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26 December, 2020

पिसता है दिन | आंसू बूंद चुए | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | नवगीत संग्रह

Dr (Miss) Sharad Singh

पिसता है दिन

   - डाॅ (सुश्री) शरद सिंह


चाकी के पाट में

पिसता है दिन

पोर-पोर राहों में 

        घिसता है दिन।


ज़िन्दगी रुमाल-सी 

ज़ेब में लिए

रोज़गार की तलाश में 

बहुत जिए


अब तो बाज़ारों में

बिकता है दिन

बूंद-बूंद पानी-सा

          रिसता है दिन।



घूंट भी करेले के

मिलें तो सही

लिए बिना ऋण, कर्जों से

भरी बही


इंच-इंच मुश्क़िल से

खिंचता है दिन

 बेहद आहिस्ता

         आहिस्ता है दिन।


अंधापन न्याय का

द्वार-द्वार पर

ज़िरह बिना छीन लिया

आंगन औ' घर


काल-कोप जैसा ही

दिखता है दिन

मुरझाए फूल का 

      गुलिस्तां है दिन।

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(मेरे नवगीत संग्रह ‘‘आंसू बूंद चुए’’ से)

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Dr (Miss) Sharad Singh, Navgeet, By Ansoo Boond Chuye - Navgeet Sangrah