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11 July, 2022

ग़ज़ल | अश्क़ अपने | डॉ (सुश्री) शरदसिंह

ग़ज़ल
अश्क़ अपने
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

क्या बताएं, किस तरह, कैसे जिए हैं?
टिमटिमाती  लौ  लिए  बुझते दिए हैं।

अब न रोएंगे, किया वादा है  ख़ुद से
अश्क़ अपने बेदख़ल सब कर दिए हैं।

वक़्त ने जो रंग बदला,  लोग बदले
साथ थे जो , आज  वो  दूजे ठिए हैं।

हम शिक़ायत क्या करें हालात से
लिख दिए हिस्से  हमारे  मर्सिए हैं।

अब फ़क़ीरी है 'शरद' की ज़िंदगी में
हो भला उसका, दग़ा जिसने किए हैं।
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09 July, 2021

अहसास | कविता | डॉ शरद सिंह

अहसास
     - डॉ शरद सिंह

रात 
किसी ठंडे 
अहसास की तरह
दौड़ती है रगों में
थके-थके क़दमों से
हांफती हुई

दिन भर के ख़ुलासे
चेहरों में ढल कर 
आने लगते हैं सामने
किसी चलचित्र की तरह

शब्दों के गुबार
छाने लगते हैं 
एक धुंध की तरह
बोलने वालों के इरादे
छिप जाते हैं
उस धुंध के पीछे

फिर भी
सब कुछ है साफ़ 
प्रस्ताव, प्रहसन, 
झूठी प्रशंसा
संदिग्ध इरादे
इसमें 
कोई जगह नहीं
दर्द या आंसुओं की
नहीं करना साझा
यह किसी को

ज़िंदगी
रात की मानिन्द 
सरक ही जाएगी
पर
सुबह कब होगी
पता नहीं।
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11 November, 2020

दिए बनकर जलेंगे | दीपावली गीत | डॉ (सुश्री) शरदसिंह

गीत
दिए बनकर जलेंगे
                   - डॉ (सुश्री) शरदसिंह

घोर तम में भी न हम गुम हो सकेंगे ।
हम दिवाली के दिए  बनकर जलेंगे ।

हो भले ही छल का जल खारा बहुत 
या,  हो  गहरी  स्वार्थ की धारा बहुत 
आस्था   के   सीप  का  मोती  बनेंगे 
हम दिवाली के  दिए  बनकर जलेंगे ।

दर्द का  इतिहास  ही  काफी नहीं है 
प्यार का  आभास  ही काफी नहीं है 
सत्य की, विश्वास की कविता लिखेंगे 
हम दिवाली  के दिए  बनकर जलेंगे ।

ये  अमावस  भी   ढलेगी,  भोर  होगी 
सूर्य की किरणों की जगमग डोर होगी 
चेतना  में   ज्योति  का  चंदन   मलेंगे 
हम दिवाली का दिया बनकर जलेंगे ।

श्रम न ठिठकेगा, न  हारेगा  कहीं भी 
मन प्रलोभन से न बहकेगा  कहीं भी 
संकल्प के पथ से  न अपने पग हटेंगे 
हम  दिवाली  के दिए  बनकर जलेंगे ।
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