कविता
इन दिनों
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
बादलों का लिहाफ़
ओढ़कर
सोता है चांद
इन दिनों,
घुट रही है चांदनी
पहर-दर-पहर।
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#अर्ज़कियाहै - डॉ (सुश्री) शरद सिंह
हार्दिक धन्यवाद #युवाप्रवर्तक
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ग़ज़ल : धूप बारिश की
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
उसकी यादों सी सुनहरी है, धूप बारिश की।
फिर भी तन्हा है, इकहरी है, धूप बारिश की।
अपने हालात के बारे में सोचती रहती
एक गुमसुम सी दुपहरी है, धूप बारिश की।
उसने पैरोल पे छोड़ा है बादलों को अभी
खुद ही जज, खुद ही कचहरी है, धूप बारिश की।
सीलनें छन के चली जाएंगी बिस्तर से सभी
क्योंकि झीनी सी मसहरी है, धूप बारिश की।
छत से, मुंडेर पे, दीवार से कांधे पे "शरद"
इक फुदकती सी गिलहरी है, धूप बारिश की।
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