निष्णात नहीं।

(निष्णात = माहिर)

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06 February, 2022

आजकल | ग़ज़ल | डॉ शरद सिंह | नवभारत

मित्रो, "नवभारत" के रविवारीय परिशिष्ट में आज 06.02.2022 को "आजकल" शीर्षक ग़ज़ल प्रकाशित हुई है। आप भी पढ़िए...
हार्दिक धन्यवाद #नवभारत 🙏
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ग़ज़ल
आजकल
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

ज़िन्दगी दिखती  उदासी आजकल।
आस्था लगती धुंआ-सी  आजकल।

हर तरफ   व्यवहार   में  कड़वाहटें
दिन नहीं मिलते बतासी आजकल।

मित्रता  के  नाम पर  धोखा-फ़रेब
बात कहने को ज़रा-सी आजकल।

इश्तिहारों  पर   चटख   से  रंग   हैं
अन्यथा सब कुछ कपासी आजकल।

बुन रही  है   स्वप्न का  इक घोंसला
आंख भी नन्हीं बया सी आजकल।

आजकल कुछ हो गया हालात को
मावसी है,   पूर्णमासी   आजकल।

कंदराएं  अब  भली  लगने लगीं
हो गया मन आदिवासी आजकल।

निर्जला व्रत कह दिया हमने, मगर
आत्मा तक है पियासी आजकल।

तुम नहीं हो तो ‘शरद’ भी खिन्न है
हर  हंसी है  सप्रयासी आजकल। 
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23 January, 2022

जाड़े वाली रात | ग़ज़ल | डॉ शरद सिंह | नवभारत

 "नवभारत" के रविवारीय परिशिष्ट में आज 23.01.2022 को  ग़ज़ल प्रकाशित हुई है "जाड़े वाली रात" । आप भी पढ़िए...
हार्दिक धन्यवाद #नवभारत 🙏
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ग़ज़ल
जाड़े वाली रात
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

सर्दी की है लहर हमेशा, जाड़े वाली रात
बरपाती है क़हर  हमेशा, जाड़े वाली रात

चंदा  ढूंढे  कंबल-पल्ली,  तारे  ढूंढें  शॉल
हीटर तापे शहर हमेशा,  जाड़े वाली रात

पन्नीवाली झुग्गी कांपे, कंपता है फुटपाथ
बर्फ़ सरीखी नहर हमेशा, जाड़े वाली रात

जिसके सिर पर छत न होवे और न कोई शेड
लगती उसको ज़हर हमेशा, जाड़े वाली रात

कर्फ्यू जैसी सूनी सड़कें, कहती हैं ये हरदम
एक ठिए पर  ठहर हमेशा,जाड़े वाली रात

धुंध, कुहासा, कोहरा ओढ़े सूरज सोया रहता
धीरे    लाती   सहर    हमेशा,जाड़े वाली रात

ढेरों करवट गिनते रहते नींद अगर जो टूटे 
होते  लम्बे  पहर  हमेशा,  जाड़े वाली रात

छोटी बहरों वाली ग़ज़लों जैसे छोटे दिन
लगती लम्बी बहर हमेशा,जाड़े वाली रात
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20 January, 2022

अब कठिन हो चला है | कविता | डॉ शरद सिंह

अब कठिन हो चला है
         - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह

एक तारा 
टिमटिमाता है
दूसरा टूटता है
और तीसरा -
सबसे बड़ा हो कर भी
दिखता है फ़ीका
क्योंकि वह है बहुत दूर
अंतरिक्ष की अतल गहराइयों में
दृष्टि की क्षमता के
अंतिम छोर पर

ठीक ऐसे ही
बनता है एक विक्षोभ
हृदय के भीतर
सांसों की गति से
करवट लेते मौसमों के बीच

कड़ाके की ठंड में
जब चांद बन गया हो सूरज
बर्फ जमती-सी
महसूस होने लगी हो
एकाकीपन के ध्रुव में
यादों की लपट
पिघलाने लगती है
भावनाओं के ग्लेशियर को
बढ़ने लगता है तब
आंखों का जलस्तर

देह में गहराती शीत
मन को झुलसाती भावनाएं
आंखों में आती बाढ़
सच,
अब कठिन हो चला है
एक साथ
सारे मौसमों को जीना।
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11 November, 2021

झुकती पृथ्वी | कविता | डॉ शरद सिंह


झुकती पृथ्वी
        - डॉ शरद सिंह

किसी प्रेमिका
या
नववधू सी
प्रेम के
संवेग से
भर कर नहीं,
मां के ममत्व से
उद्वेलित हो कर नहीं

