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11 July, 2022

ग़ज़ल | अश्क़ अपने | डॉ (सुश्री) शरदसिंह

ग़ज़ल
अश्क़ अपने
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

क्या बताएं, किस तरह, कैसे जिए हैं?
टिमटिमाती  लौ  लिए  बुझते दिए हैं।

अब न रोएंगे, किया वादा है  ख़ुद से
अश्क़ अपने बेदख़ल सब कर दिए हैं।

वक़्त ने जो रंग बदला,  लोग बदले
साथ थे जो , आज  वो  दूजे ठिए हैं।

हम शिक़ायत क्या करें हालात से
लिख दिए हिस्से  हमारे  मर्सिए हैं।

अब फ़क़ीरी है 'शरद' की ज़िंदगी में
हो भला उसका, दग़ा जिसने किए हैं।
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