ग़ज़ल
अश्क़ अपने
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
क्या बताएं, किस तरह, कैसे जिए हैं?
टिमटिमाती लौ लिए बुझते दिए हैं।
अब न रोएंगे, किया वादा है ख़ुद से
अश्क़ अपने बेदख़ल सब कर दिए हैं।
वक़्त ने जो रंग बदला, लोग बदले
साथ थे जो , आज वो दूजे ठिए हैं।
हम शिक़ायत क्या करें हालात से
लिख दिए हिस्से हमारे मर्सिए हैं।
अब फ़क़ीरी है 'शरद' की ज़िंदगी में
हो भला उसका, दग़ा जिसने किए हैं।
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