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03 October, 2021

सपन कपासी | नवगीत | डॉ शरद सिंह


नेह पियासी

   - डाॅ (सुश्री) शरद सिंह


मीलों लम्बी

घिरी उदासी

        देह ज़रा-सी।


कुर्सी, मेजें,

घर, दीवारें

सब कुछ तो मृतप्राय लगें


बोझ उठाते

अपनेपन का

पोर-पोर की तनी रगें


बंज़र धरती

नेह पियासी

       धार ज़रा-सी।


गलियां देखें

सड़के घूमें

फिर भी चैन न मिल पाए


राह उगा कर 

झूठे   सपने

नई यात्रा करवाए


रोती आंखें

सपन कपासी

     रात ज़रा-सी।

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17 November, 2020

पत्र ग़ैरों के | नवगीत | डॉ शरद सिंह

नवगीत
पत्र ग़ैरों के
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       - डॉ शरद सिंह

धूल पर 
   टिकते नहीं हैं 
       चिन्ह पैरों के ।

उंगलियों के बीच 
सूरज को दबाए 
रोशनी से 
कसमसाती नींद 
सिलवट छोड़ जाए 
   रास्ते बुनते रहे 
          संदर्भ सैरों के।

मौसमी मुस्कान 
होठों पर सहेजे 
आंसुओं से 
तरबतर रुमाल 
किसके पास भेजें 
डाकिया 
     लाया हमेशा 
           पत्र ग़ैरों के।
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