शरद का चांद
- डॉ शरद सिंह
शरद पूनम का चांद
पूरा है
पर
भीतर से
अधूरा है
या फिर
मेरी उदास आंखें
छलछला उठी
उसे देखते ही
और
दिखने लगा
चांद भी उदास
यादों के धब्बे
कैसे धोएगा चांद
मुझे पता नहीं
और कब तक
रोएगा चांद
मुझे पता नहीं
पता है तो
सिर्फ़ इतना कि
उदासी शीत
उतरा करेगी आंगन में
और
दूब की नोंक पर
दिखेंगे रात के आंसू
बड़े भोर से
शुक्लपक्षी बन कर
उड़े आकाश में
या छिप जाए
कृष्णपक्षी बन कर
चांद उदास रहेगा
ऋतु शरद उदास रहेगी
उदास रहेगी रात
व्यस्तता भरा दिन लिए
सूर्य के आने तक
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