कविता
सुबह की चाय संग
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
सुबह की चाय संग
यादों के बिस्कुट
कभी मीठे
कभी खारे
डुबोते चाय में ही
भीगते हैं
इस क़दर वे
कि जैसे आंसुओं से
भीगते है शब्द अकसर
वे आंसू भी कभी
ग़म के, ख़ुशी के
कि बारिश से हुए तर
नीम पर
पंख झटकाए कोई पक्षी
सम्हल कर
कि बूंदे भी सिमट आती हैं
प्याली में अचानक
जो उठती भाप के संग
भावना की हो जुगलबंदी
तो तय है दिन भी भीगेगा
समूचा ... किसी की याद से...!
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