- डॉ शरद सिंह
कुछ समझ नहीं आता है
कांपता है मन
पत्ते की तरह
हर पल आशंकाओं की लहरें
टकराती हैं पत्थर हो चले दिल से
तभी पता चलता है कि-
दिल का पत्थर होना
तो फ़क़त धोखा है
रेत के टीले सा दिल
हर बार बिखर जाता है
कुछ समझ नहीं आता है
उसके सीने में धड़कन
रुक-रुक कर चलती है
दर्द मेरे सीने में भी होता है
उसके सूख चले शरीर में
स्निग्धता आज भी बाकी है
ममत्व की,
वहीं मेरी देह
टूट कर गिर जाना चाहती है
अस्पताल के सुचिक्कन फर्श पर
किसी भी दिलासा से
अब मन नहीं भरमाता है
कुछ समझ नहीं आता है
गोया, मेरी समझ
हो गई है
बंद गली का आख़िरी दरवाज़ा
जिसके आगे
दम तोड़ दिया है
हर रास्ते ने।
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