अन्नदाता
- डॉ शरद सिंह
ज़िंदगी में आ गया मसला बड़ा है
अन्नदाता आज सड़कों पर खड़ा है
जिस तरह सरहद पे रक्षक जूझते हैं
मुश्क़िलातों से हमेशा वो लड़ा है
मूल्य मिल जाए फसल का, कर्ज़ उतरे
हो फ़सल अच्छी, यही दिल में जड़ा है
ख़ुदकुशी करना पड़े जब खेतिहर को
जान लो, वह दौर बेहद ही कड़ा है
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