03 May, 2020

कोरोना पर प्रस्तुत हैं मेरी दो हास्य बुंदेली रचनाएं - डॉ (सुश्री) शरद सिंह


कोरोना पर प्रस्तुत हैं मेरी दो हास्य बुंदेली रचनाएं... 

*(1)*
*ऐसी कम तैसी, कोरोना तुमाई*

- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

फैला दई मुस्किल जे कैसी
रई न दुनिया पैलऊं जैसी
खरी-खरी अब सुनो हमई से
ऐसी कम तैसी, कोरोना तुमाई ...!!

बे ओरें चमगादड़ खाएं
इते  हमें  उल्टो लटकाएं
जे तरकीब समझ ने आई
ऐसी कम तैसी, कोरोना तुमाई ...!!

डर के मारे घरई बिड़े हैं
काज हमाए सबई अड़े हैं
तुमने सबकी बैंड बजाई
ऐसी कम तैसी, कोरोना तुमाई ...!!

हम भी ठैरे ठेठ बुंदेला
तुमें न मिलहे कुतका ढेला
हुइए तुमरी चला-चलाई
ऐसी कम तैसी, कोरोना तुमाई ...!!

'शरद' कहत है सबई जने से
डरे कोरोना लॉक रये से
तुमरी करहें टांग तुड़ाई
ऐसी कम तैसी, कोरोना तुमाई ...!!
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*(2)*
बतर्ज़ बाम्बुलिया ...

 *कोरोना ने कर दओ बवाल रे*
 - डॉ (सुश्री) शरद सिंह

बिसर चलो, सबई कछू रे
सबई कछू के जे कोरोना ने कर दओ
बवाल रे
बिसर चलो हो..

बिसर चलो, ठिलियां की रौनकें
ठिलियां की रौनक संगे, फुल्की, चाट रे
बिसर चलो, हो....

बिसर चलो, मंडी औ बजरिया
मंडी औ बजरिया के, बिसरो सनीमा औ मॉल रे
बिसर चलो हो....

बिसर चलो, जोनई से मिलत्ते
जोनई से मिलत्ते ऊकी सकल  न देखी अब जाए रे
बिसर चलो.....

बिसर चलो, करजा, उधार रे
करजा, उधार लेबे कोनऊ न अब इते आय रे
बिसर चलो.....

बिसर चलो, 'शरद' की जेएई अरजी रे
जेएई अरजी रे, रखो केवल कोरोना खों याद रे
'शरद' की जेएई अरजी रे.....
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02 May, 2020

शाम ... - डॉ शरद सिंह


शाम कुछ चैन से
गुज़र जाती
जो तेरी याद
गर नहीं आती...
- डॉ शरद सिंह

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14 April, 2020

लॉकडाउन को पालन कर लेओ...डॉ शरद सिंह, बुंदेली रचना

दैैैनिक भास्कर ने 'अपनी बोली-अपने बोल' के अंतर्गत प्रकाशित की है लॉकडाउन के नियमों का पालन करने का आग्रह करती मेरी बुंदेली काव्य-पंक्तियां ...
हार्दिक धन्यवाद #दैनिकभास्कर 🙏
#stayhome #lockdown #besafe #gocorona

30 January, 2020

वासंती दोहे - डॉ (सुश्री) शरद सिंह

Vasanti Dohe - Dr Sharad Singh, Yuva Pravartak, 30.01.2020, Vasant Panchami 2020
वसंत पंचमी की हार्दिक शुभकामनाएं 💗

मेरे वासंती दोहों को web magazine युवा प्रवर्तक के अंक दिनांक 30 जनवरी 2020 में स्थान मिला है।
युवा प्रवर्तक के प्रति हार्दिक आभार 🙏
मित्रों, यदि आप चाहें तो पत्रिका में इसे इस Link पर भी पढ़ सकते हैं ...
http://yuvapravartak.com/?p=24739

*वासंती दोहे*
- *डॉ (सुश्री) शरद सिंह*
सपने वासंती हुए, रंगों से भरपूर। ऐसे में कोई रहे, क्यों अपनों से दूर।।
खेतों में सरसों खिले, जंगल खिले पलाश ।
खजुराहो की भांति ऋतु, किसने दिया तराश ।।
दुख के दड़बे से निकल, सुख के दो पग नाप ।
पहले से दूना लगे, खुद को अपना आप ।।
तोता मैना कर रहे 'ऋतुसंहारम्' याद ।
मौसम ने जो कर दिया, पोर-पोर अनुवाद ।।
उसी राह मिलने लगे महके हुए बबूल।
जिस पर चलने से चुभे, विगत वर्ष में शूल।।
कागज कलम दवात का आज नहीं कुछ काम ।
संकेतों से व्यक्त है मन की चाहत तमाम ।।
आशाओं की देहरी जाग रही है आज ।
आहट गुजरी थी अभी देकर इक आवाज़ ।।
बसंती दोहे 'शरद' खोलें दिल के राज़।
अपनापन मिलता रहे, चलते रहें रिवाज़।।
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29 January, 2020

वासंती दोहे - डॉ शरद सिंह

Basanti Dohe of Dr (Miss) Sharad Singh

वासंती दोहे 
- डॉ शरद सिंह

सपने वासंती हुए, रंगों से भरपूर। 
ऐसे में कोई रहे, क्यों अपनों से दूर।। 

खेतों में सरसों खिले, जंगल खिले पलाश ।
खजुराहो की भांति ऋतु, किसने दिया तराश ।।

दुख के दड़बे से निकल, सुख के दो पग नाप ।
पहले से दूना लगे, खुद को अपना आप ।।

तोता मैना कर रहे 'ऋतुसंहारम्' याद ।
 मौसम ने जो कर दिया, पोर-पोर अनुवाद ।।

उसी राह मिलने लगे महके हुए बबूल।
जिस पर चलने से चुभे, विगत वर्ष में शूल।।

कागज कलम दवात का आज नहीं कुछ काम ।
संकेतों से व्यक्त है मन की चाहत तमाम ।।

आशाओं की देहरी जाग रही है आज ।
आहट गुजरी थी अभी देकर इक आवाज़ ।।

बसंती दोहे 'शरद' खोलें दिल के राज़। 
अपनापन मिलता रहे, चलते रहें रिवाज़।।