पृथ्वी
घूम रही है
झुकी-झुकी
अपनी धुरी पर
कटते जंगलों
सूखती नदियों
गिरते जलस्तरों
बढ़ते प्रदूषण
और
ओजोन परत में
हो चले छेदों पर
आंसू बहाती हुई
घबराई-सी।

पृथ्वी
घूम रही है
अपने कक्ष में

हादसों को देखती
झेलती अपराधों को
नापती संवेदना के
गिरते स्तर को
नौकरी के हाट में बिकते
युवाओं को
और सूने घर में
छूट रहे बूढ़ों को
निर्माण से नष्ट की ओर
बढ़ती व्यवस्थाओं पर
सुबकती हुई
हिचकियां लेती
लापरहवाहियों के
ब्लैक होल की ओर बढ़ती

पृथ्वी
अब और
झुक जाना चाहती है
हम इंसानों की
करतूतों पर शरमाती हुई।
       ------------- 
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09 November, 2021

वे बच्चे | कविता | डॉ शरद सिंह

वे बच्चे
       - डॉ शरद सिंह

वे जो नन्हें बच्चे
नहीं जानते थे दुनिया
नहीं जानते थे
आग की तपिश
नहीं जानते थे
जीने की मशक्क़त
नहीं जानते थे
कि वे क्यों हैं
अस्पताल में
अब कभी 
जान भी नहीं सकेंगे
ज़िंदगी को
जिसे बचाने
भर्ती किए गए थे वे

वे रहते
तो धीरे-धीरे चढ़ते
उम्र की सीढ़ियां
जाते किसी
सरकारी स्कूल में
कुछ निकलते पढ़ाकू
कुछ पंक्चर जोड़ने वाले
और बनते
अपने परिवार के सहारे

अब 
उनकी किलकारियां
कभी नहीं
सुन पाएंगी मांंएं
नहीं सिखा पाएंगे
उंगली पकड़ कर चलना
उनके पिता

पछताते रहेंगे सिर्फ़
भर्ती करने पर
गोया 
अस्पताल हमीदिया का 
एसएनसीयू वार्ड नहीं
जीवित (शव×) दाहगृह हो
या लापरवाहियों का
अक्ष्म्य, घातक उदाहरण
या फिर
शाम तक 
बासी हो जाने ख़बर।
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07 November, 2021

हादसे | कविता | डॉ शरद सिंह

हादसे
         - डॉ शरद सिंह

एक पेंसिल शार्पनर 
ही तो हैं हादसे
जो बनाते रहते हैं नुकीला
इस ज़िन्दगी को
 
नोंक 
बन जाए चुभने लायक
तो चलती रहती है
अजेय
कुछ देर

भोथरी हो जाए
तो जीने के प्रयासों की 
लिखावट
हो जाती है
भद्दी, बदसूरत
जिसे कोई
पढ़ना न चाहे

और
टूट जाए नोंक 
तो एक और हादसा
छील कर
उतार देता है
आत्मा की पर्तें भी

पेंसिल के अंतिम सिरे तक
जो बच रहता है
पी जा चुकी
सिगरेट के टोटे सा
मृत्यु के जूते तले
कुचले जाने तक
मिट्टी मिश्रित ग्रेफाईट की 
काली सींक की तरह
आशाओं की 
नर्म लकड़ी में दबी
लिखने और टूटने के
संघर्ष में
हादसों से
छिलती रहती है ज़िंदगी।
        ------------
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01 November, 2021

रीती हुई मुट्ठियां | कविता | डॉ शरद सिंह

रीती हुई मुट्ठियां
         - डॉ शरद सिंह
सुबह
सूरज की किरणों के साथ
सहेज कर रखी
एक मुट्ठी आशा
और
एक मुट्ठी उत्साह,
भर गई थीं
दोनों मुट्ठियां

घड़ी के कांटों के साथ
सरकते गए
सेकंड्स, मिनट्स
और घंटे
लुढ़कता गया 
पहर
किसी गेंद की तरह

ढीली पड़ती गई
मुट्ठी की पकड़
फिसल गई
रेत की भांति
आशा और
उत्साह

कचोटने लगा
अपना होना
चुभने लगा
अस्तित्व ख़ुद का
वृथा लगने लगा
लिखा हुआ ख़ुद का
ख़ुद से ही उचटने लगा
मन
गिरने लगे अक्षर
लैपटॉप की स्क्रीन से
ठिठकने लगी उंगलियां
ठहरने लगे विचार

