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| Dr (Miss) Sharad Singh |
नवगीत
वर्जनाएं धूप की
- डाॅ सुश्री शरद सिंह
वर्जनाएं
धूप की
उंगली उठाए दिन
तुम्हारे बिन।
रेत पर
छूटे हुए पद-चिन्ह
लहरों से परे
डोंगियां भी
मौन
होंठों पर धरे
हाशियों में
नाम लिख
सुधियां जगाए दिन
तुम्हारे बिन।
नेह के
चटके हुए संबंध
टूटा सिलसिला
झील का ये
दर्द
पर्वत से मिला
खाइयों में
अब यही
दुख गुनगुनाए दिन
तुम्हारे बिन।
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(मेरे नवगीत संग्रह ‘‘आंसू बूंद चुए’’ से)
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