12 May, 2021

जो बचे हुए हैं | कविता | डॉ शरद सिंह

जो बचे हुए हैं
         - डॉ शरद सिंह

जीने की ज़द्दोज़हद में फंसे
जो बचे हुए हैं
उन्होंने झेली है पीड़ा
अपनों के बिछड़ने की
अभी झेलना है पीड़ाओं के नाना रूप

पीड़ा अपरिभाषित होने लगती है
जब हाथ में आता है
पीले रंग का
आयताकार क़ागज़
यानी
जिनकी मृत्यु पर विश्वास न हो रहा हो
उनका 'डेथ सर्टिफिकेट'
उंगलियां कांपती हैं
नाम पढ़ा नहीं जाता है
जागता है एक अफ़सोस
कि काश ! उस नाम की जगह 
मेरा नाम होता!
या फिर किसी का भी नहीं
न कोई आपदा होती
न ही अवसर
पीले क़ागज़ पर नाम लिखे जाने का।

पीड़ा तो अभी और बढ़ेगी
जब उस पीले क़ागज़ को लेकर
घूमना पड़ेगा दफ़्तरों में
ज़िन्दा बच जाने की सज़ा के बतौर।

पीड़ा तो अभी और बढ़ेगी
कलेजे को चीरती हुई
सॉ-मिल की आरे की तरह
दो फाड़ हो जाएगा हृदय
श्वेत पड़ने लगेंगी लाल रक्त कणिकाएं
फिर भी सांसें नहीं थमेंगी
अज्ञात अपराध की
ज्ञात सज़ा 
अभी भोगनी जो है
पीले क़ागज़ के काले अक्षरों के साथ
... ताज़िन्दगी।
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11 May, 2021

उसे क्या ? | कविता | डॉ शरद सिंह

उसे क्या ?
      - डॉ शरद सिंह

बुझ गई 
सूरज की एक किरण
टूट गया एक तारा
बिखर गया एक घर

तो क्या?
मृत्यु है साश्वत
इसलिए बन जाओ दार्शनिक
और
मत पूछो कारण मृत्यु का 
मृत्यु टहलती है इनदिनों
अस्पतालों के आईसीयू वार्डों में
फेफड़ों से ऑक्सीजन सोखती हुई
प्राणरक्षक दवाओं को हराती हुई
जीने की उम्मीदों को तड़पाती हुई
उसे क्या
जो सिर्फ़ बची अकेली छोटी बहन
उसे क्या
जो सिर्फ़ बचे बूढ़े दादा और नन्हें पोते
उसे क्या
जो सिर्फ़ बचे अनाथ बच्चे
उसे क्या .....
क्या 'सिस्टम' से  मिलीभगत है उसकी भी?
सुना है किस्सा कि 
एक उलूक-दम्पत्ती ने धन्यवाद दिया था 
तैमूरलंग को 
कि वह जब तक है उजड़ते रहेंगे गांव
और बसते रहेंगे उलूकों के घर...
अब न युद्ध है और न तैमूरलंग
फिर भी मृत्यु ने फैला दिए हैं पंजे
गांवों तक
सुविधा नहीं, सुरक्षा नहीं, चिकित्सा नहीं
तो क्या?
मृत्यु को अच्छे लगते हैं शोकगीत
वह तो गाएगी, 
भले ही फट जाए धरती का कलेजा
उसे क्या....
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10 May, 2021

आईसीयू में जूझते उत्तर | कविता | डॉ शरद सिंह

आईसीयू में जूझते उत्तर
            - डॉ शरद सिंह

एक बुद्धिजीवी ने प्रश्न उछाला-
"आखिर कब तक चलेगा
यह असंवेदनशील असंवैधानिक दौर ?
व्यवस्था फेल होकर नियति और  प्रारब्ध के रामभरोसे  
बेबस लाचारी का फायदा उठाते लोग..."