शाम के बाद
शनैः शनैः आती रात
रीती हुई
मुट्ठियों के साथ
गुज़रेगी
ओढ़कर
अवसाद का लिहाफ़
और 
डबडबाती रहेंगी आंखें
तक़िया भिगोती हुईं।
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31 October, 2021

एक और शाम | कविता | डॉ शरद सिंह

एक और शाम
    - डाॅ शरद सिंह

एक और शाम
उदासी के पोखर में
आ गई डुबोने

नहीं जाएगी 
एकांतिक शीत
किसी भी
लिहाफ़ या कम्बल से
न शाॅल, न स्वेटर से

अब कहां
वह उष्मा
जो मिलती 
गोद में सिर रखने से
अब वह 
गरमाहट कहां
जो शब्दों की चाय संग
उतर जाती
दिल में

बुझ गई
ममत्व की अंगीठी
दब गए अंगारे
त्रासदी की राख तले
अभी तो कार्तिक ही आया
आएगा पूस और माघ भी
जब फेंकेगा हीटर-ब्लोअर 
सन्नाटे की ठंडी हवा
कैसे कटेंगी वे
जड़कारे की शामें
दहशत होती है
सोच कर अभी से

ओ शीत !
किसने कहा 
कि तुम आना
उनके पास जो
रह गए हैं अकेले
मत दो उन्हें 
अवसाद की सज़ा
जितना झेला
वह कम नहीं क्या?
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30 October, 2021

शाप की एक और किस्त | कविता | डॉ शरद सिंह

शाप की एक और किस्त
          - डॉ शरद सिंह

धीरे-धीरे टहलता हुआ
आ रहा जाड़ा,
उदास
अवसादी शाम
घोल रही है सूनापन
आंखों की नमी में

गहराने लगता है
संसार की 
नश्वरता का बोध
और एकाकीपन का
बर्फीला अहसास
मन दौड़ता है 
मकरोनिया चौराहे
या सिविल लाईन की
गहमागहमी की ओर

बेचारा, 
बेवकूफ़ मन!
भीड़ के रेले में
तलाशता ठहराव,
हार-थक कर लौटता
सिमटता
अपने एकांत के खोल में
किसी कछुए की तरह
या 
शापित यक्ष की भांति
हो जाता है 
प्रतीक्षारत 
शापमुक्त होने के लिए

शाप
अभी जाड़े में 
और गहराएगा
जब होते जाएंगे
दिन छोटे
और रातें लम्बी
मानो प्रकृति भी 
देगी सज़ा
यक्षी-मन को
बंद कमरा
भर जाएगा 
सिसकियों से
किसी बीहड़ में
सांय-सांय करती
ध्वनि की तरह
निःशब्द रुदन से
शाप की एक और
किस्त बन कर।
      ---------
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12 October, 2021

डॉ शरद सिंह सागर की 2021 की 'पिंक सागर' की 100 शक्तिशाली महिलाओं में

पिंक सागर! मेरा नाम सागर की 2021 की 100 शक्तिशाली महिलाओं की आपकी सूची में है...
 इस सम्मान के लिए हार्दिक धन्यवाद 🙏

Pink Sagar! my name is in your list of Sagar's 100 Powerful Women of 2021...
Hearty Thanks for this Honour 🙏
#pinksagar
#100PowerfulWomen
#Sagar #WomenPower 
#Thanks #Honour

30 September, 2021

डॉ शरद सिंह की कविता "दूर, बहुत दूर" का पंजाबी में अनुवाद प्रकाशित

मेरी कविता "दूर, बहुत दूर" का पंजाबी अनुवाद "प्रतिमान" जुलाई-सितंबर 2021अंक में प्रकाशित हुआ है जिसके लिए मैं पंजाबी एवं हिन्दी के चर्चित साहित्यकार डॉ अमरजीत कौंके की अत्यंत आभारी हूं🙏
हिन्दी भाषी मित्रो के लिए अपनी मूल हिन्दी कविता भी यहां दे रही हूं-
दूर, बहुत दूर
       - डॉ शरद सिंह

घर की क़ैद से निकल कर
दूर, बहुत दूर निकल जाने की इच्छा
बलवती होने लगी है
इन दिनों

अख़बारों की
कराहती सुर्खियों से दूर
मृतक आंकड़ों की
चींखों से दूर
सांत्वना के निरंतर
दोहराए जाने वाले
बर्फीले शब्दों से दूर

