11 September, 2026

जिस्म से बाहर | कविता | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

जिस्म से बाहर 
      - डॉ (सुश्री) शरद सिंह 

लोग मानते हैं अपशकुन 
कांच के टूटने का
झाड़ कर, बुहार कर
फेंक देते हैं 
घर से बाहर उसकी 
किरच-किरच
टूटी हुई चूड़ियां भी 
मानी जाती हैं अपशकुन
टूटी हुई ऐनक 
टूटी हुई घड़ी 
नहीं रखा जाता इन्हें घर में 
पर टूटे हुए दिल को 
झाड़-बुहार कर फेंका 
नहीं जा सकता 
जिस्म के घर में 
धड़कता रहता है 
इस तरह
जैसे कोई हताहत 
रेंग रहा हो 
घिसट-घिसट कर 

क्या यह अपशकुन नहीं है 
बाकी ज़िंदगी के लिए?

काश!
टूटे हुए दिल को भी
झाड़-बुहार कर 
जिस्म से बाहर
फेंका जा सकता...।
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06 September, 2026

कविता | चट्टान पर खिला फूल | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

चट्टान पर खिला फूल 
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह 

भावनाओं की नींद का 
अचानक टूटना 
आंखों का खुल जाना 
और खुद को पाना 
एक खुरदुरी चट्टान पर 
खिले एक ज़िद्दी फूल की तरह 
एहसास कराता है 
उस मिथ्या का 
जिसके पीछे भागता रहा मन 
बहुत दूर तक 
बहुत देर तक 
ओह! जबकि 
मुझे तो आता है 
चट्टान की नमी से भी 
जिंदगी जी लेना 
वक्त की हवाओं के 
थपेड़ों को भी सह लेना 
फिर क्यों भावनाएं चातक बन
करती रहीं स्वाति नक्षत्र की प्रतीक्षा?
प्रेम कितना कर देता है भ्रमित 
देखो न, 
इंसान खुद को ले जाने लगता है- 
यथार्थ जीवन से दूर 
भ्रम के जीवन के क़रीब 
चांद और तारों के लिबास से 
देखने लगता है खुद को सजा हुआ,
सूरज को मुट्ठी में भरकर 
चूमने लगता है 
मछलियों के साथ उड़ता है 
पंछियों के साथ तैरता है 
एक सुंदर एआई फिक्शन की तरह,
सच के भ्रम और 
भ्रम के सच में उलझ कर 
स्वयं को पाता है 
प्रेम की झील में तैरता हुआ 
जबकि एआई में भी 
पहचानना जरूरी है सच को 
बिल्कुल वैसे ही जैसे 
चट्टान पर खिला फूल 
पहचानता है अपनी क्षमता को 
अस्तित्व को 
और जीता रहता है सिर उठाएं 
अनुभवों की चटख धूप
घनी बारिश 
और ठिठुराती ठंड में भी
बिना किसी भ्रम के,
आत्मविश्वास के प्रेम में लिप्त 
अडिग, अप्रभावित,
अनंत संभावनाओं से भरा हुआ,
बिल्कुल चट्टान पर खिले फूल की तरह।
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03 September, 2026

कविता | सुबह की चाय संग | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

कविता 
सुबह की चाय संग
             - डॉ (सुश्री) शरद सिंह 

सुबह की चाय संग
यादों के बिस्कुट 
कभी मीठे
कभी खारे
डुबोते चाय में ही
भीगते हैं
इस क़दर वे
कि जैसे आंसुओं से 
भीगते है शब्द अकसर
वे आंसू भी कभी
ग़म के, ख़ुशी के
कि बारिश से हुए तर
नीम पर
पंख झटकाए कोई पक्षी
सम्हल कर
कि बूंदे भी सिमट आती हैं 
प्याली में अचानक 
जो उठती भाप के संग
भावना की हो जुगलबंदी 
तो तय है दिन भी भीगेगा
समूचा ... किसी की याद से...!
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