21 February, 2023

ग़ज़ल | लिख देना | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

ग़ज़ल 
लिख देना 
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

हमने अपना आज लिखा है, तुम अपना कल लिख देना।
इक बंजर के नाम, ओ साथी! हरियल जंगल लिख देना।

हमने  तो  न्यायालय  में  भी,  पक्षपात  ही  झेला है
तुम सच्चाई की सलेट पर, निर्णय उज्ज्वल लिख देना।

तथाकथित अपनों के हाथों, अपना सब कुछ लुटा चुकी
उस लड़की के नाम शगुन से भीगा आंचल लिख देना।
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20 February, 2023

ग़ज़ल | कट रहे हैं दिन | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

ग़ज़ल 
कट रहे हैं दिन 
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

कट रहे हैं दिन सुपारी की तरह।
ज़िन्दगी  भारी,  उधारी की तरह।

चैन के पल  हो गए हैं  भूमिगत
एक मुजरिम इश्तिहारी की तरह।

बामशक्क़त हर दिवस-अवसान पर
वक़्त मिलता है दिहारी की तरह।
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*दिवस-अवसान = दिन डूबना
*दिहारी = दिहाड़ी, दैनिक मज़दूरी
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06 February, 2023

शायरी | शिकवा | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

अर्ज़ है -
क्या भला शिकवा-गिला इस ज़िंदगी से हो
जब ज़िंदगी में  ज़िंदगी-सा  कुछ नहीं रहा।
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

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04 February, 2023

सरसों के खेत में | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

चलो चलें, किसी रोज़ सरसों के खेत में।
गाएं फिर  एक गीत  हम  भी  सम्वेत में।
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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01 February, 2023

शायरी | मैं ग़ज़ल की एक किताब हूं | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

मैं ग़ज़ल की एक क़िताब हूं, 
मुझे साथ अपने रखा करो।
मिरी सांस-सांस है शायरी
मुझे तुम अदब से पढ़ा करो।
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
( मेरे गजल संग्रह "पतझड़ में भीग रही लड़की" से )

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29 January, 2023

कविता | साहित्य का जलीकट्टू | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

कविता
साहित्य का जलीकट्टू
         - डॉ (सुश्री) शरद सिंह

गद्देदार किंगसाईज़ सोफे पर
पसर कर
लगा कर बुद्धिजीविता का मुखौटा
मदिरा के स्वाद से फूटते शब्द
जब करते हैं साहित्य-चर्चा
दलित, ग़रीब और
लुटी-पिटी औरतों पर
तो लगता है जैसे
मंहगे कैनवास और कीमती रंगों से
बनाई गई 
भिखारी की पेंटिंग की
बोली लगाई जा रही हो लाखों में
गोया वह साहित्योत्सव नहीं
नीलामीघर हो संवेदनाओं का।

बेशक़ वहां नहीं होती
कोई 'कॉमन वैल्यू"
होती है सिर्फ़ "पर्सनल वैल्यू"
नीलामी के आम नियमों से परे
क्योंकि वह मजमा आम का नहीं
होता है ख़ास-उल-ख़ास का।

रेसकोर्स के घोड़ों
नीलाम होते खिलाड़ियों
और
साहित्य के कथित सेवियों में
अगर कोई अंतर
समझ में आए
तो मुझे ज़रूर बताएं

मेरी बुद्धि का राजहंस
हो गया है टट्टू
साहित्योत्सव भी इनदिनों 
लगता है जलीकट्टू* ।
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(*जलीकट्टू पारंपरिक तमिल खेल।  जली का मतलब है सिक्के और कट्टू का मतलब बैग।  सिक्कों से भरा हुआ बैग बैल के सींगों पर बंधा होता है और बैलों को उकसा कर भीड़ में दौड़ाया जाता है। जो व्यक्ति बैल को क़ाबू में कर लेता है वह विजेता माना जाता है और विजेता को वह बैग मिल जाता है।)

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23 January, 2023

ग़ज़ल | याद आती है | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

ग़ज़ल 
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

जब कभी,  यादें पुरानी    याद आती हैं।
ख़ुश्क आंखें भी अचानक भीग जाती हैं।

अब हथेली की लकीरों में नहीं कुछ भी
अब लकीरें भीगतीं,  न  कसमसाती हैं।

धड़कनें तकती नहीं  हैं  रास्ता उसका
शाम ढलते ही न अब शम्मा जलाती हैं।

किस दिशा में जा रहे हैं और क्यूंकर हम
ये हवायें भी  नहीं  कुछ  भी  बताती हैं।

है बहुत तन्हा, बहुत तन्हा 'शरद' का दिल
और  ये  तनहाइयां  रह - रह  रुलाती हैं।
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