अस्पताल परिसर की
यादों से दूर
बंद ग्रिल के पीछे
कोविड वार्ड के
ख़ौफ़नाक अहसास से दूर
आधी रात के बाद
फ़ोन पर आई
उस हृदयाघाती सूचना से दूर

शासन तंत्र की
ख़ामियों से दूर
घोषणाओं की
झूठी उम्मींदों से दूर
जनता की
आत्मकेन्द्रियता से दूर
प्रजातंत्र के राजा की
नींदों से दूर

कहीं दूर...
बहुत दूर
जहां सागौन का हो जंगल
संकरी पगडंडी
एक पतली नदी
एक झरना
एक कुण्ड
देवता विहीन
प्राचीन मंदिरों के अवशेष
बंदरों की हूप
और पक्षियों की आवाज़ें

वहां
जहां मैं प्रकृति में रहूं
और प्रकृति मुझमें
न कोई बनावट
न धोखा, न छल
न पंजा, न कमल
ले सकूं खुल कर सांस
प्रदूषण रहित हवा में
न ढूंढना पड़े जीवन
वैक्सीन या दवा में

शायद तब मैं
जी लूंगी
एक बार फिर
जी भर कर।
     ------------

#poetry #DrSharadSingh #TranslatedInPunjabi
#HindiPoetry

19 September, 2021

वह नहीं आई | कविता | डॉ शरद सिंह

वह नहीं आई
      - डॉ शरद सिंह

वह गाय
जो रोज़
मेरे घर के दरवाज़े पर
आ खड़ी होती
करती जुगाली
उम्मीद करती
कुछ छिलके पाने की
एकाध बासी रोटी पाने की
आज वह नहीं आई

मैं जानती हूं
उसका है कोई मालिक 
पूरा का पूरा कौलिक

दुह कर दूध
भगा देता है 
अपने घर से,
शाम के बाद ही
लौट पाती है वह
 
सुबह फिर वही
दिनचर्या

दिन भर 
यहां-वहां डोलती
मार खाती
अपने बड़े से शरीर को
दो-चार टुकड़ों पर जिलाती,
शायद
अपने गाय होने को कोसती
या फिर
'माता' कहे जाने पर
शर्मिंदा होती,
अपनी सुंदर
काली आंखों से देखती
मेरे दरवाज़े जब
गोबर कर जाती
मुझे बेसाख़्ता
झुंझलाहट से भर जाती

पर
आज नहीं आई वह
क्या हुआ उसे?
मालिक ने 
बेच तो नहीं दिया
बूचड़खाने में?
बूढ़ी इंसानी मांए भी
निकाल दी जाती हैं घर से
फिर वह तो
महज़ गाय है
मुझे क्यों होना चाहिए दुखी
उसके न आने पर
मगर
क्या करूं 
बिछड़ने का दर्द
हर बार 
कर देता है विचलित
चाहे मां हो या गाय।
--------------------
(*कौलिक=पाखंडी)

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17 September, 2021

फ़िलहाल | कविता | डॉ शरद सिंह

फ़िलहाल
      - डॉ शरद सिंह

रात की 
स्याह दीवार पर
चांद का खूंटा
ढो रहा है
तारों की चुनरी को

आमवस में
ढंक जाता है खूंटा
रह जाती है
दिदिपाती चुनरी

चाहे पूर्णिमा हो
या अमावस्या
आकाश सुरक्षित है
चुनरी के लिए
 जबकि धरती पर
सुरक्षित नहीं चुनरी
शोहदों से
निर्भयाओं के साथ
हो रहे जघन्य अपराध
नहीं रच सकते
भयमुक्त समाज

धरती से 
आकाश ही भला है
फ़िलहाल।
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11 September, 2021

मुखौटे | कविता | डॉ शरद सिंह

 
 मुखौटे
- डाॅ शरद सिंह

थक गई हूं अब
सहानुभूति के खोखले शब्दों से
मेरी अपदा में 
अपना अवसर ढूंढने वालों से
वक़्त के साथ चेहरों से
उतरने लगे हैं मुखौटे

‘फ़ोन नहीं उठता’ का
उलाहना देने वाले -
कुछ ने 
मेरी त्रासद रात में
नहीं उठाया था मेरा फ़ोन
नहीं सुनी थी मेरी पुकार
नहीं दिया था
अपनी आवाज़ का भी सहारा

कुछ ने 
मेरे रुदन से 
अपने कानों को बचाने के लिए
मुझे नहीं किया फ़ोन
नहीं बोले दो शब्द
सांत्वना के

कुछ ने 
प्रतीक्षा की मेरे टूटने की
बिखरने की
अपने हाथों, अपना 
अस्तित्व मिटा देने की
अफ़सोस कि मैंने
निराश किया उन्हें

