पाषाण
- डॉ शरद सिंह
आज
आसमान
कुछ ज़्यादा चमकदार
कुछ हल्का नीला
कुछ उदारमना
लग रहा
कुछ तटस्थ भी
ऐसा क्यों?
बहुत सोचा
तो हुआ अहसास
आज सुबह से
आंखें नहीं भीगीं
दर्द नहीं गहराया
अपनों का छूटा साथ
कथित मित्रों के
घात, आघात
याद आई
सबकी
पर नहीं घेरा व्यथा ने
अर्थात्
पाषाण होने की
प्रक्रिया में है हृदय
वेदना और संवेदना से परे।
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