19 August, 2026

कविता | यह तो बताएगी अगली पीढ़ी | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

कविता...
यह तो बताएगी अगली पीढ़ी
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह 

कल शाम 
वह मेरे पास आकर बैठ गई 
बिल्कुल बाजू में 
मैंने देखा उसे वह सहमी हुई थी 
घबराई हुई थी 
मुझे लगा 
मैंने उसे कभी, कहीं देखा है 
या पढ़ा है उसके बारे में 
अख़बार में 
या फिर किताबों में 
या फिर यह मेरा कोई भ्रम था 
क्योंकि वह 
वैसी बिल्कुल नहीं थी 
जैसी एक छवि मेरे दिमाग में थी 
उसके चेहरे और 
आवाज़ को लेकर।
मेरे अवचेतन में जो बसी थी 
वह आवाज़ बुलंद थी 
सच्ची थी 
और उसमें 
मर मिटने का जज़्बा था 
जो चेहरा मेरे ज़ेहन में था
वह तेजस्वी था 
आत्मविश्वास से भरा हुआ 
कुछ भी कर गुज़रने को तैयार

और ये?
और ये
जो मेरे बाजू में आकर बैठी थी 
लगी तो वैसे ही 
लेकिन हू-ब-हू नहीं 
फिर भी मैंने  उससे पूछा
तुम वही हो न, जो मैं समझ रही हूं ?
उसने अपना कांपता हुआ 
पीले पड़े चेहरे वाला सिर हिलाया 
स्वीकारोक्ति में 

तब मुझे उससे पूछना ही पड़ा 
विश्वास नहीं हो रहा है 
मेरा धीरज खो रहा है 
तुम जो जेल की सलाखों के पीछे 
स्वर्ण-स्वप्न की तरह पलीं
तुम्हें पाने के लिए सैंकड़ों गर्दनें
हंसते-हंसते फांसी के फंदे पर चढ़ीं

तब कहीं जाकर 
तुमने इस धरती पर कदम रखा 
एक गर्व की तरह 

वह गर्व आज मुझे धुंधला क्यों दिखाई दे रहा है? 
तुम्हारे वही होने पर मुझे संदेह क्यों हो रहा है?
क्या तुम सचमुच वही हो? 

क्या तुम सचमुच वही हो? 
मेरा प्रश्न सुनकर 
वह सहसा चींख उठी
बोल उठी वह चिल्लाती हुए, 
"हां मैं वही हूं! 
वही हूं!
वही हूं! 
वही हूं जिसे सब कहते हैं - आज़ादी 
मैं वही हूं!

कर रहे हैं मुझे सब विकृत 
खेल रहे हैं सब मेरी अस्मिता से 
ट्रोल कर रहे हैं मुझे 
सोशल मीडिया पर
मेरे नाम पर परोस रहे हैं गालियां मां-बहन की,
हद पार हो चली है मेरे सहन की।
अब तो मुझे भी 
संदेह होने लगा है 
अपने अस्तित्व पर 
कि क्या मैं वही हूं जो शहीदों के रक्त से पोषित हुई
1947 में जन्मी
और 
बंटवारे के दावानल में झुलसी,
क्या मैं वही हूं?

मुझे बताओ मैं कौन हूं?
कौन हूं मैं?"
मुझे बताओ!!!

उसने जो प्रश्न किया मुझसे 
उसके अनुत्तरित रह जाने से बेहतर था कि मैं उसे सांत्वना देती,
सो मैंने उससे कहा-
दुखी मत हो!
डरो भी मत 
चाहे प्रथम विश्व युद्ध हो 
या द्वितीय विश्वयुद्ध 
चाहे नात्सी गैस चैंबर हों
यह परमाणु बम 
चाहे कालरा हो, हैजा या कोरोना पेंडेमिक की आपदा हो 
या विश्वव्यापी आर्थिक मंदी का दौर,
मानवता आज भी ज़िंदा है 

तुम भी रहोगी ज़िंदा अपने मूल चरित्र में 
समय कभी एक-सा नहीं रहता! 
गलतियां सिर्फ़ दोहराई नहीं जातीं, 
कभी-कभी सीख भी ली जाती है उनसे 
समय सिखा चुका है बहुतों को 
और आगे भी सिखाएगा 
भरोसा रखो 
पहचानो खुद को 
तुम आज़ादी ही मानवता हो और मानवता ही आज़ादी

तुम्हारी अस्मिता को कोई 
मिटा नहीं पाएगा!!!
तुम्हारी अस्मिता को कोई 
मिटा नहीं पाएगा!!!
मिटा नहीं पाएगा!!!
मिटा नहीं पाएगा!!!

और देर तक प्रतिध्वनित होती रही मेरी ही आवाज़ 
मेरे कानों में 
और तैर गई एक आश्वस्ति उसके चेहरे पर।
यह सब सच था या मेरा भ्रम 
मुझे पता नहीं 
यह तो बताएगी अगली पीढ़ी 
जी हां!
यह तो बताएगी अगली पीढ़ी
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