13 April, 2024

कविता | पुराने कलेण्डर के पन्ने | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

कविता
पुराने कलेण्डर के पन्ने
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

अलमारी के खानों में 
बिछाकर रखे थे 
पुराने कैलेंडर के पन्ने
आज खोला जो 
अलमारी 
तो सोच बदल दूं ,
बिछा दूं नए काग़ज़।
कलेण्डर के पन्नो़ं के 
सफ़ेद पृष्ठ भाग 
यूं भी
हो चले हैं पीले 
टूटने लगेगा काग़ज़,
नया काग़ज़ 
लाएगा 
नया ताज़ापन,
यह सोचकर निकाले 
अलमारी से वे पन्ने
हर पन्ने को पलटते ही 
मिलीं कुछ पुरानी तारीख़ें
और उन तारीख़ों में
ढेर सारी यादें

कांपते हाथों से 
वापस जमा दिए  
पुराने पन्ने 
जहां बिछे थे वे पहले,
उन्हीं पर बिछा दीं 
नए काग़ज़ की पर्तें 
आख़िर
कुछ यादों का 
दबे रहना 
ज़रूरी है,
समय-समय पर 
पलट कर 
देखने के लिए।
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10 April, 2024

कविता | अब तो | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

कविता
अब तो ...
        - डॉ (सुश्री) शरद सिंह
दीवार पर हथेली की
धुंधली पड़ती छाप
टूटती थाप
ज़िंदगी छूटे हुए
मकान की तरह
वीरान 
गोया
दो गज ज़मीन के नीचे
एक ताबूत में
ज़िंदा दफ़्न

नहीं चाहिए
हवा, पानी धूप
या सांसों की धौंकनी
चिता की 
स्थूल लकड़ियों के बीच
रखे धड़कते दिल को
नहीं चाहिए
ये सब

हंसी, ख़ुशी और
प्रेम के लिए
अब तो इंतज़ार ...
अगले जन्म का
अगर
होता हो तो !

धैर्य के फूटे कुल्हड़ से रिसती
कथित रिश्तों की तप्त चाय
जलाने लगी है
उंगलियां, अब तो!
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शायरी | मुस्कुराहट | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

मुस्कुराहट  तो  एक  पर्दा  है
ग़म कभी भी जुदा नहीं होता। 
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

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03 April, 2024

कविता | अहसास | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

कविता
अहसास
        - डॉ (सुश्री) शरद सिंह
तब मैं 
कुछ हुआ करती थी
जब मुझे
पुकारता था कोई
ममता से भर कर,
दुलार कर
पुचकार कर
मनुहार कर...
लड़कपन
जाग उठता था
मेरे भीतर
सात जन्म
सात रंग
और
सात समुद्रों-सा
जीवंत

अब कोलाहल है
पर वह 
स्वर नहीं
सूखी दीवारें
रचती रहती हैं
रेत के टीले
हर पहलू
हर करवट
के साथ

एक अथाह रेगिस्तान
दिन की तपन
रात की ठंड
और कुछ नहीं
बस, कुछ साए
खेलते हैं
सांप-सीढ़ी
मेरी 
भावनाओं के साथ

बेचारे!
उन्हें नहीं पता
कि व्यर्थ है उनका
प्रयास,
अब नहीं होता 
मुझे अपने
होने का भी
अहसास।
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