दर्द का पड़ाव
- डाॅ सुश्री शरद सिंह
पोर-पोर
दर्द का पड़ाव
कभी धूप कभी छांव।
तथाकथित अपनों के
चूर हुए वादे
स्याह कर्म वालों के
वस्त्र रहे सादे
ओर छोर
जन्मते तनाव
कभी पेंच कभी दांव।
टूटते घरौंदों में
थकन की कराहें
रोज़गार बिना सभी
बिखर गई चाहें
कोर-कोर
आंसू के घाव
कभी डूब कभी नाव।
भूख सने होंठों पर
रोटी के गाने
सबके सब दुखी यहां
सड़क, गली, थाने
जोर-शोर
ओढ़ते छलाव
कभी मोल कभी भाव।
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(मेरे नवगीत संग्रह ‘‘आंसू बूंद चुए’’ से)
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