21 May, 2025

कविता | दरार | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

दरार
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दीवार की दरार में
उग सकता है
एक नन्हें पौधे से
पीपल का वृक्ष तक
किन्तु
संबंधों में आई 
दरार
होती है निर्जीव
बंजर।
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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20 May, 2025

कविता | कुछ लोग | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

कुछ लोग
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जिन हाथों से 
फिसल रही ज़िंदगी
हर दिन
उन्हीं से
रिश्तों को बिसात बना कर
चलते हैं दुर्भावनाओं के मोहरे
बड़े फ़ख़्र से

कुछ लोग नहीं जानते 
कि क्या खो रहे हैं वे!
          - डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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19 May, 2025

कविता | शर्मिंदगी | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

शर्मिंदगी
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गिरगिट
शर्मिंदा है
अपने
गिरगिट होने पर
जब से
बदलने लगा है
इंसान
हर पल अपना रंग।
      - डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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18 May, 2025

कविता | बिकाऊ | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

कविता | बिकाऊ | डॉ (सुश्री) शरद सिंह
बिकाऊ
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रोज बंधती 
रोज टूटती 
है उम्मीद
हाथ खाली हों
तो ख़्वाब सच नहीं होते 
इस बिकाऊ दुनिया में
सब कुछ बिकाऊ है
सबसे ज़्यादा 
इंसान और रिश्ते।
     - डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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14 May, 2025

ग़ज़ल | आजकल | डॉ (सुश्री) शरद सिंह



ग़ज़ल/
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह

ज़िन्दगी लगती उदासी आजकल
आस्था लगती धुआं-सी आजकल

मित्रता के नाम पर धोखा-फरेब
बात कहने को जरा सी आजकल  

कंदराएं अब भली लगने लगीं
हो गया मन आदिवासी आजकल

निर्जला व्रत कह दिया हमने मगर 
आत्मा तक है प्यासी आजकल

यूँ 'शरद' का मन बहुत ही खिन्न है
हर हँसी है सप्रयासी आजकल
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07 May, 2025

कविता | कांधे यादों के | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

कविता | कांधे यादों के | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

मेरे माज़ी का
सलीब 
बहुत भारी है
कांधे दुखने लगे हैं
यादों के।
      - डॉ (सुश्री) शरद सिंह

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05 May, 2025

कविता | भूख | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

भूख
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

जिसके पास 
होता है सब कुछ 
वही लिखता है 
भूख पर कविता  
क्योंकि 
भूखा तो 
जूझता रहता है
एक अदद रोटी के लिए।
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