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23 May, 2020

दिन कैसा ये दिखलाया - डॉ शरद सिंह, प्रवासी मजदूरों की व्यथा कथा कहती ग़ज़ल


प्रवासी मजदूरों की व्यथा कथा कहती ग़ज़ल...

दिन कैसा ये दिखलाया
- डॉ शरद सिंह

छूट गई है रोज़ी-रोटी, छूट गई छत की छाया।
महानगर के पत्थर दिल ने, दिन कैसा ये दिखलाया।

कर लेते थे घनी-मज़ूरी, सो रहते थे खोली में
हमने वो सब किया, जो क़िस्मत ने हमसे था करवाया।

गांव भेजते थे कमाई का, आधा पैसा हम हरदम
कई दफ़ा तो भूखे रहकर, हमने भारी वज़न उठाया।

घरवाली जब साथ आ गई, मुनिया छोटू भी जन्में
हमने भी मुफ़लिस में जीता, छोटा-सा संसार बसाया।

जिन शहरों को शहर बनाया, जिनको था हमने अपनाया
उन्हीं शहरवालों ने हमको, पल भर में ही किया पराया।

आज गांव की ओर हैं वापस, भारी मन का बोझ उठाए
यही ग़नीमत राह-राह में, लोगों ने अपनत्व दिखाया।
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28 September, 2019

वरना वो भी सुधर गया होता ( ग़ज़ल )... डॉ शरद सिंह

 
Varna Vo Bhi Sudhar Gaya Hota ... Ghazal of Dr (Miss) Sharad Singh
  
ग़ज़ल
 
 - डॉ शरद सिंह
 
अश्क़ आंखों से  बह गया होता
दिल का दरिया उतर गया होता

ग़म को  रक्खा है  बंद  मुट्ठी में
वरना सब पे  बिखर गया होता

गर   कोई  इंतज़ार  करता तो
शाम  होते  ही  घर  गया होता

उसकी मां ने  उसे नहीं डांटा
वरना वो भी  सुधर गया होता

वो 'शरद' को अगर समझ लेता
दुश्मनी को बिसर गया होता
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हलफ़ उसने उठा रक्खा ( ग़ज़ल )... डॉ शरद सिंह

Halaf Usane Utha Rakha ... Ghazal of Dr (Miss) Sharad Singh

 ग़ज़ल 

 - डॉ शरद सिंह

जला भी दो बही-खाता, भलाई का,  बुराई का
हलफ़ उसने उठा रक्खा है हमसे बेवफ़ाई का
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#SharadSingh #Shayari #Ghazal
#World_Of_Emotions_By_Sharad_Singh #बेवफ़ाई #भलाई #बुराई #हलफ़


27 July, 2019

हाल लिखा पूरी तफ़सील से .. ( ग़ज़ल ).. - डॉ शरद सिंह

Haal likha Poori Tafsil se ... Ghazal By Dr (Miss) Sharad Singh


हाल   लिखा  ....
मेज   के    धरातल   पर  कील से
हाल   लिखा   पूरी    तफ़सील से
तुम शहरी, दोष भला तुमको क्या
हम   ही   हैं   छोटी   तहसील से
बच्चों   से   जिद्दी  हालात, 'शरद'

बहलेंगे   कौन - सी  दलील  से ?
- डॉ शरद सिंह

( मेरे ग़ज़ल संग्रह 'पतझर में भीग रही लड़की' से)

26 July, 2019

उसको जा के कह दे कोई .. ( ग़ज़ल ).. - डॉ शरद सिंह

Usko Ja Ke Kah De Koi ... Ghazal of Dr (Miss) Sharad Singh

उसको जा के कह दे कोई
हमें बेवज़ह नहीं सताए
राज़ कई खुल जाएंगे फिर
हम भी जो कहने पे आए
 - डॉ शरद सिंह

02 July, 2019

कांटों से फूल चुनता है .. ( ग़ज़ल ).. - डॉ शरद सिंह

Kanto Se Phool Chunta Hai ... Ghazal of Dr (Miss) Sharad Singh

 कांटों से फूल चुनता है
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वो जो कांटों से फूल चुनता है
दिल मेरा ख़्वाब उसका बुनता है
वो न बोले तो  कोई बात नहीं
लम्हा-लम्हा उसी को सुनता है
- डॉ शरद सिंह