कुछ ने 
बात की
मगर ज़ल्द ही
मान लिया मुझे भी
मृत समान
जिसके ऊपर से गुज़र कर
आगे बढ़ने का 
साफ़ था रास्ता उनके लिए

कुछ ने 
कुछ दूर साथ दिया
फिर डर गए वे 
दुनिया से 
या अपने-आप से,
यह तो वही जानें

कुछ हैं आज भी साथ
बेहिचक, बेझिझक 
निःस्वार्थ (शायद),
छान देगा समय 
उनको भी 
प्रेम और इंसानीयत की 
छन्नी से

देखूंगी
कौन देता है साथ मेरा
मेरे अंत तक
फ़िलहाल उकताने लगी हूं
अपनी बेचारगी से

नहीं चाहिए मुझे दया,
नहीं चाहिए मुझे 
बहादुरी का तमगा,
नहीं चाहिए मुझे 
झूठा अपनापन

इन सबसे-
बेहतर है मेरा अकेलापन
मुझे नहीं जाता छोड़ कर,
मुझसे नहीं बोलता झूठ,
नहीं करता दावे 
मेरे आंसू पोंछने के,
वह मेरे साथ था
उस त्रासद रात भी,
है आज भी
और रहेगा हमेशा
मेरे साथ,
एक सच्चे,
बिना मुखौटे के
इंसान की तलाश में,
तलाश-
जो जानती हूं
कभी पूरी नहीं होगी
इस
बाज़ारवाद की दुनिया में
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10 September, 2021

फिर भी पधारो गणपति | कविता | डॉ शरद सिंह

फिर भी पधारो गणपति !
           - डॉ शरद सिंह
हे एकदंत पधारो 
इस कराहते घर में
जो जूझ रहा है 
अपनों को खो कर
अपने एकाकीपन से

हे गजानन पधारो
इस रुदन करते आंगन में
जो लौट कर नहीं आ सका
यहां से चिकित्सालय जाने वाला

हे गजकर्ण पधारो
मेरी उस अनंतर्ध्वनि में
जिसमें आज भी प्रश्न
गूंजता है कि
क्यों नहीं सुनी थी
तुमने मेरी पुकार
मेरी चीत्कार

हे भालचंद्र पधारो
मेरे जीवन के 
उस गहन अंधकार में
जिसमें तुम
उजाला नहीं भर सके
और न कभी भर सकोगे

हे बुद्धिनाथ पधारो
जिन्हें बुद्धि दिया तुमने
वायरस बनाने
और फैलाने का
सारी दुनिया को
रुलाने का,
उनकी बुद्धि का
परिणाम देखो
हो गए अनाथों पर
और लगाओ अट्टहास 

भले ही तुमने
नहीं सुना था मेरी पुकार
छीन लिया मुझसे
मेरा सुख-संसार
तुम हो मेरे शत्रुसम
फिर भी पधारो गणपति !
मैं तुम्हें बुलाती रहूंगी
याद दिलाती रहूंगी
कि तुमने ठुकरा दिया था
प्राण-भिक्षा की मेरी
प्रार्थना को,
हां, नहीं सुना था तुमने
फिर भी पधारो गणपति !
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06 September, 2021

निर्लज्जता | कविता | डॉ शरद सिंह

निर्लज्जता
       - डॉ शरद सिंह

वह बच्चा
जो बीन रहा है
हर बिकाऊ वस्तु
कचरे के ढेर से
उसे नहीं डर 
न कोविड का
न किसी और संक्रमण का
वह तो
पैदायशी ग्रस्त है
ग़रीबी के वायरस से

वह बच्चा
देखता है सपने
स्कूल का नहीं,
पढ़ाई का नहीं
बस, अपने मोहल्ले का
'दादा' बनने का
ताकि
जिस दूकान से उसे
नहीं मिलती उधार में रोटी
उस दूकान से
वसूल सके 'हफ़्ता'
और ठंडे लोहे की
एक पिस्टल
खुंसी रहे 
उसकी पेंट में पिछवाड़े

वह बच्चा
जो बचा नहीं पाया
अपनी बहन को
बिकने से,
जो छुड़ा नहीं पाया
बाप की दारू,
जो मलहम नहीं लगा पाया
मां के ज़ख़्मों पर,
जो रोज हारता है
अपनी भूख-प्यास से

उस बच्चे से
उम्मीद करना आदर्श की
हमारी निर्लज्जता नहीं
तो और क्या है?
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