25 June, 2022

ग़ज़ल | रिवायतें अब बदल रही हैं | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

ग़ज़ल
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

रिवायतें अब   बदल रही हैं 
नए लिबासों में मिल रही हैं

अदब के  क़िस्से  हुए पुराने
बेअदबियां अब मचल रही हैं

ख़तो-क़िताबत चलन से बाहर
फ़िज़ाएं चैटिंग में ढल रही हैं।

जिसे भी देखो हुआ सियासी
हवाएं कैसी   ये चल रही हैं

"शरद" थकन का ना ज़िक्र लाओ
अभी तो सांसें सम्हल रही हैं
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#शरदसिंह #डॉशरदसिंह #डॉसुश्रीशरदसिंह
#SharadSingh #shayari #ghazal #GhazalLovers
#World_Of_Emotions_By_Sharad_Singh #hindipoetry  #शायरी 

11 June, 2022

ग़ज़ल | यूं लगेगा कि प्यार करता है | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

ग़ज़ल
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

यूं लगेगा कि प्यार करता है
इस सलीक़े से वार करता है

बात जज़्बे की मत करो उससे
रूह भी तार - तार  करता है

मुफ़लिसी झूठ-सी लगे उसको
दौलतें   जो   शुमार   करता है

वो कभी  सच  न  देख पाएगा
खु़द ही अपना हिसार करता है

और ये है 'शरद' का दिल पागल
जो  सदा   ग़म-गुसार  करता है
       --------------
*हिसार = क़िलेबंदी
*ग़म-गुसार = दुख-दर्द का बाँटने वाला, सहानुभूति प्रकट करने वाला

04 June, 2022

कविता | लाखा बंजारा झील | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | युवा प्रवर्तक

प्रिय मित्रों,  मेरी कविता "लाखा बंजारा झील" वेब मैगजीन "युवा प्रवर्तक" में आज प्रकाशित हुई है जिसके लिए मैं भाई देवेंद्र सोनी जी की हार्दिक आभारी हूं 🙏 
यह कविता आपके शहर की भी हो सकती है... इसे पढ़ें और महसूस करें...
इसे इस लिंक पर भी पढ़ सकते हैं..
https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=570862761342376&id=108584627570194

आप सभी की सुविधा के लिए टेक्स्ट भी दे रही हूं.....
कविता
लाखा बंजारा झील
    - डॉ (सुश्री) शरद सिंह

सूखी झील के 
रेगिस्तान में
देखा है
इन दिनों मैंने
शहर के गर्व नमी को
मछली-सा तड़पते हुए

झील
जो बनवाई 
एक बंजारे ने,
झील
जिसे रखने को जीवित
आत्मबलिदान किया
एक जोड़े ने
झील
जो हर बजट में
लिटाई जाती रही
कथित उद्धार के
ताबूत में

हर साल
चलते रहे फावड़े
उठती रहीं कुदालियां
श्रमदान की तस्वीरों से
सजते रहे अख़बार
गोया झील एक मंच थी
राजनीतिक नाट्यदल की,
बड़बोले समाजसेवियों की,
प्रशासन के झोलाछाप
उच्चाधिकारियों की।

जबकि
रिसता रहा
झील का लहू
गिरता रहा
ऑक्सीजन स्तर
मरते रहे जलजन्तु,
हम ख़ामोशी से 
पढ़ते रहे खबरें 
पल पल मरती झील की

झील
आज है
उद्धार के
ऑपरेशन टेबल पर
दरवाज़े पर जलती
लालबत्ती
कब होगी हरी?
पता नहीं !
ऑपरेशन 
कब होगा पूरा
पता नहीं !

हां,
मेरे शहर की झील
टंगी है इनदिनों
प्रशासनिक सूली पर
बाट जोहती
एक बार फिर
तरंगायित होने की
जल से, जीवन से।
    ------------

20 May, 2022

ग़ज़ल | यादों को उसकी | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

यादों को उसकी भुलाना कठिन है
हथेली पे  सरसों  उगाना कठिन है
मुद्दत  से   देखा  नहीं  है  भले ही
ज़ेहन से उसको मिटाना कठिन है।
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

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18 May, 2022

कविता | वस्त्र के भीतर | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नेशनल एक्सप्रेस

मित्रो, नई दिल्ली से प्रकाशित "नेशनल एक्सप्रेस" के साहित्यिक परिशिष्ट "साहित्य एक्सप्रेस" में मेरी आज एक कविता प्रकाशित हुई है जिसका शीर्षक है "वस्त्र के भीतर"। आप भी पढ़िए।
हार्दिक धन्यवाद गिरीश पंकज  ji🙏
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कविता
वस्त्र के भीतर 
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

मन का जुलाहा
बुन रहा 
विचारों और
भावनाओं का ताना-बाना

डाल रहा सुनहरे बूटे
कल्पनाओं के
बुनने 
दिल की चादर

खट्खट् चलती
धड़कनें
सांसों की सुतली से बंधीं
फ्रेम-दर-फ्रेम

त्रासदियों के शटल 
गसते बुनावट को
फिर भी बचे रहते 
संभावनाओं के छिद्र
ताकि
आ सके प्राणवायु
देह के रेशे-रेशे में
दुनियावी
वस्त्र बदलने तक

आवरण है वस्त्र तो
जिसे पड़ता है बुनना
वरना 
हर देह रहती है नग्न
अपने वस्त्र के भीतर
वस्त्र चाहे रेशम का हो 
या सूत का,
वस्त्र मिलता है 
दुनिया में आकर 
और छूट जाता है यहीं

