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01 May, 2019

उससे यही ग़लती हुई ( ग़ज़ल ) ... - डॉ शरद सिंह

Usase Yahi Galati Hui ... Ghazal of Dr (Miss) Sharad Singh

उसके घर में आज भी ढिबिया दिखी जलती हुई
हर   तरक्क़ी   थी   गुज़रती  दूर  से   चलती हुई

इस ज़माने की समझ उसको तो जल्दी आ गई
उम्र  पाई   मुफ़लिसी  की  बांह में   पलती  हुई

तंज़ कसता है ज़माना, छोड़  वो  जब से गया
ख़्वाब देखा इश्क़ का, उससे  यही ग़लती हुई

वह भिखारी था मरा जो रात को  फुटपाथ पर
भीड़ गुज़री फिर उधर से आंख को मलती हुई

शाम को आना था, आया ही नहीं वो तो ‘शरद’
हो सके तो दे उसे  अब   शाम   इक  ढलती हुई

- डॉ शरद सिंह