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- डॉ शरद सिंह
सर्द रातों में जले बन के अलाव जो
वो नहीं थे किसी अख़बार के रद्दी पन्ने
उनमें कुछ ख़त थे
थीं उनमें हसीं तस्वीरें
उनमें कुछ हर्फ़ थे,
कुछ जुमले,
कई वादे भी
ज़िंदगी मिल के बिताने के
इरादे भी।
मैंने खुद को न बचाया था
कभी खुद के लिए
इसलिए तुम थे उनमें भी बहुत ज़्यादा से
और मैं कम थी हमेशा की तरह,
जबकि काग़ज़ वो
निकले थे, मेरे माज़ी के तहख़ाने से
अब है खाली-सा वही तहख़ाना
सिर्फ़ इक दर्द बचा पहचाना
जल चुके हैं वो सभी काग़ज़ अब तो
फिर भी यहां
राख में छोड़ गए आग के जो भी किस्से
देख लो,
आज वो आए हैं मेरे ही हिस्से।
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