धूप चुरा ली
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
उसकी मुट्ठी भरी हुई है, मेरी मुट्ठी खाली- खाली।
उसने पहले छतरी मांगी, फिर चुपके से धूप चुरा ली।
वो चंदा है आसमान का, तारों से मन बहलायेगा
उसको क्या मालूम पड़ेगा, मावस होती कितनी काली।
कौन पैरवी करता मेरी, वो वक़ील था, वो ही जज था
उसने अपनी ही दलील पर, अपनी ‘पीनल कोड’ बना ली।
इक पत्थर है मेरे आगे, जिसको ईश्वर मान लिया है
कुछ न कुछ तो करना ही था जब दुनिया ने नज़र फिरा ली।
‘शरद’ रात है जितनी लम्बी, आंखें उतनी जागी-जागी
सपनों ने भी जैसे उसी यादों के संग लगन करा ली।
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(मेरे ग़ज़ल संग्रह 'पतझड़ में भीग रही लड़की' से)
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