वस्त्र ढंकते हैं देह को
देह आत्मा को
और एक अनावृत आत्मा 
हमारा अंतर्मन ही तो है
वस्त्रों की अनेक परतों के भीतर
यदि उसे 
देख सकें हम।
     ----------

13 May, 2022

ग़ज़ल | मंज़र सारे | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

मंज़र सारे  फ़ीके,  धुंधले  नज़र आ रहे
अश्क़ों के  पर्दे  आंखों को  ढंके  जा रहे
इश्क़ का  शीशा टूटा, किरचें  बिखर गईं
जख़्मी पैरों से आखिर हम किधर जा रहे
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह


#Ghazal #शेर #Shayri #Poetry 
 #Literature #डॉसुश्रीशरदसिंह #ग़ज़ल #SharadSingh #ShayariLovers 
#World_Of_Emotions_By_Sharad_Singh

12 May, 2022

कविता | मेरी भावनाएं | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

कविता
मेरी भावनाएं
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

भावनाएं
कभी सुप्त विसूवियस 
तो कभी
अलकनंदा की
कल-कल लहरें

भावनाएं
कभी थिर ध्रुव तारा
तो कभी
उल्काओं की बारिश

भावनाएं
कभी सीधी लकीरें
तो कभी
पिकासो की पेंटिंग्स

भावनाएं
कभी स्टेयरिंग व्हील
तो कभी
घूमते पहियों की रिम

भावनाएं
कभी हथेली की मेंहदी
तो कभी
मुट्ठी से फिसलती रेत

भावनाएं
कभी गोपन अंतःध्वनि
तो कभी
कलरव, कल्लोल

भावनाएं
कभी जादुई छुअन
तो कभी
कटीले तारों की बाड़

भावनाएं 
कभी कविता के शब्द 
तो कभी 
उपन्यास के कथानक

भावनाएं 
चलती हैं अपनी मनमर्जी से 
किसी हुक्मरान के 
हुक्म से नहीं

ये मेरी भावनाएं हैं 
जो बनकर लाल रक्त कणिकाएं
मुझे देती है स्पंदन 
मैं उन्हें नहीं,

वे यांत्रिक नहीं 
वे हैं खांटी प्राकृतिक 
क्योंकि
भावनाएं
बिजली का स्विच नहीं
कि कभी भी
किया जा सके
ऑन या ऑफ 
एक उंगली के इशारे से।
------------------

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09 May, 2022

कविता | बहुत छोटा है प्रेम शब्द | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

साहित्यिक सरोकारों वाली वेब मैगजीन "युवा प्रवर्तक" में आज मेरी कविता प्रकाशित हुई है इसका शीर्षक है -"बहुत छोटा है प्रेम शब्द"।
इस लिंक्स पढ़िए -
https://yuvapravartak.com/63091/
तथा युवा प्रवर्तक के फेसबुक पर भी -
https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=553367486425237&id=108584627570194

कविता
बहुत छोटा है प्रेम शब्द
 - डॉ (सुश्री) शरद सिंह

काश!
वह सड़क लम्बी हो जाए
टूर से
घर लौटने वाली,
तुम्हारी यात्रा
बढ़ जाए
एक घंटे और 
दो घंटे और 
तीन घंटे और 
चार घंटे और 
और ..और ..और..
चाहता है स्वार्थी मन 
बस इतना ही
कि तुम अनवरत चलते रहो 
और 
बातें करते रहो मुझसे
मन की 
दुनिया की 
ब्रह्मांड की
समता की
विषमता की
वर्तमान की
अतीत की
आशा की
निराशा की
बातें ही तो हैं 
जो जोड़े रखती हैं 
परस्पर हम दोनों को 
एक-दूसरे से 
वरना इस दुनियावी चक्र में 
मैं पृथ्वी हूं 
तो तुम सुदूर प्लूटो 
कोई नहीं साम्य नहीं 
कोई नहीं मेल 
कोई नहीं अपेक्षा  
कोई नहीं संभावना 
कोई नहीं वादा
कोई नहीं इरादा
बस दो ग्रहों की भांति 
एक आकाशगंगा में 
विचरते हुए हम 
बातें ही तो करते हैं 
अपने एंड्राइड फ़ोन में
परअंतरक्षीय तरंगें उतारकर
मिटा लेते हैं
हज़ारों प्रकाशवर्ष की दूरी
जो कोई ग़ुनाह नहीं 
इसीलिए 
चाहती हूं तुम्हारी यात्रा 
हर दफ़ा सड़क की लंबाई को 
ज़रा और बढ़ाती जाए 
और हम अपनी धुरी में घूमते हुए 
एक-दूसरे के अस्तित्व को महसूस कर 
होते रहें ऊर्जावान
अपने अलौकिक अहसास के साथ
बहुत छोटा है प्रेम शब्द 
जिसके आगे।
       ------------
#SharadSingh #poetry  #mypoetry #डॉसुश्रीशरदसिंहकीकविताएं #World_Of_Emotions_By_Sharad_Singh #डॉसुश्रीशरदसिंह 
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29 April, 2022

कविता | @कंडीशन | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

कविता
@कंडीशन
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

बहुत है कोलाहल
जीवन में,
शब्दों और ध्वनियों का
सघन समुच्चय
फिर भी मन के 
निर्वात परिसर में
पसरी हुई निःशब्दता
करती है प्रतीक्षा
एक वॉयस-कॉल की
क्योंकि 
पागल मन
सोच लेता है
कि पूरा होगा
एक आश्वासन
जो 
दिया गया
दफ़्तरी अंदाज़ मेंं
कि - समय मिलते ही 
देख ली जाएगी फाईल 
निपटा दिया जाएगा केस 
सुलझा दी जाएगी समस्या 
...पर समय मिलते ही !
@कंडीशन...
कर ली जाएगी बात
लगा लिया जाएगा फ़ोन
समय मिलते ही...

