08 October, 2019
28 September, 2019
वरना वो भी सुधर गया होता ( ग़ज़ल )... डॉ शरद सिंह
ग़ज़ल
- डॉ शरद सिंह
अश्क़ आंखों से बह गया होता
दिल का दरिया उतर गया होता
दिल का दरिया उतर गया होता
ग़म को रक्खा है बंद मुट्ठी में
वरना सब पे बिखर गया होता
गर कोई इंतज़ार करता तो
शाम होते ही घर गया होता
उसकी मां ने उसे नहीं डांटा
वरना वो भी सुधर गया होता
वो 'शरद' को अगर समझ लेता
दुश्मनी को बिसर गया होता
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हलफ़ उसने उठा रक्खा ( ग़ज़ल )... डॉ शरद सिंह
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| Halaf Usane Utha Rakha ... Ghazal of Dr (Miss) Sharad Singh |
ग़ज़ल
- डॉ शरद सिंह
जला भी दो बही-खाता, भलाई का, बुराई का
हलफ़ उसने उठा रक्खा है हमसे बेवफ़ाई का
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