19 June, 2021

पांव-पांव चादर | कविता | डॉ शरद सिंह

पांव-पांव चादर
          - डॉ शरद सिंह

रोज़ रात को 
जब पड़ती हैं बिस्तर पर
सिलवटें
मेरी करवटों से
जागता है रतजगे का अहसास
नापती हूं अपनी चादर को

कभी चादर बड़ी
और पांव छोटे
तो कभी पांव बड़े
और चादर छोटी
किसी दिहाड़ी मज़दूर की 
आमदनी की तरह
कभी कम तो कभी ज़्यादा
चादर बदलती रहती है अपनी नाप
या फिर मेरे पांव ही
होते रहते हैं 
कभी छोटे तो कभी बड़े

नींद की लम्बाई
करती है तय
पांव और चादर की नाप को
और
नींद वश में है बेचैनी के

बेचैनी पढ़ती है पहाड़ा
सत्ते सात, अट्ठे आठ का
मुड़ जाते हैं पांव घुटनों से
हो जाती है चादर लम्बी
सिर ढांपते ही
चादर से बाहर 
निकल आते हैं पांव
तभी घुटता है दम,
फड़फड़ाती है चादर

यह खेल 
हर रात का,
यह खेल पांव-पांव चादर का
आया है मेरे हिस्से में
नियति बन कर।
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15 comments:

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    1. हार्दिक धन्यवाद विश्वमोहन जी 🙏

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  2. हृदय स्पर्शी सृजन।
    सादर

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    1. बहुत-बहुत धन्यवाद अनिता सैनी जी 🌹

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  3. ह्रदय की बेचैनी को उकेरती मर्म स्पर्शी रचना !

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    1. हार्दिक धन्यवाद अनुपमा त्रिपाठी जी🌹

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  4. बहुत ही सुंदर

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    1. बहुत-बहुत धन्यवाद ओकार जी 🙏

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  5. चर्चा मंच में मेरी कविता को शामिल करने के लिए आपका हार्दिक आभार अनिता सुधीर जी 🙏

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  6. एहसास से भरी अनुभूति का सटीक चित्रण ।
    जागती रातों की कशमकश का शानदार संजीव चित्रण।
    सुंदर सृजन।

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    1. हार्दिक धन्यवाद कुसुम कोठारी जी

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  7. अंतर्मन की बेचैनी को शब्दों का रूप देना भी बहुत मुश्किल होता है,जो आपने बाखूबी किया है,सादर नमन

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    1. बहुत-बहुत धन्यवाद कामिनी सिन्हा जी

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  8. बेहद हृदयस्पर्शी सृजन आदरणीया

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    1. हार्दिक धन्यवाद अनुराधा चौहान जी

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