वादा नहीं
सो, दोष नहीं
कोई गुंजाइश नहीं
उलाहने की

दोषी है कोई यदि
तो
वह
बावरा मन
जो मान बैठा
सदाशयता को
उम्मीद,
जबकि
उम्मीदें तो होती ही हैं
टूटने के लिए।
--------

#SharadSingh #Poetry #MyPoetry #World_Of_Emotions_By_Sharad_Singh #डॉसुश्रीशरदसिंह
#उम्मीद #दोषी #आश्वासन #कोलाहल #ध्वनि #कंडीशन #टूटने

28 April, 2022

कविता | वह चूहानुमा | डॉ (सुश्री) शरद सिंह


कविता
चूहानुमा
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

एक विशेषता है
मनुष्य योनि में हो कर भी
चूहा होना,
वह भी
जहाज का चूहा

जो जहाज के
डूबने की
आशंका में ही
छोड़ देता है
जहाज को

मुझे नहीं लगता
कि कर सकता है ऐसा
मनुष्य
यदि उसके भीतर है
सच्ची मनुष्यता

होने को तो ...
सुकरात को
विष का प्याला
दिया था मनुष्यों ने ही
ब्रूटस भी मनुष्य ही था
जिसने सीजर के पीठ पर
भोंका था छुरा

वह मनुष्य ही था
जिसने
ज़हर पिलाया मीरा को
और परित्याग कराया सीता का

वह मनुष्य ही था
जिसने
बापू गांधी के सीने मेंं
उतार दी गोलियां
और करा दी थीं हत्याएं
जलियांवाला बाग में

अवसरवादिता
लिबास बदलती है
और ढूंढ लेती है
नित नए आका

कभी सत्ता
तो कभी जिस्म
तो कभी ताक़त
कभी ये सभी
ज़्यादातर राजनीति में

लेकिन अब
चूहानुमा
मानवीय नस्ल
राजनीति से
आ गई है
प्रेम में भी,
छोड़ जाती है साथ
संकट की घड़ी में
प्रेम रह जाता है
हो कर आहत
एक
डूबे जहाज की तरह

कृतघ्न चूहा क्या जाने
रच देते हैं प्रेम का इतिहास
टूटे /डूबे जहाज भी
और निभाते हैं प्रेम
अनंत गहराइयों में
अनंत काल तक।
--------

#DrMissSharadSingh  #poetry  #mypoetry #ship #shipwreck  #World_Of_Emotions_By_Sharad_Singh #love  #डॉसुश्रीशरदसिंह
#चूहा  #प्रेम #जहाज  #सीजर  #ब्रूटस  #मीरा  #सीता

23 April, 2022

कविता | अपराध | डॉ शरद सिंह | प्रजातंत्र

इन्दौर के  लोकप्रिय दैनिक प्रजातंत्र में आज मेरी एक कविता संपादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित हुई है.... जिसका शीर्षक है "अपराध" ... आप भी पढ़िए...
#हार्दिकधन्यवाद  #प्रजातंत्र  🌷🙏🌷

#डॉसुश्रीशरदसिंहकीकविताएं 
#कविता #मेरीकविताएं #अपराध
#PoetriesOfDrMissSharadSingh #Poetry  #mypoetries 

10 April, 2022

ग़ज़ल | हमको जीने की आदत है | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नवभारत


"नवभारत" के रविवारीय परिशिष्ट में आज 10.04.2022 को "हमको  जीने की आदत है" शीर्षक ग़ज़ल प्रकाशित हुई है। आप भी पढ़िए...
हार्दिक धन्यवाद #नवभारत 🙏
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ग़ज़ल | हमको  जीने की आदत है | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नवभारत

अपने सुघड़ उजालों को  तुम, रक्खो अपने पास।
हमको  जीने की आदत है, काले दिन, उच्छ्वास।

चतुर शिकारी  जाल  डाल कर बैठा  सारी  रात
सपनों को भी  लूट रहा है,  बिना दिए  आभास।

बढे़ दाम की  तपी  सलाखें,  दाग रही  हैं  देह
तिल-तिल मरता मध्मवर्गी,  किधर  लगाए  आस।

बोरी  भर के  प्रश्न उठाए,  कुली  सरीखे  आज
संसद के  दरवाज़े  लाखों  चेहरे  खड़े  उदास।

जलता  चूल्हा  अधहन  मांगे, उदर पुकारे  कौर
तंग  ज़िन्दगी कहती अकसर-‘तेरा काम खलास!’

अनावृष्टि-सी कृपा तुम्हारी, और  खेतिहर  हम
धीरे-धीरे  दरक  चला है,  धरती-सा विश्वास।

सागर बांध  लिया पल्लू में,  और पोंछ ली आंख
मुस्कानें फिर ओढ़-बिछा लीं, बना लिया दिन ख़ास।

तड़क-भड़क की इस दुनिया में, करें दिखावा लोग
फिर भी अच्छा लगता हमको, अपना फटा लिबास।

यही धैर्य का गोपन है जो,  रहे ‘शरद’ के साथ
आधा खाली मत देखो,  जब आधा भरा गिलास।
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#ग़ज़ल #शायरी #डॉसुश्रीशरदसिंह  #Ghazal #Shayri #DrMissSharadSingh
#नवभारत


09 April, 2022

मुक्तक | धूप को धूप जो नहीं लगती | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

