06 March, 2022
ग़ज़ल | हम बस्ते में बंधे रह गए | डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
05 March, 2022
नन्हा शेवचेन्को | कविता | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह
नन्हा शेवचेन्को
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
यह बात नहीं है
युक्रेनी कवि
तरास शेवचेन्को उर्फ़
कोबज़ार तरास की
जो जन्मा
प्रथम विश्व युद्ध के प्रारंभ में
और चला गया
द्वितीय विश्व युद्ध के उपरांत
उसने देखा था त्रासदी
दोनों विश्व युद्धों की
और कहा बस,
अब नहीं
और नहीं
और युद्ध नहीं चाहिए
आज एक शेवचेन्को
भर्ती है अस्पताल में
हो चुका अनाथ
शायद अपनी एक टांग भी
खो दे
यह नन्हा बालक
शेवचेन्को है,
तरास शेवचेन्को नहीं
जिसने
होश आते ही पुकारा था -
मां को
पिता को
दादी को
और पौधे को
हां, उसने लगाया था
एक पौधा
बाल्कनी के गमले में
और सोचा था
बड़ा हो जाएगा पौधा
रातोंरात
एक मिसाइल-रॉकेट से
खण्हर हो गया उसका घर
ध्वस्त हो गई बाल्कनी
गमले और पौधे का
पता ही नहीं
नन्हा शेवचेन्को
समझ जाए शायद
इस युद्ध के बाद
रातोंरात पेड़ बड़े नहीं होते
छिड़ जाते हैं युद्ध रातोंरात
और
सब कुछ तबाह हो जाता है
रातों-रात
नन्हा शेवचेन्को
अगर बचा रहा
तो समझ जाएगा सब कुछ।
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01 March, 2022
शिवत्व | कविता | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह
20 February, 2022
चांद गया था दवा चुराने | ग़ज़ल | डॉ शरद सिंह | नवभारत
मित्रो, "नवभारत" के रविवारीय परिशिष्ट में आज 20.02.2022 को "चांद गया था दवा चुराने" शीर्षक ग़ज़ल प्रकाशित हुई है। आप भी पढ़िए...
हार्दिक धन्यवाद #नवभारत 🙏
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ग़ज़ल
चांद गया था दवा चुराने
- डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
गेरू ले कर दीवारों पर शुभ-शुभ शब्द उकेर।
जाने कैसा दिन गुजरेगा, बैठा काग मुण्डेर।
सप्तपदी चल, टूटे बंधन, सुलगे हैं खलिहान
नदी सूख कर तड़क गई है, छोड़ प्यास का ढेर।
मैकल-पर्वत की सी पीड़ा, झील सरीखी आंख
सपनों की वंशी को ले कर, डोले समय- मछेर।
धुंआ उगलती खांस रही थी, मावस डूबी रात
चांद गया था दवा चुराने, खाली ज़ेबें फेर।
लिए हथकड़ी दौड़ रही है हवा, मुचलका भूल
छत पर चढ़ कर सूरज झांके, देखे आंख तरेर।
चाहे जितना बचना चाहो, जलना है हर हाल
छनक-छनक कर ही जलती है,घी में बची महेर।
हाॅकर-छोरा सुबह-सवेरे घूमे सब के द्वार
जैसे कलगी वाला मुर्गा, रहे दिवस को टेर।
बारह बरस बिता कर चाहे, फिरें घूर के भाग
पर, कुछ तो बदलाव हमेशा होता देर-सवेर।
यह दुनिया बिखरी टुकड़ों में, दूर-दूर विस्तार
किन्तु ‘शरद’ का मन, बस चाहे दो बांहों का घेर।
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