हरेक रिश्ते का हो नाम ज़रूरी तो नहीं।
हो मुहब्बत ही फ़क़त काम,ज़रूरी तो नहीं।
अश्क़ लबरेज़ पियाला है मेरे हाथों में
हो शराबों से भरा जाम,ज़रूरी तो नहीं।
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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