दिए बनकर जलेंगे
- डॉ (सुश्री) शरदसिंह
घोर तम में भी न हम गुम हो सकेंगे ।
हम दिवाली के दिए बनकर जलेंगे ।
हो भले ही छल का जल खारा बहुत
या, हो गहरी स्वार्थ की धारा बहुत
आस्था के सीप का मोती बनेंगे
हम दिवाली के दिए बनकर जलेंगे ।
दर्द का इतिहास ही काफी नहीं है
प्यार का आभास ही काफी नहीं है
सत्य की, विश्वास की कविता लिखेंगे
हम दिवाली के दिए बनकर जलेंगे ।
ये अमावस भी ढलेगी, भोर होगी
सूर्य की किरणों की जगमग डोर होगी
चेतना में ज्योति का चंदन मलेंगे
हम दिवाली का दिया बनकर जलेंगे ।
श्रम न ठिठकेगा, न हारेगा कहीं भी
मन प्रलोभन से न बहकेगा कहीं भी
संकल्प के पथ से न अपने पग हटेंगे
हम दिवाली के दिए बनकर जलेंगे ।
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