30 January, 2026

कविता | दिया कहता है | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

कविता 
दिया कहता है  
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

टूटे दरवाज़े से
झांकता दिया
उम्मीद की 
रोशनी को थामे
मानो कहता है
कि सब कुछ
नहीं हुआ है ख़त्म
अंधेरा गहरा ही सही
हारेगा ज़रूर
क्योंकि 
अंधेरे की नियति है
हारना
और 
उजाले की जीतना...
यदि ऐसा नहीं होता
तो सूरज
कभी नहीं उगता।
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