प्रश्न गंभीर था

इन दिनों गंभीर प्रश्नों पर ही तो
जी रहे हैं हम सभी
जिनके उत्तर 
छटपटा रहे हैं 
आईसीयू में 
हाईफ्लो ऑक्सीजन पर
जिनके उत्तर 
बाट जोहते हैं 
असली रेमडेसिविर इंजेक्शन का
जिनके उत्तर 
वेंटिलेटर तक भी नहीं पहुंच पाते हैं
जिनके उत्तर 
तीन पर्तों में लपेट कर
सौंप दिए जाते हैं अग्नि को

निरर्थक हैं ऐसे सारे प्रश्न तब तक
जब तक
हम में सामूहिक हौसला नहीं जागता
उत्तरों को 
आईसीयू से 
जीवित बचा लाने का,
निरर्थक हैं सारे प्रश्न।
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09 May, 2021

हम एक्सपेरीमेंटल चूहे | कविता | डॉ शरद सिंह |

 हम एक्सपेरीमेंटल चूहे
                 - डॉ (सुश्री) शरद सिंह

इस मौत के तांडव में
कौन आएगा मदद को
कोई भी नहीं
डरे हुए नहीं करते मदद 
और डरे हुओं को नहीं मिलती है मदद
 ग़ाफ़िल रहते हुए इस सोच में-
कि कभी नहीं आएगी हमारी बारी।

सच तो ये है कि
हम खुद को लपेटते जा रहे हैं
अपने भ्रम और भय की अनेक पर्तों में
काल अट्टहास कर रहा है और हम...
हम माला जप रहे हैं
झूठी महानताओं की।

वह
जो बेड और ऑक्सीजन नहीं जुटा सका
वह 
जो प्राईवेट अस्पताल से ज़िंदगी नहीं ख़रीद सका
वह 
जो सरकारी अस्पताल में वेंटीलेटर नहीं पा सका
वह
जिसके हिस्से का जीवन रक्षक इंजेक्शन
बेच दिया गया
वह 
जो भर्ती कराने के बाद
दुबारा नहीं देख सका 
अपनी ज़िंदगी के हिस्से को

कथित 'सिस्टम'
और लाचार हम
एक ज़िंदगी
पर ग़म ही ग़म

बिना मंज़िल की दौड़
दौड़ते हुए
गोया हम बन गए हैं-
एक्सपेरीमेंटल चूहे
किसी बड़ी-सी प्रयोगशाला के।
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08 May, 2021

तीन पर्तों में देवता | कविता | डॉ शरद सिंह

तीन पर्तों में देवता 
             - डॉ शरद सिंह

हां, मुझसे छिन गया
मेरी ज़िंदगी का सुख, सौंदर्य, गर्व
और जीने का मक़सद  
जैसे हरे-भरे वृक्ष पर
चला दे कोई कुल्हाड़ी
और पथरा जाए वृक्ष
बिखर जाएं टूटी शाखाएं

हां, मुझसे छिन गया
विश्वास,
छिन गई आस्था
टूट गई देव प्रतिमा
हो गया दिया औंधा
बह गया तेल
बची हुई, बुझी हुई बाती को
तीन पर्तों में लपेट दिया है मैंने भी

अब कोई देवता
न करे मुझसे
प्रार्थना की उम्मीद

उसने भी नहीं सुनी थी मेरी याचिका
नहीं दी मुझे
मेरे अपनों के जीवन की भीख
अब उसे भी नहीं मिलेगा
कोई भी चढ़ावा
मुझसे

हां, मैंने लपेट दिया है
तीन पर्तों में
देवता को भी
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07 May, 2021

हमारा स्याह आज | कविता | डॉ शरद सिंह

हमारा स्याह आज
               - डॉ शरद सिंह

इतिहास के पन्नों से उतर कर
वर्तमान में गूंजता
नीरो की बांसुरी का स्वर
आशा और निराशा के बीच 
अपनों को बचा लेने का संघर्ष
तीन पर्तों में लिपटे शवों के ढेर
जलती चिताओं पर विधिविधान की ललक
गोया विधिविधान 
रुई के फ़ाहे की तरह
पोंछ देगा लहू में डूबे
दर्द के धब्बों को
चिताएं जल रही हैं
संघर्ष ज़ारी है धब्बे पोंछने का
नीरो की बांसुरी
छेड़ रही है राजनीतिक राग
और चल रही है-
लहर एक
लहर दो
लहर तीन....
लहरें गिन रहे डरे हुए लोग
रोम को जला कर 
नीरो की बांसुरी का स्वर
छीन रहा है 
हर दूसरे, तीसरे घर के
एक न एक सदस्य को
गोया इतिहास जागृत हो गया है
या हम तेजी से बनते जा रहे हैं इतिहास?
सच, यही तो है हमारा स्याह आज...
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03 May, 2021

कोरोना ने मेरी दीदी डॉ वर्षा सिंह को मुझसे छीन लिया....

आज  03.05.2021 को सुबह 02:00 बजे  कोरोना ने  मेरी दीदी Dr Varsha Singh को मुझसे छीन लिया....