- डॉ शरद सिंह
कभी सुबह ऐसी भी होगी
सोचा न था
तुम बिन सांसें लेनी होंगी
सोचा न था
आज भी छत पर फूल खिला है
गेंदे का
आज भी छत पर फूल खिला है
गुड़हल का
आज भी श्यामा-तुलसी
भीनी महक रही
आज भी छत पर गौरैया हैं
चहक रहीं
सिर्फ़ नहीं हो तुम
तो है सूनी पूरी छत
"बेटू", "बहना" सुनने को हैं
कान तरसते
वो धड़कन हैं कहां ? कि जिनमें
मेरे प्राण थे बसते
दुनिया भी मिल जाए
पर जो नहीं हो तुम तो
नहीं शेष है मेरे हाथों में
अब कुछ भी
कोरोना बन सांप
तुम्हें डंस लेगा, दीदी
और बिछुड़ना होगा हमको
इतना ज़ल्दी
कभी अकेले जीना होगा
सोचा न था
कभी अकेले रहना होगा
सोचा न था।
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