मुक्तक
पी के पानी भी,प्यास है जगती।
छांह भी आजकल मिले तपती।
क्यों दया  आएगी भला उसको
धूप  को  धूप  जो  नहीं  लगती।
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

31 March, 2022

नींद का फूल | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | कविता


#नींद  का #फूल  - #डॉसुश्रीशरदसिंह
#कविता  #कविताएं  #सपना  #अधूरा  #रतजगा #मुरझाना
#poetry  #poetrylovers

27 March, 2022

मेरी तन्हाई | ग़ज़ल | डॉ शरद सिंह | नवभारत

"नवभारत" के रविवारीय परिशिष्ट में आज 27.03.2022 को "मेरी तन्हाई" शीर्षक ग़ज़ल प्रकाशित हुई है। आप भी पढ़िए...
हार्दिक धन्यवाद #नवभारत 🙏
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ग़ज़ल
मेरी तन्हाई
- डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह

मेरी तन्हाई भी मुझसे मिलने से घबराती है।
यादों के सैलाब में अक्सर धड़कन डूबी जाती है।

कहने को दुनिया पूरी है लेकिन कोई नहीं सगा
बेगानों के बीच खुशी भी आने से कतराती है।

तेल ज़रा सा है दीपक में, फिर भी देखो तो हिम्मत
नीम अंधेरे में एक नन्हीं बाती जलती जाती है।

ऊपर वाले को हम कोसें या फिर कोसें क़िस्मत को
एक नदी जब चट्टानों से रह-रहकर टकराती है।

दिल पर पत्थर रखना मैंने, सीख लिया है दुनिया से
होठों की तो छोड़ो अब तो आंखें भी मुस्काती हैं।

रंग बहुत है इंद्रधनुष में, पर बेरंग हालात हुए
कोई भी तस्वीर आंख को अब तो नहीं लुभाती है।

किसके ख़ातिर जीना है अब, किसके ख़ातिर मरना है
एक यही तो बात समझ में, मुझे नहीं अब आती है।

'शरद' सुहाना मौसम बीता, जीवन में पतझार हुआ
अब तो वर्षा आंसू बनकर, आंखों में आ पाती है ।
        
          -------------------
#शरदसिंह #डॉशरदसिंह #डॉसुश्रीशरदसिंह
#SharadSingh #shayari #ghazal #GhazalLovers
#World_Of_Emotions_By_Sharad_Singh #hindipoetry  #शायरी   #तनहाई

21 March, 2022

विश्व कविता दिवस | कविता | डॉ (सुश्री) शरद सिंह


#विश्व_कविता_दिवस  की हार्दिक शुभकामनाएं 🌷
...........................
कविता
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

भावनाओं की तरंगों पर
सवार
शब्द-यात्री
है वह,
जिसके चरण पखारते हैं
विचार
और चित्त में बिठाते हैं
रस, छंद, लय, प्रवाह

जिसका अस्तित्व है
मां की लोरी से
मृत्युगान तक
जो है भरती
श्रम में उत्साह
जो दुखों को
कर देती है प्रवाहित
दोने में रखे
दीप के समान

वह है तो वेद हैं
वह है तो महाकाव्य हैं
उसके होने से
मुखर रहते हैं भारतीय चलचित्र,
वह रंगभेद के द्वंद्व में
गायन बन कर
श्रेष्ठता दिलाती है
अश्वेतों को,
वह वैश्विक है
क्योंकि
मानवता है वैश्विक
और वह है उद्घोष
मानवता की।

वह नाद है, निनाद है
प्रेम है, उच्छ्वास है
वह कविता ही तो है
जो प्रेमपत्रों से
युद्ध के मैदानों तक
चलती रही साथ।
जब लगता है खुरदरा गद्य
तब रखती है
शीतल संवेदनाओं का फ़ाहा
कविता ही,
कविता समग्र है
और समग्र कविता है।
         -------------
#डॉसुश्रीशरदसिंहशरदकीकविताएं
#कविता #विश्वकवितादिवस #मेरीकविताएं
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20 March, 2022

अंत नहीं शुरुआत नहीं | ग़ज़ल | डॉ शरद सिंह | नवभारत


 "नवभारत" के रविवारीय परिशिष्ट में आज 20.03.2022 को "अंत नहीं शुरुआत नहीं" शीर्षक ग़ज़ल प्रकाशित हुई है। आप भी पढ़िए...
हार्दिक धन्यवाद #नवभारत 🙏
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ग़ज़ल
अंत नहीं शुरुआत नहीं
- डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह

कैसे लिख दें  राम-कहानी, लिखने वाली बात नहीं।
नभ-गंगा  हैं  भीगी  आंखें, पानी भरी परात  नहीं।

समय-डाकिया लाया अकसर, बंद लिफाफा क़िस्मत का
जिसमें से बाधाएं निकलीं, निकली पर  सौगात नहीं।

तलवों में  है  दग्ध-दुपहरी, माथे पर  झुलसी शामें,
जी लें जिसमें  पूरा जीवन,  नेहमयी  वह रात नहीं।

तेज हवा ने  तोड़ गिरा दी, लदी आम की डाल यहां
अपना आपा याद रख सके, इतनी भी अभिजात नहीं।

उमस रौंदती है  कमरे को, तनहाई  जिसमें  ठहरी
ऊंघ रही दीवारें  अब तक,  सपनों की बारात नहीं।

नुक्कड़ के कच्चे ढाबे में, उपजे प्यालों की खनखन
मुक्ति दिला दे जो विपदा से, ऐसा भी संधात नहीं।

