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17 October, 2021

अब तो चाहिए | कविता | डॉ शरद सिंह

अब तो चाहिए...
          - डॉ शरद सिंह
बहुत थकान होती है -
उधार के रिश्तों को 
जीते हुए, 
जैसे ओढ़ी हुई मुस्कान
थका देती है होंठों को
गालों को 
और आंखों की कोरों को
हां,
बहुत थकान होती है -
जब रिश्तों को जीते हैं
रिश्तों के बिना
जीत की उम्मींद में
फेंके हुए पासों की तरह।

और थक-हार कर 
अकसर सोचता है मन
ये ज़िन्दगी 
थकी-थकी सी है
अनुबंधों के लिबास तले
ओह, अब तो चाहिए 
एक सुई या पिन
जिससे उधेड़ा जा सके
इस लिबास की सीवन को।
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