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| Dr (Miss) Sharad Singh |
पिसता है दिन
- डाॅ (सुश्री) शरद सिंह
चाकी के पाट में
पिसता है दिन
पोर-पोर राहों में
घिसता है दिन।
ज़िन्दगी रुमाल-सी
ज़ेब में लिए
रोज़गार की तलाश में
बहुत जिए
अब तो बाज़ारों में
बिकता है दिन
बूंद-बूंद पानी-सा
रिसता है दिन।
घूंट भी करेले के
मिलें तो सही
लिए बिना ऋण, कर्जों से
भरी बही
इंच-इंच मुश्क़िल से
खिंचता है दिन
बेहद आहिस्ता
आहिस्ता है दिन।
अंधापन न्याय का
द्वार-द्वार पर
ज़िरह बिना छीन लिया
आंगन औ' घर
काल-कोप जैसा ही
दिखता है दिन
मुरझाए फूल का
गुलिस्तां है दिन।
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(मेरे नवगीत संग्रह ‘‘आंसू बूंद चुए’’ से)
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