28 October, 2022

ग़ज़ल | शायरी | ये भी कोई जीना है | डॉ (सुश्री) शरद सिंह


ग़ज़ल / शायरी 

दिल पर पत्थर रख कर जीना,
ये भी कोई जीना है?
कोई मुझे बताये आख़िर
कितने आंसू पीना है?

          - डॉ (सुश्री) शरद सिंह

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09 October, 2022

मुक्तक | पूनम का चांद | डॉ (सुश्री) शरद सिंह


अमृत   वर्षा  कर  रहा है, पूनम का चांद।
मन को हर्षित कर रहा है, पूनम का चांद।
शारदीय  इस  रात्रि की  हुई कालिमा दूर
जग को जगमग कर रहा है,पूनम का चांद।
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

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08 October, 2022

कविता | वज़ूद | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

वज़ूद
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

सफ़र में हूं
कि है कांधे पे
याद का
कांवर

पता नहीं
पहुंचूंगी कहां
काशी 
या
मगहर 

ढूंढना बाद मेरे
लिक्खे हुए
पन्नों में तुम्हें
प्रेम का शब्द भी
दुबका हुआ
मिल जाएगा

छूट जाने के लिए
ख़ुद से ही
शरमाएगा

पर करूं क्या
कि...

नहीं, और तो
कुछ भी है नहीं
जो
वसीयत में लिखूं
और छोड़ जाऊं यहां

मेरा वज़ूद भी
तुमसे तो
भूल जाएगा।
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01 October, 2022

कविता | प्रेम करूंगी यक़ीनन | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

कविता
प्रेम करूंगी यक़ीनन
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

तुम कहते हो
मैं प्रेम करूं 
चिड़ियों सी चहकूं 
नदी सी खिलखिलाऊं
थाम कर हाथ
निकल जाऊं
सुदूर वनप्रांतर में

पर कैसे?

प्रेम तो 
मौसमों में जीता
प्रकृति से ऊर्जा लेता
दिलों में धड़कता
एक मधुर अहसास
हुआ करता था

हम बदल रहे हैं 
मौसमों को,
बदल रहे प्रकृति को,
इंसानों के दिल
ख़ुद ही बन चुके हैं
छिद्रित ओजोन परत

अहसासों में 
भले ही गरमाहट हो
बढ़ते तापमान की,
पर स्वार्थी स्पर्श की ठंडक
शून्य से चालीस डिग्री नीचे
कर रही है फ्रीज़ 
संबधों को

प्रेम घुट रहा है
वातानुकूलित कमरों में
जैसे वेंटिलेटर पर हो
कोई मरीज

यदि तुम दे सको
सांस भर
प्रदूषण रहित, स्वच्छ 
खुली हवा
सुधार दो मौसमों को
संवार दो प्रकृति को
चूम लूंगी माथा
पूरे प्रेमावेग के साथ,
है ये वादा !
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30 September, 2022

कविता | धूप बारिश के बाद की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह


धूप बारिश के बाद की
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

कुछ अधिक
गरमाने लगी है
धूप
बारिश के बाद की
नमी, उमस
और उष्णता से भरी धूप
कर देती है व्याकुल
देहरी लांघते ही

धूप का काम है
तपना
वह तप रही है,
झुलसा रही है
अनावृत चेहरों को

चेहरे,
अपरिचित चेहरे
धूप के लिए भी
और
मेरे लिए भी,
भीड़ से गुज़रते हुए
हम नहीं देख पाते
चेहरों को
ठीक से
और देख भी लें
तो नहीं पढ़ पाते
उनकी अहमियत को
धूप भी नहीं पढ़ पाती
दिलों को
वरना
कर के महसूस
मेरे भीतर के
विसूवियस
मुझे
और न तपाती।
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24 September, 2022

रात | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | कविता

रात
 - डॉ (सुश्री) शरद सिंह

रात आ गई है
मेरे कांधे पर
सिर रख कर
सोने ,
जानती है
मुझे तो है जागना 
ताज़िन्दगी
गिनते हुए
पहर के पहाड़े
यादों के सिरहाने
बैठ कर

अब वो ही देखेगी
मेरे हिस्से के ख़्वाब
ओढ़ेगी चादर
ख़्वाहिशों की
भोर होने तक

और मेरी आंखें
पढ़ती रहेंगी
वक़्त की किताब
पन्ने-दर-पन्ने।
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22 September, 2022

कविता | बारिश | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

बारिश
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

बूंदें गिरती हैं
मेरे सिर पर
और उलझतीं हुई
बालों में
सरक जाती हैं धीरे से
मेरी गर्दन
और कांधों पर

कुछ बूंदें
भिगोती हैं कुर्ते को
और कुछ 
जा पहुंचती हैं
धड़कन के पास
गोया यह जांचने
कि उसमें
अभी भी
वह रफ़्तार है या नहीं

या फिर 
देह पर उतर कर
सूंघना चाहती हैं
उस गंध को
जो महकती है कस्तूरी-सी 
किसी के प्रेम में

पागल बूंदें
नहीं जानतीं
कि प्रेम 
अब नहीं रहा वैसा
जैसा देखा है उसने 
चातक में
चकोर में
चकवा में,
इंसानी प्रेम 
ढल गया है अब
जाति में, धर्म में,
ग्रीनकार्ड में

पागल बूंदें
पिघला नहीं सकतीं
उदासी के कोलोस्ट्रोल को,
न ही कर सकती हैं 
इसका अनुभव कि
कैसे तंग हो रही हैं सांसें
शुद्ध प्रेम के बिना

वर्जित क्षेत्र में प्रविष्ट
नासमझ बूंदें
धड़कनों को समझ पाने से पहले
सूख जाएंगी
पा कर देह की तपन
सील कर रह जाएगी
दिल की
अधखुली किताब

जितना भिगो रही है
मुझे बारिश
खुद भी भीग जाएगी
मुझसे मिल कर
यक़ीनन।
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