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29 November, 2017
23 May, 2017
इकतारा ... डॉ शरद सिंह
![]() |
| Poetry of Dr (Miss) Sharad Singh |
इकतारा
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ध्वनियां
बहुत कुछ कहती हैं
कभी सार्थक, कभी निरर्थक
मौन पी जाता है सारी ध्वनियों को
छानता है धैर्य की छन्नी से
और अच्छी ध्वनियों को
उंडेल देता है इकतारे पर
तभी तो
इकतारा होता है झंकृत
किसी देह की तरह ...
- डॉ. शरद सिंह
#SharadSingh #Poetry #MyPoetry
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ध्वनियां
बहुत कुछ कहती हैं
कभी सार्थक, कभी निरर्थक
मौन पी जाता है सारी ध्वनियों को
छानता है धैर्य की छन्नी से
और अच्छी ध्वनियों को
उंडेल देता है इकतारे पर
तभी तो
इकतारा होता है झंकृत
किसी देह की तरह ...
- डॉ. शरद सिंह
#SharadSingh #Poetry #MyPoetry
अब तो चाहिए... डॉ शरद सिंह
![]() |
| Poetry of Dr (Miss) Sharad Singh |
अब तो चाहिए...
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बहुत थकान होती है -
उधार के रिश्तों को जीते हुए
जैसे ओढ़ी हुई मुस्कान
थका देती है होंठों को
गालों को
और आंखों की कोरों को
हां,
बहुत थकान होती है -
जब रिश्तों को जीते हैं
रिश्तों के बिना
जीत की उम्मींद में
फेंके हुए पासों की तरह।
और थक-हार कर
अकसर सोचता है मन
ये ज़िन्दगी थकी-थकी सी है
अनुबंधों के लिबास तले
ओह, अब तो चाहिए एक सुई या पिन
जिससे उधेड़ा जा सके
इस लिबास की सीवन को।
.... - डॉ. शरद सिंह
#SharadSingh #Poetry #MyPoetry
21 December, 2015
18 May, 2015
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