11 June, 2021

ज्वार | कविता | डॉ शरद सिंह

ज्वार
       - डॉ शरद सिंह

पीड़ा, प्रेम
आकुलता, व्याकुलता
भावनाओं का ज्वार ही तो है
जो बहा लाता है
अपने साथ यादों को
जो बहा ले जाता है
अपने साथ वादों को

बस, रह जाती है स्तब्धता
कस कर बंधी हुई मुट्ठी में
गीली रेत की तरह
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14 comments:

  1. जी नमस्ते ,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (१२-०६-२०२१) को 'बारिश कितनी अच्छी यार..' (चर्चा अंक- ४०९३) पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है।
    सादर

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    1. अनीता सैनी जी, मेरी कविता को चर्चा मंच में शामिल करने के लिए आपका हार्दिक आभार 🙏

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  3. बेहतरीन भावाभिव्यक्ति ।

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    1. दिल्ली शुक्रिया मीना भारद्वाज जी 🙏

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  4. समय बहुत कारगर है, कसी मुठ्ठी से भी रेत सूखते ही फिसल जाती है

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    1. बहुत-बहुत धन्यवाद गगन शर्मा जी 🙏

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  5. गहरी और मंथी हुई रचना।

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    1. हार्दिक धन्यवाद संदीप कुमार शर्मा जी

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  6. हृदय स्पर्शी सृजन।

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    1. हार्दिक धन्यवाद कुसुम कोठारी जी 🙏

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  7. बेहद हृदयस्पर्शी

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