25 June, 2021

प्रेम | कविता | डॉ शरद सिंह

प्रेम
     - डॉ शरद सिंह

उसने सोचा
वह जाएगा
थैला भर प्रेम 
ले आएगा
सब्ज़ी-भाजी की तरह

वह गया
जेबें खाली की
बाज़ार में,
एक-एक टुकड़ा
खरीदता रहा
प्रेम का
दूकानों से

काला-सफ़ेद प्रेम
रंग-बिरंगा प्रेम
मखमली प्रेम
खुरदरा प्रेम
धारदार प्रेम
घिसापिटा प्रेम
हंसता हुआ प्रेम
रोता हुआ प्रेम
हथेली पर रखा प्रेम
आंखों में बसा प्रेम
रूमाल में कढ़ा प्रेम
किताब में लिखा प्रेम

लौट कर घर
उसने जोड़ा
सारे टुकड़े
प्रेम के

और यह क्या?

सारे टुकड़े 
परस्पर जुड़ते ही
बन गया
एक प्रोडक्ट
मल्टीनेशनल कंपनी का
पर
नहीं बना प्रेम
वह ठगा-सा खड़ा
देखता प्रोडक्ट
टुकुर-टुकुर
नहीं मिला प्रेम
ज़ेबें खाली कर के भी
आख़िर 
सच्चा, साबुत प्रेम 
बाज़ारू जो नहीं होता।
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4 comments:

  1. जी नमस्ते ,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (२६-0६-२०२१) को 'आख़री पहर की बरसात'(चर्चा अंक- ४१०७) पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है।
    सादर

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    1. मेरी कविता को चर्चा मंच में शामिल करने के लिए हार्दिक धन्यवाद एवं हार्दिक आभार अनीता सैनी जी 🙏

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  2. बहुत सुंदर सृजन आदरणीय ।
    प्रेम अगर ऐसे ही मिलने की वस्तु होती तो किसी को अपनी ज़ुबाँ पर प्रतिबंध लगाने की ज़रूरत ही न होती ।

    खुश रहिये

    सादर

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