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03 April, 2024

कविता | अहसास | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

कविता
अहसास
        - डॉ (सुश्री) शरद सिंह
तब मैं 
कुछ हुआ करती थी
जब मुझे
पुकारता था कोई
ममता से भर कर,
दुलार कर
पुचकार कर
मनुहार कर...
लड़कपन
जाग उठता था
मेरे भीतर
सात जन्म
सात रंग
और
सात समुद्रों-सा
जीवंत

अब कोलाहल है
पर वह 
स्वर नहीं
सूखी दीवारें
रचती रहती हैं
रेत के टीले
हर पहलू
हर करवट
के साथ

एक अथाह रेगिस्तान
दिन की तपन
रात की ठंड
और कुछ नहीं
बस, कुछ साए
खेलते हैं
सांप-सीढ़ी
मेरी 
भावनाओं के साथ

बेचारे!
उन्हें नहीं पता
कि व्यर्थ है उनका
प्रयास,
अब नहीं होता 
मुझे अपने
होने का भी
अहसास।
   ...........

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09 July, 2021

अहसास | कविता | डॉ शरद सिंह

अहसास
     - डॉ शरद सिंह

रात 
किसी ठंडे 
अहसास की तरह
दौड़ती है रगों में
थके-थके क़दमों से
हांफती हुई

दिन भर के ख़ुलासे
चेहरों में ढल कर 
आने लगते हैं सामने
किसी चलचित्र की तरह

शब्दों के गुबार
छाने लगते हैं 
एक धुंध की तरह
बोलने वालों के इरादे
छिप जाते हैं
उस धुंध के पीछे

फिर भी
सब कुछ है साफ़ 
प्रस्ताव, प्रहसन, 
झूठी प्रशंसा
संदिग्ध इरादे
इसमें 
कोई जगह नहीं
दर्द या आंसुओं की
नहीं करना साझा
यह किसी को

ज़िंदगी
रात की मानिन्द 
सरक ही जाएगी
पर
सुबह कब होगी
पता नहीं।
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18 May, 2021

अहसास | कविता | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

अहसास
       - डॉ (सुश्री) शरद सिंह

अव्यवस्थाओं के अभ्यस्त हम
चुराने लगे हैं नज़रें
मौत की ख़बरों से

हम नहीं जानना चाहते
कि ख़ामी कहां है
हम नहीं जानना चाहते
कि दोषी कौन है
हम नहीं जानना चाहते
कि जिम्मेदार कौन है

हम वो बन चुके हैं
जो बिता देना चाहते हैं
'व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी' के परिसर में
अपना बचा हुआ जीवन

अब नहीं है
सच और झूठ के बीच महीन रेखा
अब है चौड़ी खाई
जिसे नहीं फलांग सकेंगे हम
हमारे पांव हो चुके हैं बौने
हाथ कंधों से ऊपर उठते ही नहीं
गरदन झुक चुकी है
और दिमाग़ हो चला है विचारशून्य
हमारी उंगलियों में तो तर्जनी ही नहीं है
ठीक वैसे ही
जैसे पूंछ का उपयोग न होने पर
हम मनुष्यों ने खो दी अपनी पूंछ
अब हम जीने के आदी हो चले हैं
बिना तर्जनी के,
अच्छा है
बना रहेगा सुरक्षित होने का भ्रम
और हम
अख़बारों में पढ़ते रहेंगे चुटकुले
छांट-छांट कर

परिस्थिति से पलायन
समा गया है हमारे रक्त में
बदल रहा है हमारा डीएनए
बदल रहा है हमारा जिनोम

तो क्या

ज़िन्दा रहने का अहसास
बचा तो है
यह क्या कम है....?
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