25 September, 2021

यही तो होता है | कविता | डॉ शरद सिंह

यही तो होता है

- डॉ शरद सिंह

कुछ शब्दों को
पकड़ते ही
पसीजने लगती है हथेली
फड़कने लगती हैं
धमनियां
धौंकनी बन जाता है
हृदय,
हो जाता है तीव्रतर 
स्पंदन
चौड़े हो जाते हैं नेत्र
कांपते हैं होंठ
ठिठक जाती हैं
ध्वनियां,
कुंद हो जाती है बुद्धि
जाग उठती है हठधर्मिता
बढ़ जाती है
वर्चस्व की भावना
वे मायावी शब्द
जकड़ लेते हैं
अपने इंद्रजाल में
फिर नहीं दिखता
उनके सिवा कुछ भी
बढ़ जाती है आत्ममुग्धता

यही तो होता है
प्रेम,
युद्ध
और
राजनीति में,
सब कुछ
समझते हुए भी
समझ से परे
नासमझी की हद तक।
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