फ़िलहाल
- डॉ शरद सिंह
रात की
स्याह दीवार पर
चांद का खूंटा
ढो रहा है
तारों की चुनरी को
आमवस में
ढंक जाता है खूंटा
रह जाती है
दिदिपाती चुनरी
चाहे पूर्णिमा हो
या अमावस्या
आकाश सुरक्षित है
चुनरी के लिए
जबकि धरती पर
सुरक्षित नहीं चुनरी
शोहदों से
निर्भयाओं के साथ
हो रहे जघन्य अपराध
नहीं रच सकते
भयमुक्त समाज
धरती से
आकाश ही भला है
फ़िलहाल।
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