24 November, 2017

इक अलाव जलने दो ... डॉ शरद सिंह


Winter ... Poetry of Dr Miss Sharad Singh
जाड़े को समर्पित मेरी एक कविता ....
इक अलाव जलने दो
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जाड़े की रात
ठिठुराते 
बड़े पहर 
चलने दो
जीवन में
गरमाहट
लाने को
यादों का
इक अलाव
जलने दो !
- डॉ शरद सिंह

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21 November, 2017

जाड़े का दिन .... डॉ शरद सिंह

Winter ... Poetry of Dr (Miss) Sharad Singh

जाड़े का दिन
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जाड़े की धूप
और
झुरमुट-सा दिन
कुछ उदास
कुछ ठंडा
कुछ भीगा
आम के बागीचे में
कोहरे-सा
गेहूं के खेत में
धुंधलके-सा
भीत टंगे, धूल अटे
दर्पण-सा
लगता है कभी-कभी
मुट्ठी में बंद
कर्जे के
कुछ रुपयों जैसा।

14 November, 2017

लावा .... डॉ शरद सिंह

Poetry of Dr (Miss) Sharad Singh

लावा
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सीने में
धैर्य की टेक्टोनिक प्लेट्स
टकरा रही हैं आपस में

दरकने को आतुर है
धरती होंठों की
अनुभवों के
मोटे क्रस्ट के नीचे
उबल रहा है लावा
इन दिनों
गोया मुझमें मौजूद है
एक धरती
जिसे हो चला है
असहनीय
तुम्हारा भीतरघात-सा
अपर्यावर्णीय आचरण।
- डॉ शरद सिंह

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10 November, 2017

It's my winter look

Dr (Miss) Sharad Singh
It's my winter look ... Dr Sharad Singh
आखिरकार जाड़ा आ ही गया और निकल आए गर्म कपड़े।

07 November, 2017

मन एक पंछी .... डॉ शरद सिंह

Poetry of Dr (Miss) Sharad Singh

मन एक पंछी
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मन
एक पंछी ही तो है
डोलता है, फुदकता है
हो जाता है उदास
सूखी डालियों पर
और खिल उठता है
किसी फूल की तरह
हरी पत्तियों के बीच
मन का मधुर स्वर
मन ही सुनता है
क्यों कि मन
वह पंछी नहीं
जो दिखे सबको, रिझाए सबको, मोहे सबको
मन एक पंछी है
निरा व्यक्तिगत
नितान्त अपना
किसी गोपन की तरह।
- डॉ शरद सिंह


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03 November, 2017

वह अपनापन .... डॉ शरद सिंह

Poetry of Dr (Miss) Sharad Singh
वह अपनापन
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मेरी स्मृतियों का वह गांव
मुझे पुकारता है प्रतिदिन
जहां -
लम्बी, पतली, कच्ची सड़क के
दोनों ओर थे ऊंचे-ऊंचे पुराने वृक्ष,
बिजली की प्रतीक्षा में खड़े
तारविहीन खम्बे,
कुछ खपैरली मकान,
मकानों में छोटी-छोटी खिड़कियां
मंझोले दरवाज़े
गोबर से लिपे आंगन
और
एक अहसास अपनेपन का ।

वह गांव आज भी वहीं हैं
आ गई है बिजली भी
लेकिन नहीं है तो वे सारे वृक्ष
सागौन की गंध से तर वह सोंधापन
और वह अपनापन
ये वो गांव नहीं जो मुझे बुलाता है
प्रतिदिन ।

- डॉ शरद सिंह

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