अपना भावी, निरपराध ही,  दण्ड झेलता दिखता है
लिखने को अक्षर ढेरों हैं, क़लम नहीं, दावात नहीं।

शबर-गीत हैं शर-धनुषों में, कपट नहीं, छल-छद्म नहीं
भोले-भाले भील-हृदय में, चुटकी भर प्रतिघात नहीं।

टूटे  तारे  के  संग  ढेरों  सम्वेदन  जुड़  जाते हैं
बिना राह से फिसले लेकिन,  होता उल्कापात  नहीं।

शिविर समूहों में खोजा है,  खोजा है  अख़बारों में
मिले हज़ारों लेखन-जीवी,  मिला नहीं हमज़ात कोई।

खण्ड काव्य है, महाकाव्य है और न कोई गीत-ग़ज़ल
चूड़ी  जैसी  पीर  हमारी,  अंत नहीं, शुरुआत  नहीं।

गिर पड़ते हैं अर्ध्य सरीखे,  अंजुरी  जैसी  आंखों  से
‘शरद’ आंसुओं को पीने में,  इतनी भी  निष्णात नहीं।

(निष्णात = माहिर)

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06 March, 2022

ग़ज़ल | हम बस्ते में बंधे रह गए | डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह

 "नवभारत" के रविवारीय परिशिष्ट में आज 06.03.2022 को "हम बस्ते में बंधे रह गए" शीर्षक ग़ज़ल प्रकाशित हुई है। आप भी पढ़िए...
हार्दिक धन्यवाद #नवभारत 🙏
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ग़ज़ल
हम बस्ते में बंधे रह गए
- डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह

वक़्त गया तो जाते-जाते, दिल पर छाला छोड़ गया।
ट्रक से टपके  तैल सरीखा,  धब्बा-काला छोड़ गया।

पगुराती गायों की गलियों से हो कर जो पल गुज़रा
अलसाए जीवन के  ऊपर, मकड़ी-जाला छोड़ गया।

गांव भागते शहर चुरा कर, चौर्यवृत्ति इस क़दर बढ़ी
अधुनातन होने का लालच, सद्गुण-माला छोड़ गया।

दो कानों  की  बात हमेशा, पड़ी मिली  चौराहे पर
जिसका भी दिल आया, उस पर, मिर्च-मसाला छोड़ गया।

प्लेटफाॅर्म के हरसिंगार ने, देखा है  उस इंजन को
बेफिक्री से बीड़ी पी जो, धुंआ - उछाला छोड़ गया।

घर से भागे असफल-प्रेमी, जैसा खोया-खोया मन
‘एक शहर की मौत’ ले गया, पर ‘मधुशाला’ छोड़ गया।

चांद रात को आया था जब, तारों की चुग़ली करने
कुर्सी के पुट्ठे पर अपना, फटा दुशाला छोड़ गया।

कलाकार निस्पृह होता है, यही सिद्ध करने, शायद
खजुराहो की रंगभूमि पर, एक शिवाला छोड़ गया।

दूर यात्रा पर जब निकला, सोच-विचारों का छौना
खोल गया  सारे दरवाज़े, चाबी-ताला  छोड़ गया।

बेहद  भूखा था  वह शायर, रोटी खाने  बैठा था
नई ग़ज़ल की आहट पा कर, हाथ निवाला छोड़ गया।

फिर लगता है, किसी अभागिन ने पीपल का वरण किया
सूरज अपने  पीछे-पीछे,  लाल उजाला छोड़ गया।

कच्ची स्लेटों पर अक्षर भी, कच्चे- कच्चे  उगते हैं
किन्तु मजूरी की खातिर वह अपनी शाला छोड़ गया।

आंधी का इक तीखा झोंका, रिश्ते  में ढल कर आया
निष्ठुरता से दीप बुझा कर,  सूना आला छोड़ गया।

अहसासों का पंछी आ कर, जब-जब कांधे पर बैठा
आंखों में आंसू का बहता, इक परनाला छोड़ गया।

हम बस्ते में बंधे रह गए ‘शरद’ फाइलों के जैसे
हमको दस्तावेज़ बना कर लिखने वाला छोड़ गया।

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05 March, 2022

नन्हा शेवचेन्को | कविता | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह


नन्हा शेवचेन्को
        - डॉ (सुश्री) शरद सिंह

यह बात नहीं है
युक्रेनी कवि
तरास शेवचेन्को उर्फ़
कोबज़ार तरास की
जो जन्मा
प्रथम विश्व युद्ध के प्रारंभ में
और चला गया
द्वितीय विश्व युद्ध के उपरांत

उसने देखा था त्रासदी
दोनों विश्व युद्धों की
और कहा बस,
अब नहीं
और नहीं
और युद्ध नहीं चाहिए

आज एक शेवचेन्को
भर्ती है अस्पताल में
हो चुका अनाथ
शायद अपनी एक टांग भी
खो दे
यह नन्हा बालक
शेवचेन्को है,
तरास शेवचेन्को नहीं

जिसने
होश आते ही पुकारा था -
मां को
पिता को
दादी को
और पौधे को

हां, उसने लगाया था
एक पौधा
बाल्कनी के गमले में
और सोचा था
बड़ा हो जाएगा पौधा
रातोंरात

एक मिसाइल-रॉकेट से
खण्हर हो गया उसका घर
ध्वस्त हो गई बाल्कनी
गमले और पौधे का
पता ही नहीं
नन्हा शेवचेन्को
समझ जाए शायद
इस युद्ध के बाद
रातोंरात पेड़ बड़े नहीं होते
छिड़ जाते हैं युद्ध रातोंरात
और
सब कुछ तबाह हो जाता है
रातों-रात