22 June, 2019

सेल्फी .. ( ग़ज़ल ).. - डॉ शरद सिंह

Selfie ... Ghazal of Dr (Miss) Sharad Singh

 सेल्फी
खुद से सबको जोड़े रखती कला सेल्फी की
निपट अनाड़ी पे भी सजती कला सेल्फी की
दर्पण के आगे हों, या फिर घाट, पहाड़ों पर
मन में खुद से ही है जगती कला सेल्फी की

- डॉ शरद सिंह

19 June, 2019

तौबा-तौबा .. ( ग़ज़ल ).. - डॉ शरद सिंह

Tauba Tauba ... Ghazal of Dr (Miss) Sharad Singh


तौबा-तौबा 
गुनाहे - इश्क़ से तौबा-तौबा
तुम्हारे रश्क़ से तौबा-तौबा
तुम्हारी याद में रो कर देखा
किया फिर अश्क़ से तौबा-तौबा
- डॉ शरद सिंह




15 June, 2019

जवाब भी पूछो .. ( ग़ज़ल ).. - डॉ शरद सिंह

Jawab Bhi Puchho ... Ghazal of Dr (Miss) Sharad Singh

जवाब भी पूछो
क्यूं  न  आए थे  ख़्वाब  भी पूछो
करवटों   का   हिसाब  भी पूछो
इश्क़ मुश्क़िल सवाल है लेकिन
इक  दफ़ा  तो  जवाब  भी पूछो
- डॉ शरद सिंह


 #DrMissSharadSingh

03 June, 2019

मुहब्बत से भीगी .. ( ग़ज़ल ).. - डॉ शरद सिंह

Muhabbat Se Bhigi ... Ghazal of Dr (Miss) Sharad Singh

मुहब्बत से भीगी 

 हमारी दुआयें असर ला रही हैं
किसी राह भूले को घर ला रही हैं


हवायें मेहरबान होने लगी हैं
मुहब्बत से भीगी ख़बर ला रही हैं


हैं दिल में जो अंगड़ाइयां चाहतों की
नई शायरी की बहर ला रही हैं


वो मजबूरियां हल नहीं हो रही हैं
जो गांवों से सबको शहर ला रही हैं


'शरद' को है उम्मीद उन औरतों से
जो बदलाव की इक लहर ला रही हैं
- डॉ शरद सिंह


#DrMissSharadSingh

05 May, 2019

मगर इतना पता था ..( ग़ज़ल ) ... - डॉ शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh

मुझे मालूम था, तुझको  नहीं   मुझ  पर  यक़ीं होगा
मगर इतना पता था, मुझको खुद पर तो यक़ीं होगा
- डॉ शरद सिंह

01 May, 2019

उससे यही ग़लती हुई ( ग़ज़ल ) ... - डॉ शरद सिंह

Usase Yahi Galati Hui ... Ghazal of Dr (Miss) Sharad Singh

उसके घर में आज भी ढिबिया दिखी जलती हुई
हर   तरक्क़ी   थी   गुज़रती  दूर  से   चलती हुई

इस ज़माने की समझ उसको तो जल्दी आ गई
उम्र  पाई   मुफ़लिसी  की  बांह में   पलती  हुई

तंज़ कसता है ज़माना, छोड़  वो  जब से गया
ख़्वाब देखा इश्क़ का, उससे  यही ग़लती हुई

