इन दिनों
- डॉ शरद सिंह
मेज पर रखी
अपनी हथेली पर
देखती हूं
ठहरी हुई धूप
गोल, चमकीले धब्बे-सी
देर तक देखती हूं तो
चौंधिया जाती हैं आंखें
अकुलाकर
मूंदती हूं आंखें
दिखते हैं
काले-काले धब्बे
बदल जाता है धूप का चरित्र
आंखों में समाते ही
सोचती हूं तभी-
यानी इंसान
धूप से भी तेज है
चरित्र बदलने में
बदल जाता है वह तो
पलक झपकते ही
धूप को पढ़ती हुई
जान रही हूं
अपनी ज़िम्मेदारियों को
ज़रूरतों को
और
इंसान के प्रकारों को
इन दिनों।
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