नन्हा शेवचेन्को
अगर बचा रहा
तो समझ जाएगा सब कुछ।
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01 March, 2022

शिवत्व | कविता | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह

शिवत्व
     - डॉ शरद सिंह
तुमने 
जो गरल दिया मुझे
वह 
ठहरा हुआ है
मेरे गले में
तुम शिव थे
पर मैं नहीं
कभी नहीं चाहा मैंने
शिवत्व पाना
मैं तो ख़ुश थी
अपनी
छोटी-सी दुनिया में
तुमने
पहले
उजाड़ी मेरी दुनिया
और फिर
पिला दिया
चिरशोक का विष
उस पर
रोक दिया उसे
मेरी ग्रीवा में
दे दिया 
जीवन और मृत्यु के बीच
त्रिशंकु सा जीवन
क्या यही है तुम्हारा-
देवत्व
और शिवत्व?
चकित हूं शिव
तुम्हारे इस शिवत्व पर

गढ़ी जानी चाहिए
नई परिभाषा 
शिवत्व की
अब तो।
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20 February, 2022

चांद गया था दवा चुराने | ग़ज़ल | डॉ शरद सिंह | नवभारत


मित्रो, "नवभारत" के रविवारीय परिशिष्ट में आज 20.02.2022 को "चांद गया था दवा चुराने" शीर्षक ग़ज़ल प्रकाशित हुई है। आप भी पढ़िए...
हार्दिक धन्यवाद #नवभारत 🙏
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ग़ज़ल
चांद  गया था  दवा चुराने
- डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह

गेरू ले कर दीवारों पर शुभ-शुभ शब्द उकेर।
जाने कैसा  दिन गुजरेगा, बैठा  काग मुण्डेर।

सप्तपदी चल, टूटे बंधन,  सुलगे हैं खलिहान
नदी सूख कर तड़क गई है, छोड़ प्यास का ढेर।

मैकल-पर्वत की सी पीड़ा, झील सरीखी आंख
सपनों की वंशी को ले कर, डोले समय- मछेर।

धुंआ उगलती खांस रही थी, मावस डूबी रात
चांद  गया था  दवा चुराने, खाली ज़ेबें  फेर।

लिए हथकड़ी दौड़ रही है हवा, मुचलका भूल
छत पर चढ़ कर सूरज झांके, देखे आंख तरेर।

चाहे जितना  बचना चाहो, जलना है हर हाल
छनक-छनक कर ही जलती है,घी में बची महेर।

हाॅकर-छोरा  सुबह-सवेरे  घूमे सब  के  द्वार
जैसे कलगी वाला मुर्गा,  रहे दिवस को  टेर।

बारह बरस बिता कर चाहे, फिरें घूर के भाग
पर, कुछ तो बदलाव हमेशा होता देर-सवेर।

यह दुनिया बिखरी टुकड़ों में, दूर-दूर विस्तार
किन्तु ‘शरद’ का मन, बस चाहे दो बांहों का घेर।
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12 February, 2022

ग़ज़ल | एक तुम्हारे न होने से | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

ग़ज़ल | एक तुम्हारे न होने से
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

हर वो लम्हा भारी है जो ख़ुद के साथ गुज़रता है
तन्हाई का झोला टांगे, हर इक मौसम फिरता है

किससे दिल की बात कहें और किसको राज़ बतायें
एक तुम्हारे न होने से, जीवन बहुत अखरता है।

दुनिया भी मिल जाये तो क्या, मिट्टी, पत्थर जैसी है
जिसके काटे हाथ गये वो ताजमहल क्या धरता है?

मरने की उम्मीद लगाए, जीते जाना बहुत कठिन है
जीने की इच्छा टूटे तो, जीता है न मरता है।

वर्षा विगत "शरद" ऋतु रोये, आंखें अश्क़ डुबोयें
इसे देख कर समझ सकोगे, कैसे व्यक्ति बिखरता है
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06 February, 2022

आजकल | ग़ज़ल | डॉ शरद सिंह | नवभारत

मित्रो, "नवभारत" के रविवारीय परिशिष्ट में आज 06.02.2022 को "आजकल" शीर्षक ग़ज़ल प्रकाशित हुई है। आप भी पढ़िए...
हार्दिक धन्यवाद #नवभारत 🙏
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ग़ज़ल
आजकल
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

ज़िन्दगी दिखती  उदासी आजकल।
आस्था लगती धुंआ-सी  आजकल।

हर तरफ   व्यवहार   में  कड़वाहटें
दिन नहीं मिलते बतासी आजकल।

मित्रता  के  नाम पर  धोखा-फ़रेब
बात कहने को ज़रा-सी आजकल।

इश्तिहारों  पर   चटख   से  रंग   हैं
अन्यथा सब कुछ कपासी आजकल।

बुन रही  है   स्वप्न का  इक घोंसला
आंख भी नन्हीं बया सी आजकल।

आजकल कुछ हो गया हालात को
मावसी है,   पूर्णमासी   आजकल।

कंदराएं  अब  भली  लगने लगीं
हो गया मन आदिवासी आजकल।

निर्जला व्रत कह दिया हमने, मगर
आत्मा तक है पियासी आजकल।

तुम नहीं हो तो ‘शरद’ भी खिन्न है
हर  हंसी है  सप्रयासी आजकल। 
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05 February, 2022