वह भिखारी था मरा जो रात को  फुटपाथ पर
भीड़ गुज़री फिर उधर से आंख को मलती हुई

शाम को आना था, आया ही नहीं वो तो ‘शरद’
हो सके तो दे उसे  अब   शाम   इक  ढलती हुई

- डॉ शरद सिंह

08 April, 2019

कौन जाएगा भला ( ग़ज़ल ) ... - डॉ शरद सिंह

Kaun Jayega Bhala... Ghazal of Dr (Miss) Sharad Singh


ग़ज़ल

कौन जाएगा  भला   उसको  मनाने को
दिल नहीं करता हमारा सिर झुकाने को

इस क़दर जलने लगे हैं ख़्वाब आंखों में
अश्क़ की लहरें उठीं  उनको बुझाने को

जो गिरा है मुफ़लिसी की ठोकरें खाकर
कौन झुकता है भला, उसको उठाने को

दर्द का इक कारवां, है यहां ठहरा हुआ
हो न हो, वो ही गया उसको बुलाने को

वक़्त ने देखा नहीं हमको कभी मुड़कर
याद क्यूं करना भला, गुज़रे जमाने को


- डॉ ( सुश्री ) शरद सिंह

04 April, 2019

मेरे ख़्वाबों के शहर का (ग़ज़ल) ... - डॉ शरद सिंह

Mere Khwabon Ke Shahar Ka ... Ghazal of Dr (Miss) Sharad Singh

ग़ज़ल


मेरे ख़्वाबों के शहर का जो है पता तुझको
ज़रा बता भी दे अब उसका रास्ता मुझको

तू भी मिल-मिल के जमाने से आजमाता है
चाहता है जो सताना, तो फिर सता मुझको

तू  नज़ूमी  की  तरह  बांचता  रहता है मुझे
मेरी तक़दीर में लिक्खा है क्या, बता मुझको


क्यूं लरज़ता है, झिझकता है, सहमता है भला
इश्क़ तुझको जो है मुझसे, तो ये जता मुझको 


बंद  बक्से  में   रखे   ख़त  की  तरह  क्या जीना
कर दे इक बार तो खुल के भी कुछ अता मुझको


- डॉ ( सुश्री ) शरद सिंह

नींद भी आती नहीं है (ग़ज़ल) ... - डॉ शरद सिंह

Neend Bhi Aati Nahin ... Ghazal of Dr (Miss) Sharad Singh

ग़ज़ल

कह दिया हमने हमारा दिल कभी दुखता नहीं है
मुस्कुराने  से   दिलों  का   टूटना   छुपता नहीं है


नींद के खाते में  चढ़ते  जा  रहे हैं  ख़्वाब मेरे,
नींद भी  आती  नहीं है,  कर्ज़ भी चुकता नहीं।




इस कदर बढ़ने लगा है दर्द अब तो ज़िन्दगी में
लाख थामों नब्ज़ लेकिन  दर्द  ये  रुकता नहीं है

इस जमाने के चलन के  साथ  न 
चल  पाए हम
कोशिशें तो की मगर ये सिर कहीं झुकता नहीं है


- डॉ ( सुश्री ) शरद सिंह


30 October, 2018

ये गुब्बारे - डॉ. शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh with Balloons
सुनो ज़रा क्या कहते हैं ये गुब्बारे
धार  हवा  की  सहते हैं  ये गुब्बारे

रंगों की ये बांध पोटली  कांधे पर
भीतर-भीतर  दहते  हैं  ये गुब्बारे

बंधे हुए हैं पर इनको परवाह नहीं
अपनी रौ  में  बहते  हैं ये  गुब्बारे

बच्चे, बूढ़े, युवा कहीं कोई भी हो
सब के मन को गहते हैं ये गुब्बारे

किसी हसीं सपने के जैसे लगते हैं
‘शरद’ धूप मे उड़ते हैं  ये गुब्बारे

                             - डॉ. शरद सिंह



21 July, 2018

हमें कहना नहीं आया ... डॉ शरद सिंह ... ग़ज़ल

Hame Kahna Nahi Aaya ... Ghazal of Dr (Miss) Sharad Singh
हमें कहना   नहीं आया
तुम्हें सुनना  नहीं आया
भले ही दिल ने दोनों के
हमेशा ही तो समझाया
- डॉ शरद सिंह

10 July, 2018

दिल हुआ रंगरेज देखो, इन दिनों - डॉ शरद सिंह


Shayari of Dr (Miss) Sharad Singh
दिल हुआ रंगरेज देखो, इन दिनों
रंग रहा है इश्क़ की चादर यहां
छत नहीं, दीवार न हो, न हो दर भी
है वहीं घर, ढाई हों आखर जहां
- डॉ शरद सिंह


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दिल तो ठहरा एक जुलाहा - डॉ शरद सिंह

Shayari of Dr (Miss) Sharad Singh

दिल तो ठहरा एक जुलाहा
ख़्वाब की चादर बुनता है
इश्क़ का ताना-बाना लेकर
रंग वफ़ा के चुनता है
- डॉ शरद सिंह


रात के नाम - डॉ शरद सिंह

Shayari of Dr (Miss) Sharad Singh

रात के नाम   एक  ख़त लिखना
चांद है फिर उदास, मत लिखना
- डॉ शरद सिंह


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