चट्टान पर खिला फूल
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
भावनाओं की नींद का
अचानक टूटना
आंखों का खुल जाना
और खुद को पाना
एक खुरदुरी चट्टान पर
खिले एक ज़िद्दी फूल की तरह
एहसास कराता है
उस मिथ्या का
जिसके पीछे भागता रहा मन
बहुत दूर तक
बहुत देर तक
ओह! जबकि
मुझे तो आता है
चट्टान की नमी से भी
जिंदगी जी लेना
वक्त की हवाओं के
थपेड़ों को भी सह लेना
फिर क्यों भावनाएं चातक बन
करती रहीं स्वाति नक्षत्र की प्रतीक्षा?
प्रेम कितना कर देता है भ्रमित
देखो न,
इंसान खुद को ले जाने लगता है-
यथार्थ जीवन से दूर
भ्रम के जीवन के क़रीब
चांद और तारों के लिबास से
देखने लगता है खुद को सजा हुआ,
सूरज को मुट्ठी में भरकर
चूमने लगता है
मछलियों के साथ उड़ता है
पंछियों के साथ तैरता है
एक सुंदर एआई फिक्शन की तरह,
सच के भ्रम और
भ्रम के सच में उलझ कर
स्वयं को पाता है
प्रेम की झील में तैरता हुआ
जबकि एआई में भी
पहचानना जरूरी है सच को
बिल्कुल वैसे ही जैसे
चट्टान पर खिला फूल
पहचानता है अपनी क्षमता को
अस्तित्व को
और जीता रहता है सिर उठाएं
अनुभवों की चटख धूप
घनी बारिश
और ठिठुराती ठंड में भी
बिना किसी भ्रम के,
आत्मविश्वास के प्रेम में लिप्त
अडिग, अप्रभावित,
अनंत संभावनाओं से भरा हुआ,
बिल्कुल चट्टान पर खिले फूल की तरह।
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