कविता | प्रेम और वसंत | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

कविता
प्रेम और वसंत
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

किसी को
देखते ही
जब
शब्द खो देते हैं
अपनी ध्वनियां 
और
मुस्कुराता है मौन 

ठीक वहीं से 
शुरु होता है

अंतर्मन का कोलाहल
और गूंज उठता है
प्रेम का अनहद नाद
बहने लगती हैं
अनुभूतियों की 
राग-रागिनियां
धमनियों में
रक्त की तरह

भर जाती है
धरती की अंजुरी भी
पीले फूलों के शगुन से
बस, तभी सहसा
खिलखिला उठते हैं 

प्रेम और वसंत
पूरे संवेग से
एक साथ
देह और प्रकृति में।
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31 January, 2022

रोज़ ढूंढती हूं | कविता | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

रोज़ ढूंढती हूं
       - डॉ शरद सिंह
कुछ काम 
करने हैं पूरे
कुछ उतारना है
बंधनों का ऋण
और
हो जाना है मुक्त
स्वयं से, 
जीवन से
ज़हान से

रहना 
किसके लिए?
बचना 
किसके लिए?
टूट चुका है धरातल
अपनत्व का,
शेष है-
स्वार्थ, ईर्ष्या, द्वेष
ताना, उलाहना
व्यंग्य, कटाक्ष
लोलुपता,

वे सब
जो मेरे चेहरे पर
बांचते हैं ख़ुशी
उन्हें नहीं पता
कि
अपनी हथेली में 
ढूंढती हूं रोज़
वह लकीर
जिस पर लिखा हो
चिर ठहराव
मेरी सांसों का।
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28 January, 2022

ज़िन्दा रहने के लिए | कविता | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह

ज़िन्दा रहने के लिए
     - डॉ (सुश्री) शरद सिंह

न्याय और अन्याय के बीच
जूझते, लड़ते, 
थकते, हांफते
टूटते, गिरते
सरकती है उम्र
प्रचार और बाज़ार तंत्र के
काले तवे पर 
समाचारों की
सिंकती हुई रोटियां
देखते हुए।

पीड़ितों को
न्याय दिलाने से
है ज़्यादा ज़रूरी 
एक अभिनेत्री का
"ब्रा" पर बयान,
बवाल, सवाल, उछाल
अब विवादों पर ही तो
रचता है-
नेम, फेम, गेम।

यहां हैं सभी
अच्छे खिलाड़ी 
सिवा सभ्य, सादे,
निरीह लोगों के,
सच!
ये दुनिया
नहीं है वैसी
जैसी है दिखती
झूठ बिकता है
नीलामी की
ऊंची बोलियों में
और सच का
तो कोई मोल ही नहीं

तो
अब होनी चाहिए
ऑनलाइन क्लासेस
झूठ, फ़रेब, धोखा
छल, कपट की,
यह सब सीख कर
कुछ नहीं तो
हो सकेगी दो रोटी की
कमाई
ज़िन्दा रहने के लिए,
सरकारी आकड़ों से परे
खोखले नियम और 
न्याय के बिना,
संवेदना और 
मानवता विहीन
इस छिछली दुनिया में।
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26 January, 2022

गणतंत्र हमारा | गणतंत्र दिवस | काव्य | डॉ (सुश्री) शरद सिंह


गणतंत्र हमारा
- डाॅ (सुश्री) शरद सिंह

आज़ादी   का  भान  कराता  है गणतंत्र हमारा।
दुनिया भर  में  मान  बढ़ाता  है गणतंत्र हमारा।

खुल कर बोलें, खुल कर लिक्खें, खुल कर जी लें हम
सबको ये अधिकार  दिलाता  है गणतंत्र हमारा।

संविधान    के   द्वारा   जिसका   सृजन   किया है हमने
प्रजातंत्र   की  साख  बचाता है  गणतंत्र हमारा।

धर्म, जाति  से  ऊपर   उठ   कर  चिंतन करने वाला
इक  सुंदर  संसार   बनाता  है  गणतंत्र हमारा।

पूरब,   पश्चिम,    उत्तर,    दक्षिण -  पूरी दुनिया भर को
"शरद" सभी को सदा लुभाता है गणतंत्र हमारा।
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23 January, 2022

जाड़े वाली रात | ग़ज़ल | डॉ शरद सिंह | नवभारत

 "नवभारत" के रविवारीय परिशिष्ट में आज 23.01.2022 को  ग़ज़ल प्रकाशित हुई है "जाड़े वाली रात" । आप भी पढ़िए...
हार्दिक धन्यवाद #नवभारत 🙏
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ग़ज़ल
जाड़े वाली रात
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

सर्दी की है लहर हमेशा, जाड़े वाली रात
बरपाती है क़हर  हमेशा, जाड़े वाली रात

चंदा  ढूंढे  कंबल-पल्ली,  तारे  ढूंढें  शॉल
हीटर तापे शहर हमेशा,  जाड़े वाली रात

पन्नीवाली झुग्गी कांपे, कंपता है फुटपाथ
बर्फ़ सरीखी नहर हमेशा, जाड़े वाली रात

जिसके सिर पर छत न होवे और न कोई शेड
लगती उसको ज़हर हमेशा, जाड़े वाली रात

कर्फ्यू जैसी सूनी सड़कें, कहती हैं ये हरदम
एक ठिए पर  ठहर हमेशा,जाड़े वाली रात

धुंध, कुहासा, कोहरा ओढ़े सूरज सोया रहता
धीरे    लाती   सहर    हमेशा,जाड़े वाली रात

ढेरों करवट गिनते रहते नींद अगर जो टूटे 
होते  लम्बे  पहर  हमेशा,  जाड़े वाली रात

छोटी बहरों वाली ग़ज़लों जैसे छोटे दिन
लगती लम्बी बहर हमेशा,जाड़े वाली रात
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20 January, 2022

