धूल की बस्ती
- डाॅ सुश्री शरद सिंह
बीत जाने के लिए
दिन चले आए
सुबह से रीत जाने के लिए।
धूल की बस्ती
घने पांव उगाए
एक वन
ताश के पत्ते
गिनो हर ओर से
बावन
गिन नहीं पाए
सभी से जीत जाने के लिए।
देह कांखों में
छुपाए नाम की
गठरी
रात जैसे हो गई
है दर्द की
चारी
छिन गए साए
कि आए मीत जाने के लिए।
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(मेरे नवगीत संग्रह ‘‘आंसू बूंद चुए’’ से)
