राह को गोपन
- डाॅ सुश्री शरद सिंह
देह का बोझा
उठाए
अब नहीं उठता।
पेट में है
भूख की चटकन
सीवनों-सी कस गई बांहें
लूटता है
राह को गोपन
एक अंगारा
बुझाए
अब नहीं बुझता।
झोपड़ी के
द्वार में सूखा,
खेत का महका हुआ यौवन
खा गया है
मौसमी धोखा
बिम्ब हरियाला
उगाए
अब नहीं उगता।
पंछियों के
पर हुए टुकड़े
अब हवाओं से उलझता कौन
हर किसी के
व्यक्तिगत दुखड़े
चैन परदेसी
रुकाए
अब नहीं रुकता।
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(मेरे नवगीत संग्रह ‘‘आंसू बूंद चुए’’ से)
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