01 January, 2025

कविता | एक और साल | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

कविता
एक और साल

- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

एक और साल
जाते-जाते
मावठे के पानी से
होकर तरबतर 
बांधे उम्मींदों की पोटली
ठिठुरता रहा देर तक
क्योंकि 
इसी मवाठे में भीगा है 
हजारों क्विंटल सूखा अनाज भी....
जाता हुआ साल
फिर गरमाया कुछ
अपने बारह महीनों के 
खट्टे, मीठे
अनुभवों के लिहाफ़ को 
ओढ़ कर....
सोचता रहा-
उन किसानों के बारे में
जिनके मुद्दे आज भी
जूझ रहे हैं, 
लंबित हैं, 
सरकारी दस्तावेज़ की तरह।
और बढ़ते अपराधों के आंकड़ें
जो बैठे हैं
मुंह चिढ़ाते
अगले साल की अगवानी में।
अच्छा था साल 
जो गुज़रा 
लेकिन उतना भी नहीं 
जितना कि सोचा था 
चाहा था....
हर एक के लिए काम 
हर एक के लिए रोटी 
हर एक के लिए घर 
हर एक के लिए शिक्षा 
हर एक के लिए स्वास्थ्य 
हर एक के लिए सुरक्षा 
यह सब पूरा तो नहीं हुआ...

अच्छा था साल 
जो गुज़रा 
लेकिन उतना भी नहीं 
जितना की सोचा था 
चाहा था....
फिर भी अच्छा था साल 
क्योंकि हमारी संस्कृत में 
लौटकर न आने वाले को 
बुरा नहीं कहते...
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13 December, 2024

कविता | गर्मजोशी | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

मैंने पूछा धूप से
इन दिनों
इतनी ठंडी क्यों हो तुम?
बिना एक पल गंवाए
धूप ने कहा-
मित्रों में भी तो
गर्मजोशी नहीं बची।
    - डॉ (सुश्री) शरद सिंह 

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01 December, 2024

शायरी | क्या होगा | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

अभी तो नींद बाक़ी थी,अभी तो ख़्वाब बाक़ी थे,
तुम्हीं जो चल दिए तो सुब्ह के आने से क्या होगा?
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

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22 November, 2024

शायरी | तनहा | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

यूं अता की है ज़िंदगी तनहा,
मांगने पर दिया नहीं कुछ भी।
मिन्नतें की थीं ख़ूब रब तुझसे!
वक़्त रहते किया नहीं कुछ भी।
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

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14 November, 2024

"सांची कै रए सुनो, रामधई" - डॉ (सुश्री) शरद सिंह नयी बुंदेली गजल संग्रह

प्रिय मित्रो, एक ख़ुशख़बरी...
मेरा बुंदेली ग़ज़ल संग्रह "सांची कै रए सुनो, रामधई!" प्रकाशित हो गया है...😊
यह बुंदेली का मेरा प्रथम गजल संग्रह है और इसे प्रकाशित किया है जेटीएस पब्लिकेशन दिल्ली ने। JTS Publication के भाई Rajiv Sharma  जी का हार्दिक आभार कि उन्होंने निर्धारित समय से पूर्व और बेहतरीन साज-सज्जा में इसे प्रकाशित किया🙏
    🚩 मैं अत्यंत आभारी हूं भाई डॉ बहादुर सिंह परमार जी की तथा भाई डॉ  पुनीत बिसारिया जी की जिन्होंने अपनी सघन व्यस्तताओं से समय  निकालकर पुस्तक की भूमिकाएं लिखीं। ये दोनों वे व्यक्तित्व हैं जो बुंदेली के विकास के लिए निरंतर कटिबद्ध हैं तथा अनेकानेक के प्रेरणास्रोत हैं। 🙏
    🚩"इस संग्रह में मेरी ग़ज़लें आम बोलचाल की बुंदेली में हैं। मुझे आशा है कि इसे सभी का स्नेह, आशीर्वाद मिलेगा🙏🌹 
    🚩 संग्रह के बारे में बाकी बातें फिर कभी फिलहाल इतना ही कहूंगी कि जितना मुझे हिंदी से प्यार है उतना ही बुंदेली से भी प्यार है 🌹❤️🌹

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12 November, 2024

शायरी | रास्ते | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

ये   लम्बे   रास्ते   थकते  नहीं क्यों ?
इन्हें मंजिल कभी मिलती नहीं क्यों?
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

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03 November, 2024

शायरी | भरोसा | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

हर भरोसे से भरोसा उठ गया है
रोज़  तेरा   पैंतरा  होता  नया है
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

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