अब कठिन हो चला है | कविता | डॉ शरद सिंह

अब कठिन हो चला है
         - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह

एक तारा 
टिमटिमाता है
दूसरा टूटता है
और तीसरा -
सबसे बड़ा हो कर भी
दिखता है फ़ीका
क्योंकि वह है बहुत दूर
अंतरिक्ष की अतल गहराइयों में
दृष्टि की क्षमता के
अंतिम छोर पर

ठीक ऐसे ही
बनता है एक विक्षोभ
हृदय के भीतर
सांसों की गति से
करवट लेते मौसमों के बीच

कड़ाके की ठंड में
जब चांद बन गया हो सूरज
बर्फ जमती-सी
महसूस होने लगी हो
एकाकीपन के ध्रुव में
यादों की लपट
पिघलाने लगती है
भावनाओं के ग्लेशियर को
बढ़ने लगता है तब
आंखों का जलस्तर

देह में गहराती शीत
मन को झुलसाती भावनाएं
आंखों में आती बाढ़
सच,
अब कठिन हो चला है
एक साथ
सारे मौसमों को जीना।
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15 January, 2022

ग़ज़ल | जाड़े वाली रात | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

Jade Waali Raat, Ghazal, Dr (Ms) Sharad Singh


ग़ज़ल

जाड़े वाली रात

- डॉ (सुश्री) शरद सिंह


सूनी-सूनी डगर हमेशा, जाड़े वाली रात

बर्फ़ जमाती नहर हमेशा, जाड़े वाली रात


चंदा ढूंढे कंबल-पल्ली, तारे ढूंढे शॉल

हीटर तापे शहर हमेशा,जाड़े वाली रात


पन्नीवाली झुग्गी कांपे, कांप रहा फुटपाथ

बरपाती है क़हर हमेशा जाड़े वाली रात


जिसके सिर पर छत न होवे और न कोई शेड

लगती उसको ज़हर हमेशा, जाड़े वाली रात


छोटी बहरों वाली ग़ज़लों जैसे छोटे दिन

लगती लम्बी बहर हमेशा,जाड़े वाली रात

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05 January, 2022

टोहता है गिद्ध | कविता | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | 6 जनवरी अर्थात् युद्ध अनाथों का विश्व दिवस पर | World Day Of War Orphans

06 जनवरी अर्थात् युद्ध अनाथों का विश्व दिवस पर...
कविता
टोहता है गिद्ध
         - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह

लिप्सा से जन्मा युद्ध
नहीं दे सकता
रोटी, पानी और घर। 

एक उजाड़ संसार का देवता है युद्ध
ध्वस्त गांवों, कस्बों, शहरों
में अट्टहास करता
रक्त के फव्वारों में नहाता
मांओं की लोरियों को रौंदता
बच्चों की किलकारियों को डंसता
अल्हड़ लड़कियों की उन्मुक्त खिलखिलाहट को
चीत्कारों में बदलता
लोककथाओं के राक्षसों से भी
अधिक भयानक

युद्ध 
एक गिद्ध है
जो टोहता है विभिषिका को
लाशों को
और बच रहे उन अनाथों को
जो कहलाते हैं शरणार्थी।

इसी धरती के वासी
इसी धरती पर बेघर

युद्ध नहीं चाहती मां
युद्ध नहीं चाहता पिता
युद्ध नहीं चाहते नाना-नानी
युद्ध नहीं चाहते दादा-दादी
युद्ध नहीं चाहते बच्चे

फिर कौन चाहता है युद्ध?
वे जिन्हें नहीं होना पड़ता अनाथ
न बनना पड़ता है शरणार्थी
और न  नहाना पड़ता है रक्त से

एक अदद निवाले, 
एक सांस या 
एक स्वप्न के लिए।

युद्ध एक आकांक्षा है 
कपट राजनीतिज्ञों के लिए
युद्ध एक उन्माद है
शक्तिसम्पन्नता के लिए

जबकि
युद्ध एक स्याह अध्याय है
इंसानियत के लिए
युद्ध दुःस्वप्न है
अनाथ शरणार्थियों के लिए।
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02 January, 2022

नए साल में | ग़ज़ल | डॉ (सुश्री) शरद सिंह


"नवभारत" के रविवारीय परिशिष्ट में आज "नए साल में" शीर्षक ग़ज़ल प्रकाशित हुई है। आप भी पढ़िए...
नवभारत के लिए....

नए  साल  में
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

नए    साल   में    हर   नई   बात हो।
ख़ुशियों  की   हरदम ही  बरसात हो।

हो  इंसानियत    की    तरफ़दारियां
सभी  के  दिलों  में   ये  जज़्बात हो।

मुश्क़िल  जो   आई    गए  साल में
नए साल में   उसकी   भी  मात हो।

सभी  स्वस्थ  रह  कर जिएं ज़िन्दगी
दुखों का  न  कोई  भी अब घात हो।

‘शरद’ की  दुआ  है  अमन, चैन की
चमकता  हुआ दिन  भी हो, रात हो।
               ------------------

हार्दिक धन्यवाद #नवभारत 🙏
02.01.2022
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01 January, 2022

नववर्ष 2022 की शुभकामनाएं | डॉ (सुश्री) शरद सिंह


मित्रो, नया वर्ष आपके जीवन में सुख, शांति और समृद्धि लाए 🌷 - डॉ (सुश्री) शरद सिंह

Wishing you and all of your loved ones health and happiness in the new year. - Dr (Ms) Sharad Singh

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